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फिल्म समीक्षा: बोर करती है सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म नूर, दर्शकों को झेलना मुश्किल

टीम डिजिटल/हरिभूमि, दिल्ली | UPDATED Apr 21 2017 11:38AM IST
फिल्म समीक्षा: बोर करती है सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म नूर, दर्शकों को झेलना मुश्किल

महिला प्रधान फिल्म करने के लिए मशहूर सोनाक्षी सिन्हा की नूर आज सिनेमाघरों रिलीज हो गई है। पिछली फिल्मों की तरह ही इस फिल्म में भी सोनाक्षी की दमदार एक्टिंग और एक्शन सीन उनके फैन्स को पसंद आएंगे। 

‘नूर’ में बतौर अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्‍हा कुछ नया करती दिखेंगी। फिल्म में अपने नियमों को तोड़ती, खिलती और खुलती 21 वीं सदी की मुंबई की एक कामकाजी लड़की की दुविधाओं और आकांक्षाओं को पेश करती नजर आएंगी।

मुख्य कलाकार: सोनाक्षी सिन्हा, पूरब कोहली, शिबानी डांडेकर, कनन गिल आदि।

निर्देशक: सुनील सिप्पी

निर्माता: भूषण कुमार

अवधि: 116 मिनट 

निर्माता भूषण कुमार और निर्देशक सुनील सिप्पी के साथ सोनाक्षी सिन्हा, पूरब कोहली, शिबानी डांडेकर, कनन गिल जोड़ी दर्शकों ज्यादा पसंद नहीं आएगी। 

निर्देशन

जब फिल्‍म का मुख्‍य किरदार ‘एक्‍शन’ के बजाए ‘नैरेशन’ से खुद के बारे में बताने लगे और वह भी फिल्‍म आरंभ होने के पंद्रह मिनट तक जारी रहे तो फिल्‍म में गड़बड़ी होनी ही है। सुनील सिप्पी ने पाकिस्‍तानी पत्रकार और लेखिका सबा इम्तियाज के 2014 में प्रकाशित उपन्‍यास ‘कराची, यू आर किलिंग मी’ का फिल्‍मी रूपांतर करने में नाम और परिवेश के साथ दूसरी तब्‍दीलियां भी कर दी है।

बड़ी समस्‍या कराची की पृष्‍ठभूमि के उपन्‍यास को मुंबई में रोपना और मुख्‍य किरदार को आयशा खान से बदल कर नूर राय चौधरी कर देना है।

नायिका को नहीं है पत्रकारिता की जानकारी

मूल उपन्‍यास पढ़ चुके पाठक मानेंगे कि फिल्‍म में उपन्‍यास का रस नहीं है। कम से कम नूर उपन्‍यास की नायिका आयशा की छाया मात्र है। 

फिल्‍म देखते हुए साफ पता चलता है कि लेखक और निर्देशक को पत्रकार और पत्रकारिता की कोई जानकारी नहीं है और कोई नहीं तो उपन्‍यासकार सबा इम्तियाज के साथ ही लेखक, निर्देशक और अभिनेत्री की संगत हो जाती तो फिल्‍म मूल के करीब होती। 

ऐसा आग्रह करना उचित नहीं है कि फिल्‍म उपन्‍यास का अनुशरण करें लेकिन किसी भी रूपांतरण में यह अपेक्षा की जाती है कि मूल के सार का आधार या विस्‍तार हो। 

इस पहलू से सुनील सिन्‍हा की ‘नूर’ निराश करती है। हिंदी में फिल्‍म बनाते समय भाषा, लहजा और मानस पर भी ध्‍यान देना चाहिए।

कहानी

‘नूर’ महात्‍वाकांक्षी नूर राय चौधरी की कहानी है। वह समाज को प्रभावित करने वाली स्‍टोरी करना चाहती है, लेकिन उसे एजेंसी की जरूरत के मुताबिक सनी लियोनी का इंटरव्‍यू करना पड़ता है। उसके और भी गम है। उसका कोई लवर नहीं है। बचपन के दोस्‍त पर वह भरोसा करती है, लेकिन उससे प्रेम नहीं करती।

नौकरी और मोहब्‍बत दोनों ही क्षेत्रों में मनमाफिक न होने से वह बिखर-बिखरी सी रहती है। एक बार वह कुछ कोशिश भी करती है तो उसकी मेहनत कोई और हड़प लेता है। 

बहरहाल, उसका विवेक जागता है और मुंबई को लांछित करती अपनी स्‍टोरी से वह सोशल मीडिया पर छा जाती है। उसे अपनी स्‍टोरी का असर दिखता है, फिर भी उसकी जिंदगी में कसर रह जाती है। 

फिल्‍म आगे बढ़ती है और उसकी भावनात्‍मक उलझनों को भी सुलझाती है। इस विस्‍तार में धीमी फिल्‍म और बोझिल हो जाती है। 

अफसोस है कि नूर को पर्दे पर जीने की कोशिश में अपनी सीमाओं को लांघती सोनाक्षी सिन्‍हा का प्रयास बेअसर रह जाता है।

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