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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच अमेरिका और चीन के बीच एक नया मोर्चा खुल गया है। अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति ट्रंप से शिकायत की है कि चीन प्रतिबंधों को दरकिनार कर रूस और ईरान से बड़े पैमाने पर 'बैन' किया हुआ तेल कम कीमतों पर खरीद रहा है।

Middle East Conflict: अमेरिकी संसद के प्रभावशाली सांसदों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक संयुक्त पत्र भेजा है। इस पत्र में विस्तार से बताया गया है कि कैसे चीन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की धज्जियां उड़ाते हुए रूस और ईरान से रियायती दरों पर कच्चे तेल का आयात कर रहा है।

सांसदों का तर्क है कि जहां एक तरफ अमेरिका और उसके सहयोगी इन देशों पर आर्थिक दबाव बनाने के लिए युद्ध लड़ रहे हैं, वहीं चीन इसी युद्ध का फायदा उठाकर अपनी ऊर्जा लागत को न्यूनतम कर रहा है।

इससे न केवल चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ रही है, बल्कि रूस और ईरान को युद्ध जारी रखने के लिए जरूरी नकदी भी मिल रही है।

​ट्रंप से 'सेकेंडरी सैंक्शन्स' की मांग: क्या होगा असर?

​सांसदों ने राष्ट्रपति ट्रंप से सिफारिश की है कि चीन पर 'सेकेंडरी सैंक्शन्स' लागू किए जाएं। इसका मतलब है कि कोई भी चीनी बैंक या कंपनी जो रूसी या ईरानी तेल के सौदों को प्रोसेस करती है, उसे अमेरिकी वित्तीय प्रणाली से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए।

ट्रंप प्रशासन के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि चीन पहले से ही अमेरिकी व्यापार नीतियों को लेकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ट्रंप इन सिफारिशों पर अमल करते हैं, तो अमेरिका-चीन के बीच 'ट्रेड वॉर' और भी हिंसक रूप ले सकता है, जिसका असर वैश्विक शेयर बाजारों पर पड़ना तय है।

​ईरान युद्ध और तेल की कीमतों का खेल

​ईरान-अमेरिका युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुँच चुकी हैं। ऐसे में रूस और ईरान का तेल, जो पश्चिमी देशों के लिए वर्दान है, चीन के लिए एक 'डार्क मार्केट' अवसर बन गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, चीन इन देशों से तेल खरीदने के लिए डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा 'युआन' का उपयोग कर रहा है, जिससे डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को भी चुनौती मिल रही है।

अमेरिकी सांसदों का कहना है कि अगर इस व्यापारिक गठजोड़ को तुरंत नहीं रोका गया, तो ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध बेअसर साबित होंगे।

​भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कूटनीतिक दबाव

​चीन के खिलाफ इस संभावित कार्रवाई का असर भारत जैसे तेल आयातक देशों पर भी पड़ सकता है। हालांकि भारत ने अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीतिक संतुलन बनाया हुआ है, लेकिन अमेरिका का बढ़ता दबाव नई दिल्ली के लिए भी चिंता का विषय हो सकता है।

फिलहाल, व्हाइट हाउस ने सांसदों के पत्र पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन ट्रंप की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि वे चीन को घेरने के लिए किसी बड़े आर्थिक प्रहार की तैयारी कर सकते हैं।

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