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चंद्रशेखर आजाद के सही व्यक्तित्व से परिचित कराएगी आजाद की ''राष्ट्रपुत्र'', कई भाषाओं में होगी रिलीज

भारतीय सिनेमा के इतिहास में बॉम्बे टॉकीज का नाम हमेशा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। 1935 से 1955 तक बॉम्बे टॉकीज ने ‘अछूत कन्या’,‘कंगन’,‘आजाद’,‘दोस्त’ के अलावा 115 फिल्मों का निर्माण किया।

चंद्रशेखर आजाद के सही व्यक्तित्व से परिचित कराएगी आजाद की

भारतीय सिनेमा के इतिहास में बॉम्बे टॉकीज का नाम हमेशा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। 1935 से 1955 तक बॉम्बे टॉकीज ने ‘अछूत कन्या’,‘कंगन’,‘आजाद’,‘दोस्त’ के अलावा 115 फिल्मों का निर्माण किया।

साथ ही अशोक कुमार, दिलीप कुमार, मधुबाला के अलावा 280 कलाकारों से देश को परिचित कराया था। अब लगभग 63 साल बाद बॉम्बे टॉकीज के बैनर तले मिलिट्री स्कूल से एजुकेटेड आजाद, बतौर लेखक, निर्देशक और एक्टर, एक फिल्म ‘राष्ट्रपुत्र’ लेकर आ रहे हैं।

यह फिल्म हिंदी, संस्कृत के अलावा चौदह भारतीय भाषाओं में बनी है। साथ ही जर्मन के अलावा 12 विदेशी भाषाओं में फिल्म रिलीज होगी। इस फिल्म से जुड़ी बातचीत आजाद से।

फिल्म ‘राष्ट्रपुत्र’ बनाने का मकसद क्या है?

मैंने बचपन से जो देखा, जो समझा, उससे यह बात समझ आई है कि हमारे देश में देश की आजादी के लिए, अपने प्राणों की आहुति देने वाले क्रांतिकारियों का आकलन सही ढंग से नहीं किया गया।

क्रांतिकारियों को उनका सही स्थान दिलाने के लिए, उन्हें सम्मान देने के लिए मैंने यह फिल्म बनाई है। मैं इस फिल्म के जरिए राष्ट्रवाद का प्रचार-प्रसार करना चाहता हूं। हमारी फिल्म में राष्ट्रवादी विचारधारा से ओत-प्रोत क्रांतिकारी विचारधारा को महत्व दिया गया है।

फिल्म ‘राष्ट्रपुत्र’ में दिखाया है कि चंद्रशेखर अजाद को समय सीमा में नहीं बांधा जा सकता। वह कल भी थे, आज भी हैं और कल भी रहेंगे। हमेशा हीरो ही रहेंगे। हमने दिखाया है कि अगर वे आज जिंदा होते, तो वर्तमान परिस्थितियों में किस तरह से प्रतिक्रिया करते।

फिल्म के लिए आपको काफी रिसर्च भी करनी पड़ी होगी?

मिलिट्री स्कूल से एजुकेशन पूरी करने के बाद मैं पूरा देश घूमा और अपनी संस्कृति को समझने का प्रयास किया। चंद्रशेखर आजाद पर कई साल तक रिसर्च किया। मेरा मानना है कि समाज में घट रही हर अच्छाई और बुराई का दर्पण सिनेमा होता है।

सिनेमा समाज का मार्गदर्शक भी है। अतीत में सिनेमा लोगों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता था। लेकिन वर्तमान समय का सिनेमा आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है। खराब फिल्मों की वजह से सामाजिक जीवन मूल्यों में तेजी से गिरावट आई है।

आपकी फिल्म की कहानी क्या है?

हमारी फिल्म की कहानी 1921 से 2017 तक की है। चंद्रशेखर आजाद के जीवन पर तथ्यपरक जानकारी देने वाली यह भारतीय सिनेमा जगत की पहली फिल्म है। उनके विचार आग के शोलों की तरह थे। अपनी फिल्म के जरिए हम भुलाए जा चुके देश के नायक से देशवासियों का परिचय कराना चाहते हैं।

क्या फिल्म ‘राष्ट्रपुत्र’ को चंद्रशेखर आजाद की बायोपिक माना जाए?

जी नहीं, हमारी फिल्म कहती है कि चंद्रशेखर आजाद क्या थे? अगर वह आज जिंदा होते तो जो परिस्थितियां हैं, उनका मुकाबला कैसे करते? फिल्म की कहानी में चंद्रशेखर आजाद के वक्त और वर्तमान समय दोनों का मिश्रण है।

मेरा मानना है कि चंद्रशेखर आजाद का जो व्यक्तित्व और पुरुषार्थ था, उसे देखते हुए उन्हें जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को देश के लोगों तक नहीं पहुंचाया गया।

चंद्रशेखर आजाद सिर्फ ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ के कमांडर इन चीफ ही नहीं थे, बल्कि वह ढाई हजार क्रांतिकारियों (भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, भगवती चरण वोहरा, दुगा भाभी और अन्य) के गाइड, मार्गदर्शक, दोस्त, फिलॉसफर थे। फिर भी उन्हें पूरे देश में नहीं पहचाना जाता।

आप इस फिल्म को कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में रिलीज कर रहे हैं, इसकी क्या वजह है?

हमारा एकमात्र उद्देश्य क्रांतिकारियों को सम्मान दिलाना है। हम चाहते हैं कि लोग क्रांतिकारियों की विचारधारा को अपनाएं। हमारा मकसद पूरे देश को एक सूत्र में जोड़ना है। हम मुंबई में रहते हैं।

हमें यह नहीं पता कि मणिपुर या नागालैंड की जमीनी सच्चाई क्या है? अरुणाचल में क्या हो रहा है? तभी तो मैंने मणिपुर की मैती भाषा में भी इस फिल्म को बनाया है। मैंने फिल्म ‘राष्ट्रपुत्र’ को हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी, तमिल, तेलुगू में बनाया है।

उसके बाद इसे मराठी, गुजराती, मैती के अलावा सभी भारतीय भाषाओं के अलावा स्पैनिश, जर्मन और 12 विदेशी भाषाओं में डब किया है। लगभग तीस साल पहले संस्कृत भाषा में ‘आदिशंकराचार्य’ नाम की फिल्म बनी थी।

उसके बाद कोई फिल्म अब संस्कृत में बन रही है। इस फिल्म का अंग्रेजी नाम ‘सन ऑफ इंडिया’ है। पंजाबी में ‘आजाद’, हिंदी और संस्कृत में ‘राष्ट्रपुत्र’ है। इसी तरह हर भाषा में फिल्म के नाम अलग हैं। फिल्म को इलाहाबाद, झांसी, लखनऊ, काकोरी, दिल्ली, दिल्ली में लाल किला के पास फिल्माया गया।

फिल्म में आपके अलावा किन कलाकारों ने काम किया है?

बतौर एक्टर इस फिल्म में मेरी दोहरी भूमिका है। मैंने क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का किरदार निभाया है, वहीं वर्तमान समय के नवयुवक आजाद का भी किरदार निभाया है।

फिल्म के अन्य किरदारों में जाकिर हुसैन, आर्यन वैद्य, मनीष चौधरी, रूही सिंह, अनुष्का, जैमी लीवर, अचिंत्य कौर, राकेश बेदी, दीपराज राणा, अतुल श्रीवास्तव, नासिर खान, मोहसिन खान और अन्य कलाकार हैं।

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