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हाई कोर्ट ने बरेली की युवती द्वारा दर्ज कराए गए दुष्कर्म और वीडियो वायरल करने के केस को साक्ष्यों और सहमति के आधार पर खारिज कर दिया है।

प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत संबंधों और कानून की व्याख्या को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से व्यवस्था दी है कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो उसे बाद में दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने बरेली के इज्जतनगर थाने में दर्ज एक मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी के खिलाफ चल रही पूरी कानूनी कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि "स्वेच्छा से बनाए गए संबंधों को बाद में 'दबाव' का नाम देना कानूनी रूप से गलत है।"

​बरेली का यह था मामला: होटल में दुष्कर्म और वीडियो का आरोप

​इस पूरे विवाद की जड़ बरेली जिले के इज्जतनगर थाने में 1 दिसंबर 2024 को दर्ज कराई गई एक एफआईआर थी। पीड़िता, जो पीसीएस की तैयारी कर रही थी, उसने आरोप लगाया था कि उसकी सहेली के भाई ने उसे धोखे से बरेली के एक होटल में बुलाया और वहां उसके साथ पहली बार दुष्कर्म किया।

पीड़िता का दावा था कि आरोपी ने उस दौरान उसकी एक अश्लील वीडियो बना ली थी और बाद में उसी वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर उसके साथ कई महीनों तक बार-बार शारीरिक संबंध बनाए।

​चचेरे भाई की संलिप्तता और वीडियो वायरल करने का विवाद

​शिकायत में पीड़िता ने यह भी जोड़ा था कि मुख्य आरोपी के चचेरे भाई ने भी उस वीडियो के दम पर उस पर संबंध बनाने का दबाव डाला था। पीड़िता के अनुसार, जब उसने विरोध किया तो आरोपियों ने वह वीडियो उसके परिजनों को भेज दी और उसे बदनाम करने की कोशिश की।

पुलिस ने इस मामले की जांच पूरी कर अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी थी, जिस पर संज्ञान लेते हुए निचली अदालत ने आरोपी को समन जारी कर दिया था।

​हाई कोर्ट का तर्क: सहमति और वयस्कता का महत्व

​आरोपी ने चार्जशीट और अदालती कार्यवाही को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले की बारीकी से जांच करने के बाद हाई कोर्ट ने पाया कि पीड़िता और आरोपी के बीच संबंध लंबे समय से थे। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कुछ बेहद कड़े और स्पष्ट बिंदु रखे:-

सहमति का अधिकार: जब दो वयस्क अपनी मर्जी से शारीरिक रिश्ते में होते हैं, तो वे इसके परिणामों को समझते हैं। इसे जबरन किया गया अपराध नहीं माना जा सकता।

दबाव का दावा बेबुनियाद: कोर्ट ने कहा कि महीनों तक स्वेच्छा से संबंध बनाने के बाद अचानक यह कहना कि यह सब 'दबाव' या 'धमकी' की वजह से हुआ, गले नहीं उतरता।

कानून का दुरुपयोग: अदालत ने माना कि व्यक्तिगत विवादों के कारण कानून का इस्तेमाल किसी को प्रताड़ित करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

​अदालत का फैसला और कार्यवाही रद्द

​अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए बरेली की निचली अदालत में लंबित मुकदमे, पुलिस की चार्जशीट और समन आदेश को पूरी तरह से निरस्त कर दिया।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में मुकदमा चलाना समय की बर्बादी और आरोपी के साथ अन्याय होगा। इस फैसले को लिव-इन रिलेशनशिप और आपसी सहमति से जुड़े मामलों के लिए एक बड़ी नजीर के रूप में देखा जा रहा है।

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