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जानें आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह भारतेंदु हरिश्‍चंद्र का पूरा जीवन सफरनामा

भारत के शेक्सपियर कहे जाने वाली आधुनिक भारत के दिग्गज हिंदी कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन 6 जनवरी को हुआ था। वो अपनी सदी के सबसे महान कवियों में शामिल थे।

जानें आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह भारतेंदु हरिश्‍चंद्र का पूरा जीवन सफरनामा

भारत के शेक्सपियर कहे जाने वाली आधुनिक भारत के दिग्गज हिंदी कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र का निधन 6 जनवरी को हुआ था। वो अपनी सदी के सबसे उन्नत कवियों में शामिल थे। भारतेंदु हरिश्‍चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ था।

उपन्यास और नाटक से समाज का आइना दिखाया (Novels and Drama)

वो एक कवि, उपन्यासकार, नाटककार थे, जिन्होंने कई उपन्यास और नाटक भी लिखे। जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र को इतना लोकप्रिय नाम बना दिया। हरिश्चंद्र के पास एक क्रांतिकारी भावना थी और उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से अपनी सभी राष्ट्रीय भावनाओं को जाना और लोगों को तक फैलाया। उन्होंने अपने उपन्यास में भारतीय समाज में मौजूद उस वक्त की शोषण, गरीब और जरूरतमंदों और समाज के निचले और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए जमकर लिखा।

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म (Birth of Bharatendu Harishchandra)

बचपन भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को वाराणसी में हुआ था। उनके पिता गोपाल चंद्र भी कवि थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखने की प्रेरणा पिता से ही ली। अंग्रेजों के वक्त में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भारतेंदु हरिश्चंद्र को युवा होने पर काफी फायदा मिला। उन्होंने और उनके परिवार ने 1865 में पुरी के जगन्नाथ मंदिर का दौरा किया था, जब भारतेंदु हरिश्चंद्र केवल 15 साल के बच्चे थे।

अन्य साहित्यों का भी ज्ञान (Knowledge of other literature)

भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नाटकों, उपन्यासों और कविताओं का गहन अध्ययन किया, जो बंगाल पुनर्जागरण के दौरान सामाजिक और ऐतिहासिक बदलाव लाने के लिए लिखे थे। उन्होंने बंगाली साहित्य का अध्ययन किया। बंगाली नाटक 'विद्यासुंदर' का हिंदी अनुवाद भी उन्होंने ही किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र हिंदी साहित्य में पूरी तरह से डूब गए और हमेशा हिंदी साहित्य के विकास के लिए बेहतर लेखन में योगदान करने के तरीके अपनाए। उन्होंने हिंदी गद्य और नाटक में नई अवधारणाओं और विचारों को पेश किया और इसे आधुनिक युग के हिंदी लेखन का अग्रणी माना जाता है।

ऐसे मिली थी 'भारतेंदु' की उपाधी (Bharatendu Title)

हालांकि, भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान केवल गद्य और कविता लेखन के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था। वह वास्तव में हिंदी पत्रकारिता के विकास से भी जुड़े थे। उन्होंने हरिश्चंद्र पत्रिका, और बाल वोडिनी जैसी पत्रिकाओं में संपादक के रूप में काम किया। हिंदी के प्रसिद्ध विद्वानों ने उन्हें साल 1880 में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम में 'भारतेंदु' की उपाधि दी। यह व्यक्ति के प्रति सम्मान दिखाने का उनका तरीका था, जिन्होंने हिंदी साहित्य के एक नए युग में नए आधारों को तोड़ दिया था और इस तरह उन्हें 'आधुनिक हिंदी साहित्य का पितामह' बनाया।

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