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Amit Shah : आधुनिक चाणक्य की कहानी- विपक्ष ने भी सांसदों को कमरे में कर लिया था बंद

लोकसभा चुनाव मे भाजपा को प्रचंड जीत दिलाने वाले अमित शाह भाजपा में सबसे ताकतवर अध्यक्ष बन गए हैं। इसके साथ ही पार्टी और सरकार पर उन्होने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। अब पोटली और ब्रीफकेस के सहारे राजनीति करने वालों की नींद उड़ गई है। शाह हारी हुई बाजी को जीतने का माद्दा भी रखते हैं शायद यही वजह है इस दौर मे शाह को राजनीति का असल चाणक्य भी कहा जाने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी जुगलबंदी हर असंभव को संभव करने का हौसला रखती है।

Amit Shah : आधुनिक चाणक्य की कहानी- विपक्ष ने भी सांसदों को कमरे में कर लिया था बंद
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लोकसभा चुनाव मे भाजपा को प्रचंड जीत दिलाने वाले अमित शाह भाजपा में सबसे ताकतवर अध्यक्ष बन गए हैं। इसके साथ ही पार्टी और सरकार पर उन्होने अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। अब पोटली और ब्रीफकेस के सहारे राजनीति करने वालों की नींद उड़ गई है। शाह हारी हुई बाजी को जीतने का माद्दा भी रखते हैं शायद यही वजह है इस दौर मे शाह को राजनीति का असल चाणक्य भी कहा जाने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी जुगलबंदी हर असंभव को संभव करने का हौसला रखती है।

भारतीय जनसंघ के दौर मे भाजपा में अटल और आडवाणी की जोड़ी खूब बनी, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से संन्यास के बाद आडवाणी पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता में वह भरोसा और विश्वास नहीं जगा पाए जैसा हाल के बरसों मे मोदी और शाह की जोड़ी ने जगाया है। मोदी को दोबारा पीएम बनाने वाले आधुनिक राजनीति के चाणक्य के तौर पर अमित शाह ने खुद को स्थापित कर दिया है।


शाह का जन्म 22 अक्तूबर 1964 को मुंबई में हुआ। वे महज 14 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शामिल हुए। 1982 में अमित शाह अहमदाबाद में छात्र संगठन एबीवीपी के सचिव बन गए। 1997 में वह भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बने। संघ की शाखाओं में बचपन से ही जाते थे और राजनीति में आने से पहले एक स्टॉक ब्रोकर थे। शाह के करीबी कहते हैं कि उन्होंने धीरूभाई अंबानी और अन्य धनी व्यापारियों से प्रेरित होकर प्लास्टिक का धंधा शुरू किया था,

लेकिन जल्द ही उन्हें लगने लगा कि बिना सरकारी मदद के कोई भी बड़ा उद्योग खड़ा करना मुश्किल है। एक वरिष्ठ संघ प्रचारक ने 26 बरस के युवा शाह को उस समय संघ और भाजपा में अपनी पैठ बना रहे नरेंद्र मोदी से मिलवाया था। मोदी उन दिनों अपनी टीम बना रहे थे। उन्हें युवा शाह के आत्मविश्वास ने प्रभावित किया। शाह ने मोदी से लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रचार संभालने की इच्छा जताई।


आडवाणी के उस चुनाव के बाद शाह ने पार्टी में अच्छी पहचान बना ली। गुजरात की राजनीति को करीब से देखने वाले कई लोग मोदी और शाह के रिश्ते को 80 और 90 के दशक में आडवाणी और मोदी के रिश्ते जैसा बताते हैं। 2001 में जब केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उससे पहले ही उन्होंने अमित शाह को एक कद्दावर नेता बना दिया था। शाह 1995 में गुजरात स्टेट फाइनेंसियल कॉरपोरेशन के चेयरमैन बनाए गए।

गुजरात में रहते हुए शाह मोदी के आंख-कान बने रहे। शाह ने इस दौरान गुजरात के कोऑपरेटिव बैंक और मंडलियों पर जिस पर कई बरस से कांग्रेस का कब्जा था अपनी पकड़ बनाई। वर्ष 2002 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की दोबारा सरकार बनी तो क्षमता सूझबूझ और वफादारी देखते हुए सरकार में सबसे कम उम्र के शाह को गृहराज्य मंत्री बनाया गया। शाह को सबसे अधिक दस मंत्रालय दिए गए और उन्हें दर्जनों कैबिनेट समितियों का सदस्य बनाया गया।

2002 में ही अमित शाह को पार्टी ने गुजरात के सरखेज विधानसभा से टिकट दिया। चुनाव में वह रिकॉर्ड मतों से जीत कर आए। चाहे गुजरात की कोऑपरेटिव मंडली हो या सरकारी-निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की यूनियन शाह ने भाजपा का झंडा हर जगह लहराया। इस तरह शाह मोदी के कवच बन गए। अमित शाह जैसी माइक्रो मैनेजमेंट और बूथ मैनेजमेंट की क्षमता कम ही लोगों में है।

इस चुनाव में भी अमित शाह ने प्रधानमंत्री से भी ज्यादा 161 ताबड़तोड़ रैलियां कर डाली और अपने दम पर 300 संसदीय इलाकों में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई। अमित शाह और नरेंद्र मोदी के जीवन में कई समानताएं हैं। दोनों ने आरएसएस की शाखाओं में जाना बचपन से शुरू कर दिया था और दोनों ने अपनी जवानी में अपने जोश-अनुभव और कुशलता से वरिष्ठ नेताओं को प्रभावित किया।

हालांकि शाह और मोदी के जीवन में सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया जब उन्हें गुजरात से बाहर निकाला गया। शाह को सोहराबुद्दीन शेख फर्जी एनकाउंटर केस में फंसाया गया। अमित शाह को जब गुजरात से निकाला गया तब उन्होंने अपना डेरा दिल्ली में स्थित गुजरात भवन में डाला। यहां रहते हुए वह भाजपा के बड़े नेताओं के करीब आते गए और मोदी के लिए दिल्ली आने के रास्ते तलाशते गए।

मनमोहन सरकार के किले को भेदने के लिए भाजपा जब चुनाव को लेकर अपनी रणनीति बना रही थी तब मोदी और शाह जानते थे कि यूपी जीते बिना दिल्ली की कुर्सी पाना नामुमकिन जैसा है। तब शाह यूपी जाना नहीं चाहते थे लेकिन यूपी की कमान संभालते ही शाह एक राज्य के नेता से राष्ट्रीय नेता बन गए। 2014 मे उत्तर प्रदेश की 73 लोकसभा सीट भी अमित शाह के कारण पार्टी ने जीती और इसके बाद तो दो तिहाई बहुमत से अमित शाह के अध्यक्ष रहते हुए पार्टी ने यूपी की पिच पर शानदार करिश्मा कर दिखाया जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। अमित शाह के पार्टी अध्यक्ष रहते पार्टी 19 राज्यों में सत्ता में है जो उनके करिश्मे को बताने के लिए काफी है।

2014 में मिले 31 फीसदी वोट शेयर को पीछे छोड़ते हुए भाजपा इस बार 50 फीसदी से भी अधिक वोट पा गई। हिंदी पट्टी की 226 सीटों में 202 लोकसभा सीटें पार्टी ने फतह हासिल की। यही नहीं अमित शाह ने बीते बरस से ही के उन 120 लोकसभा सीटों पर ख़ास खुद का फोकस किया था जहां पार्टी हार गई थी। 5 माह पूर्व छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों की हार से सबक लेते हुए जिस तर्ज पर शाह ने इस बार लोकसभा की बिसात बिछाई उसकी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है।

लोकसभा चुनावों से पहले न केवल शाह ने पूरे एनडीए को एकजुट रखा बल्कि देशभर की खाक छानकर मोदी सरकार की नीतियों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कार्यकर्ताओं से संवाद और बैठकों का दौर जारी रखा। भाजपा के संगठन विस्तार में शाह की यही दूरदृष्टि काम आई। साथ ही उन्होंने आक्रामक तरीके से विपक्ष के हर सवाल का जवाब भी दिया। राम मंदिर आंदोलन के दौर मे भी भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिली जितनी की इस बार मिली हैं।

इस जीत ने भाजपा की स्वीकार्यता को पूरे देश में न केवल बढ़ाया है बल्कि पीएम मोदी के कद को बढ़ाने का काम किया है। नेहरू और इंदिरा के बाद मोदी ऐसे पीएम बनने जा रहे हैं जो पूर्ण बहुमत के साथ दोबारा सरकार बनाने जा रहे हैं। इस जीत ने भाजपा में अमित शाह को सबसे कामयाब अध्यक्ष और आधुनिक चाणक्य के तौर पर पार्टी में स्थापित कर दिया है।

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