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2018 में इन नामी डायरेक्टर्स की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हुईं धराशायी, ये रियल खिलाड़ी भी हुए फेल

2018 में कई नामी फिल्म डायरेक्टर्स की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धराशायी हो गईं। जिनमें जेपी दत्ता की पलटन, विशाल भारद्वाज की पटाखा आदि हैं।

2018 में इन नामी डायरेक्टर्स की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हुईं धराशायी, ये रियल खिलाड़ी भी हुए फेल

2018 में बॉलीवुड में ऐसी कई फिल्में रिलीज हुई जो बॉक्स ऑफिस पर रिलीज हुई और सुपरहिट हुई लेकिन इसी साल कई ऐसी नामी डायरेक्टर्स की फिल्में भी रिलीज हुई जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ दिया। आइए जानते हैं उन डायरेक्टर्स के बारे में....

नामी निर्देशकों की फिल्में हुईं असफल

फ्लॉप होने वाली फिल्मों की किस्मत खराब नहीं होती बल्कि उनसे जुड़े लोगों के काम में ही कुछ कमी रहती है। दर्शक उस कमी को भांप लेते हैं और फिल्म धराशायी हो जाती है। ‘हैप्पी फिर भाग जाएगी’ को ही देख लीजिए।

पिछली वाली फिल्म में सलीके का मनोरंजन देने के बाद जब लेखक-डायरेक्टर एक अच्छी-भली फैमिली फिल्म में भी अश्लीलता पर उतर आएं तो समझ जाइए कि उनके पास देने को उम्दा कंटेंट नहीं है, वो बस मसालों के भरोसे फिल्म को पार लगाना चाह रहे हैं।

अनुराग कश्यप ने ‘मुक्काबाज’ को बेहतर बनाने की कोशिशें तो बहुत कीं लेकिन अंत आते-आते फिल्म फिसल गई। दरअसल, फिल्मकार की निजी सोच का पूर्वाग्रह इसे ले डूबा।

फिल्मकार नीरज पांडेय ने बेहद उलझी हुई और कमजोर कहानी वाली फिल्म ‘अय्यारी’ बनाई, जो अतार्किक थ्रिलर थी, इसका निर्देशन भी अब तक का उनका सबसे कमजोर था। तिग्मांशु धूलिया जैसे काबिल निर्देशक जब न कहानी साध पाएं और न किरदार तो यही लगेगा ‘साहब बीवी और गैंगस्टर 3’ जैसी फिल्म उन्होंने बस संजय दत्त के नाम से दर्शकों को खींचने के लिए ही बनाई है।

पिछले साल ‘टॉयलेट-एक प्रेमकथा’ देने के बाद इस साल ‘बत्ती गुल मीटर चालू’ में श्रीनारायण सिंह फिर से कुछ मैसेज देने की कोशिश करते दिखे लेकिन इस बार कहानी के ताने-बाने इस कदर कमजोर रहे कि कुछ ही देर में फिल्म पटरी से उतर गई।

विशाल भारद्वाज ने ‘पटाखा’ में काफी कुछ डाला लेकिन सवाल उठे कि ये सब डाला ही क्यों? अपनी बात को बिना वजह घुमा-फिरा कर कहने वाली उनकी भारी-भरकम बौद्धिकता फिल्म को ले डूबी।

जब फिल्म आपको सिर्फ कुछ पल के लिए छुए और आपके संग न चले तो वह फिल्म जल्दी भुला दी जाती है। हंसल मेहता जैसे सधे हुए निर्देशक की ‘ओमारटा’ बेमकसद और बेअसर रही। यह फिल्म न उत्तेजित करती है, न उद्वेलित, न भावुक और न ही प्रभावित।

सुधीर मिश्रा की ‘दास देव’ देखने के बाद यह महसूस हुआ कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री किस तरह से उन फिल्मकारों के जेहन में भी घिसे-पिटे रास्तों पर चलने और दूसरों से मुकाबला करने का दबाव बनाती है, जिन्होंने सिनेमा को कभी नई राह दिखाई थी।

विक्रमादित्य मोटवानी की ‘भावेश जोशी सुपरहीरो’ भी लचर पटकथा का शिकार होकर बुरी तरह से पिटी। कमल हासन अपनी ही शानदार फिल्म ‘विश्वरूप’ के अगले पार्ट के तौर पर ‘विश्वरूप- 2’ में सब कुछ एक साथ कहने-करने के फेर में उलझते चले गए और देखने वालों को भी उन्होंने उलझाया।

ढेरों हिट फिल्में दे चुके अनिल शर्मा अपने बेटे की बतौर हीरो पहली फिल्म ‘जीनियस’ में लाए। बुरी तरह थकी हुई कहानी और हल्के निर्देशन के कारण इस फिल्म को लोगों ने नकार दिया। जेपी दत्ता ने ‘पलटन’ में अपने उसी पुराने फौजी फिल्मों वाले फॉर्मूले को पुरानी शैली में ही पेश किया तो दर्शकों ने नकार दिया।

‘आई एम कलाम’ और ‘कड़वी हवा’ से तारीफें पा चुके नीला माधव पांडा की ‘हल्का’ अपने नाम के मुताबिक बेहद हल्की फिल्म रही। प्रदीप सरकार जैसे काबिल फिल्मकार की काजोल वाली फिल्म ‘हैलीकॉप्टर ईला’ की कहानी अच्छी थी लेकिन प्रभावशाली ढंग से न दिखा पाने के कारण पसंद नहीं की गई।

विपुल शाह ‘नमस्ते इंगलैंड’ में ऐसी कहानी और ऐसे अंदाज नहीं दिखा पाए कि दर्शक इस फिल्म को उन्हीं की ‘नमस्ते लंदन’ जैसा प्यार देते। चंद्रप्रकाश द्विवेदी ‘मोहल्ला अस्सी’ में वो करिश्मा नहीं कर पाए, जो उन्होंने अपनी फिल्म ‘पिंजर’ में दिखाया था।

‘काय पो चे’ और ‘रॉकस्टार’ जैसी फिल्में दे चुके अभिषेक कपूर की पिछली फिल्म ‘फितूर’ प्रभावहीन थी और इस बार उन्होंने ‘केदारनाथ’ में जिस तरह से एक बेहतरीन हो सकने वाले विषय को कमजोर कहानी के जरिए पेश किया, उससे सिनेमा का नुकसान ही हुआ। अभिनय देव ‘ब्लैकमेल’ में जरूरी कसावट, पैनापन और चुटीलापन ही नहीं ला सके और नाकाम रहे।

तारीफें ज्यादा पर कमाई कम

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो तारीफें खूब पाती हैं लेकिन हर किसी की पसंद पर खरी न उतर पाने के कारण कमाई के मामले में पिछड़ जाती हैं। तेज रफ्तार और मसाला फिल्मों के आदी हो चुके दर्शकों के लिए ‘अक्टूबर’ जैसी धीमी और ठहरी हुई फिल्म को जज्ब करना मुश्किल हो गया लेकिन इस तरह की फिल्में एक उम्मीदें जगाती हैं- सिनेमा के लिए और अपने आस-पास की जिंदगी के लिए भी।

नंदिता दास की ‘मंटो’ ने बॉक्स-ऑफिस पर भले ही धमाका नहीं किया लेकिन इस किस्म की फिल्में टिकट-खिड़की से ज्यादा सिनेमा को समृद्ध करती हैं। सआदत हसन मंटो के जीवन को इसमें इतने करीब और पूरी वास्तविकता के साथ दिखाया गया कि मंटो को पढ़ने-चाहने वाला दर्शक इस फिल्म पर फिदा हो जाए। मात्र एक ढाई साल की बच्ची के किरदार वाली ‘पीहू’ ने भी तारीफें पाईं और दिलों को छुआ।

‘तुम्बाड’ हालांकि कोई तूफान नहीं ला पाई लेकिन जिस तरह से इस फिल्म ने एक अनोखी कहानी को एक नए अंदाज के साथ पेश किया, उससे ये संभावनाएं तो प्रबल हुईं कि हिंदी सिनेमा के पास भी विश्वस्तरीय कहानियां कहने का खजाना और जज्बा है। मनोज वाजपेयी वाली ‘गली गुलैयां’ भी सीमित दर्शकों को ही भायी। ‘बायस्कोपवाला’ प्रचार की कमी और बाजार के थपेड़ों का शिकार हो गई वरना यह काफी जानदार फिल्म थी।

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