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मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष अब 33वें दिन में प्रवेश कर चुका है और हालात लगातार जटिल होते जा रहे हैं। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर खाड़ी क्षेत्र के कई देशों पर पड़ रहा है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है।

इस बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि ईरान समझौते की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान ने ऐसे किसी दावे से इनकार किया है।

बढ़ते सैन्य हमलों और विरोधाभासी बयानों के बीच यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या यह संघर्ष जल्द थमेगा या और बड़े युद्ध का रूप ले सकता है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का संकट और अस्थिर वैश्विक परिदृश्य
वर्तमान वैश्विक तनावों ने पारंपरिक कूटनीतिक तंत्रों की उपयोगिता पर गहरा संदेह पैदा कर दिया है। नाटो जैसे संगठनों की प्रासंगिकता और एकजुटता खतरे में प्रतीत हो रही है, जबकि दुनिया प्रभाव क्षेत्रों की राजनीति और पुरानी शक्ति-प्रतिस्पर्धा की याद दिलाते नए रूपों की ओर बढ़ रही है।

यदि ये संघर्ष नहीं थमे, तो ऊर्जा संकट, सैन्य विस्तार और आर्थिक अनिश्चितता मानव सभ्यता पर इतना गहरा असर डालेंगे कि किसी भी देश के लिए सामान्य स्थिति में लौटना अत्यंत कठिन हो जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है-
क्या दुनिया एक बड़े महायुद्ध की ओर बढ़ रही है या कूटनीति से निकलेगा समाधान?

इसी मुद्दे पर हरिभूमि और INH के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी के साथ विशेष चर्चा में रक्षा विशेषज्ञों, पूर्व राजनयिकों और पत्रकारों ने अपनी राय रखी।

Debate Panel

  • जे.एस. सोढ़ी – लेफ्टिनेंट कर्नल (से.नि.), रक्षा विशेषज्ञ
  • प्रेम कुमार – वरिष्ठ पत्रकार
  • मंजू सेठ – पूर्व राजनयिक
  • डॉ. ब्रह्मदीप अलूने – विदेश मामलों के जानकार

इस वैश्विक संकट पर किसने क्या कहा? ऊपर गए वीडियो में देखें पूरी चर्चा

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