पंकज गुप्ते-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि, किसी भी शासकीय अधिकारी या कर्मचारी को बिना विधिवत विभागीय जांच किए छोटी सजा (लघु दंड) नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि, यदि आरोपों के आधार पर कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा जाता है और संबंधित कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तो ऐसे में विभागीय जांच कराना अनिवार्य है।
दरअसल मामला कोरबा जिले में पदस्थ निरीक्षक (रेडियो) केके पाण्डेय से जुड़ा है। उनके खिलाफ पुलिस अधीक्षक, कोरबा द्वारा एक आपराधिक मामले के दौरान लापरवाही के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। जवाब संतोषजनक न मानते हुए एसपी ने उन्हें एक वेतनवृद्धि एक वर्ष के लिए असंचयी प्रभाव से रोकने की सजा दे दी।
विभागीय जांच जरूरी
इस आदेश को चुनौती देते हुए पाण्डेय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अभिषेक पाण्डेय और ऋषभदेव साहू ने तर्क रखा कि, सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों और छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत, यदि कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है तो विभागीय जांच कराना जरूरी है। बिना जांच के सीधे दंड देना कानूनन गलत है।
बिना विभागीय जांच के दी गई सजा
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू की सिंगल बेंच ने पाया कि, बिना आरोप पत्र जारी किए और बिना विभागीय जांच कराए ही दंडित किया गया, जो विधि के विपरीत है। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए विभाग द्वारा दिया गया लघु दंड निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी दोहराया कि प्रशासनिक प्राधिकारियों को नियमों का पालन करते हुए ही अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए और किसी भी कर्मचारी को दंडित करने से पहले उसे उचित अवसर दिया जाना आवश्यक है।










