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एक विकार की ओर बढ़ती ऑनलाइन शॉपिंग

आज जिस तेजी से ऑनलाइन शॉपिंग का प्रचलन बढ़ रहा है, उससे देखते हुए चार साल में स्थिति यह होने वाली है कि अगर ऑनलाइन शॉपिंग को विश्व स्वास्थ्य संगठन, इसे एक विकार घोषित कर दे तो कोई आश्चर्य की बात न होगी। ऑनलाइन शॉपिंग की ताजा स्थिति का विश्लेषण।

एक विकार की ओर बढ़ती ऑनलाइन शॉपिंग
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ऑनलाइन शॉपिंग (फाइल फोटो)

घर बैठे मोबाइल की एक क्लिक से मनचाहा सामान मंगवा लेने की सुविधा, लोगों में धीरे-धीरे लत की तरफ बढ़ रही है। एक रिसर्च कंपनी गार्टनर का दावा है कि आने वाले चार सालों में यानी साल 2024 तक यह इस कदर बढ़ चुकी होगी कि मजबूरन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) इसे लत या विकार घोषित करना पड़ेगा। यह अनुमान इसलिए भी हवा- हवाई नहीं लग रहा, क्योंकि इस समय जबकि पूरी दुनिया कोरोना के जबरदस्त संक्रमण के चलते व्यापक आर्थिक संकट से गुजर रही है, उस समय भी ऑनलाइन शॉपिंग पूरी दुनिया में फल-फूल रही है। भारत में तो ऑनलाइन शॉपिंग उन कुछ पेशों में से अकेला पेशा है, जिससे जुड़े लोग इस घनघोर आर्थिक संकट के समय भी आर्थिक परेशानियों से पूरी तरह से मुक्त हैं। क्योंकि ऑनलाइन शॉपिंग का अच्छा खासा काम तो चल ही रहा है, खूब मुनाफा भी हो रहा है।

ऑनलाइन शॉपिंग का मनोविज्ञान : सवाल है, ऐसे अनुमान क्यों लगाए जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में ऑनलाइन शॉपिंग लत बन जाएगी? इसकी सबसे बड़ी वजह है, ऑनलाइन शॉपिंग का मनोविज्ञान। यह बहुत पहले ही साबित हो चुका है कि जब हम किसी लेन-देन में कैश यानी नगद भुगतान करते हैं तो उस भुगतान को लेकर काफी संवेदनशील होते हैं। लेकिन जब हम नगद भुगतान करने की बजाय किसी को चेक से भुगतान करते हैं, तो बड़े से बड़े भुगतान पर भी हम उस तरह संवेदनशील या परेशान नहीं होते, जिस तरह से हाथों से गिनकर नगद भुगतान करते समय होते हैं। इसकी वजह यह है कि जब हम हाथ से रुपए गिनते हैं तो लगातार यह बोध होता है कि हम बहुत सारे पैसे खर्च कर रहे हैं। लेकिन जब हम कागज के चेक में सिर्फ धनराशि भरते हैं, तो वह तो महज एक नंबर होता है। उस नंबर के प्रति हम बहुत ज्यादा संवेदनशील नहीं हो पाते।

भूल जाते हैं हम अपनी आर्थिक स्थिति : ऑनलाइन शॉपिंग बहुत ज्यादा आगे जाकर हमारी भुगतान संवेदनशीलता को खत्म करती है। यही वजह है कि जब हम ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं तो हमेशा जरूरत से ज्यादा शॉपिंग कर लेते हैं। ऑनलाइन शॉपिंग के समय हम हमेशा अपनी आर्थिक स्थिति या तो भूल जाते हैं या उसकी सरहद तक जाकर जोखिम मोल लेते हैं। नतीजा यह होता है कि हम जरूरत से ज्यादा खरीदारी करते हैं। हिंदुस्तान में बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले नवयुवक सबसे ज्यादा शॉपिंग करते हैं। लेकिन इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि उनके पास ज्यादा पैसा होता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करने वाले अधेड़ उम्र के लोगों के पास भी अच्छा खासा बल्कि नवयुवकों से ज्यादा पैसा होता है, लेकिन वे बहुत खरीदारी नहीं करते। क्योंकि 50 साल या इससे ज्यादा की उम्र के लोग 25 से 30 साल की उम्र के लोगों के मुकाबले ऑनलाइन शॉपिंग एक चौथाई से भी कम करते हैं।

डब्ल्यूएचओ की पैनी नजर : पूरी दुनिया में ऑनलाइन शॉपिंग करने वाले लोग ऑफलाइन शॉपिंग करने वाले लोगों के मुकाबले प्रतिशत में काफी ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। इसका कुल मिलाकर अंतिम नतीजा वित्तीय संकट के रूप में सामने आता है, जो कई किस्म की लाइफस्टाइल बीमारियों का सबब बनता है। यही वजह है कि डब्ल्यूएचओ पिछले कई सालों से बहुत बारीकी से ऑनलाइन शॉपिंग के पहलू पर अपनी नजर बनाए हुए है। लगातार इस पर मनोवैज्ञानिक शोध हो रहे हैं। लगातार इस शॉपिंग के तौर-तरीके को दूसरी तरह की शॉपिंग के तौर-तरीकों से तुलना की जा रही है और इस तमाम प्रक्रिया में जो अलग-अलग तरह के निष्कर्ष सामने आ रहे हैं, उनका साझा निष्कर्ष यह है कि ऑनलाइन शॉपिंग सिर्फ जेब पर ही भारी नहीं पड़ रही, यह हमारे स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ रही है।

शॉपिंग्स-गतिविधियों को रोबोट देंगे अंजाम : डब्ल्यूएचओ अकेला संगठन नहीं है, जो ऑनलाइन शॉपिंग के तमाम भविष्यकालीन नुकसान देखता है। दुनिया के अलग-अलग देशों में मानव व्यवहार पर काम करने वाले मनोवैज्ञानिक संस्थान भी इस पर नजर रखे हुए हैं और उनकी चिंता यह है कि आने वाले दिनों में ऑनलाइन शॉपिंग इसलिए और खतरनाक रूप अख्तियार कर सकती है, क्योंकि इसकी तमाम प्रक्रिया में ह्यूमन इंटरफेयर कम से कम रह जाएगा, यह आर्टिफिशियल इंटलिजेंस या एआई गतिविधि बनकर रह जाएगी। इसका बड़े पैमाने पर मतलब यह है कि आने वाले दिनों में ऐसी तमाम शॉपिंग की गतिविधियों को रोबोट अंजाम देंगे और इसकी डिमांड भी उन्हीं की तरफ से आएगी। मतलब यह कि एक तबके की जिंदगी में बहुत जल्द ही एक ऐसा समय आने वाला है, जब उनके पास न तो कुछ खरीदने के लिए वक्त बचेगा और न ही यह निर्णय करने का वक्त होगा कि क्या और कितना खरीदें? ये दोनों काम एआई के तहत रोबोट करेंगे।

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लोग करेंगे क्रिप्टो करेंसी का इस्तेमाल : तकनीक हमेशा अगर बहुत सारे फायदे लेकर आती है तो कई सारे नुकसान भी साथ लेकर चलती है। अनुमान है कि अगले पांच सालों में ही ज्यादातर लोगों के और इन ज्यादातर में करीब 50 फीसदी लोग शामिल होंगे, जो स्मार्टफोन धारक होंगे लेकिन अपनी तमाम लेन-देन की गतिविधियां बैंकों के जरिए नहीं कर रहे होंगे। इसके लिए ये क्रिप्टो करेंसी का इस्तेमाल कर रहे होंगे। तकनीकी के भविष्य का विश्लेषण करने वाले तमाम वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि आने वाले अगले पांच साल के भीतर इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग डिजाइनरों की निगरानी के लिए एक स्व-विनियमन संघ की स्थापना करनी पड़ेगी, क्योंकि तमाम साइंस फिक्शन की तरह यह आशंका भी बनने लगी है कि ऐसा भी हो सकता है कि आने वाले समय में कभी एआई इतनी मजबूत हो जाए कि वह इंसानों को अपने दुश्मन की तरह चिन्हित करने लगे। लब्बोलुआब यह कि हमें अपनी जिंदगी में तमाम प्रगतिशीलता के बावजूद मानव इंटरएक्शन को बरकरार रखना होगा, नहीं तो इसके नतीजे बहुत ही भयावह हो सकते हैं।

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