यशवंत गंजीर - कुरुद। धमतरी जिले के कुरुद क्षेत्र में विकास और विरासत की टकराहट ने एक नई लड़ाई को जन्म दे दिया है। ग्राम भालू झूलन की वह जमीन, जो वर्षों से निस्तारी, चरागाह और परंपरागत उपयोग के रूप में गांव की जीवनशैली का आधार रही है, अब औद्योगिक पार्क की योजना के कारण विरोध की आग में तप रही है। ग्रामीणों का कहना है कि ‘विकास’ के नाम पर उनकी पुश्तैनी जमीन को हथियाने की कोशिश की जा रही है, और यही असंतोष अब बड़े आंदोलन में बदल चुका है।
ऐसे भड़की विरोध की चिंगारी
गुरुवार को भालू झूलन और डांडेसरा की सीमाओं पर ग्रामीणों का विशाल जनसमूह इकट्ठा हुआ। उनका आरोप है कि प्रस्तावित औद्योगिक पार्क की जमीन वास्तव में उनकी 11 हेक्टेयर निस्तारी भूमि है, जिसे बिना जानकारी के राजस्व रिकॉर्ड में प्रशासन के नाम किया गया। जैसे ही ग्रामीणों को पता चला कि हाल ही में नेशनल हाईवे किनारे हुए भूमि पूजन की जड़ें उनकी जमीन से जुड़ी हैं, आक्रोश और तेज हो गया। ग्रामीणों ने साफ कहा कि उन्हें धुआं उगलने वाली चिमनियां नहीं, मवेशियों के लिए हरियाली और अपनी पारंपरिक निस्तारी जमीन चाहिए।

सीमांकन और खंभे गाड़ने पर भड़का जनाक्रोश
विवाद तब और बढ़ गया जब ग्रामीणों ने देखा कि सीमांकन का काम चुपचाप शुरू कर दिया गया है। चारागाह, मुक्तिधाम और भविष्य की आबादी भूमि के हिस्सों पर सरकारी खंभे गाड़े जाने लगे। यही वह पल था जब ग्रामीणों का सब्र टूट गया और विरोध हल्ला-गुल्ला बनकर सड़क पर उतर आया।
सियासत भी कूदी मैदान में
विरोध की तीव्रता बढ़ते ही राजनीति ने भी मोर्चा संभाल लिया। अजय चंद्राकर की औद्योगिक योजनाओं पर ग्रामीणों ने सवाल खड़े किए और कांग्रेस की ओर से तारिणी चंद्राकर और जिला पंचायत सदस्य नीलम चंद्राकर आंदोलन में शामिल हुईं। उन्होंने कहा कि, विकास का ऐसा मॉडल स्वीकार्य नहीं, जो स्थानीय लोगों को ही उजाड़ दे। नीलम चंद्राकर ने बगौद के मेगा फूड पार्क जैसी विफलता का हवाला देते हुए पूछा- 'क्या इस बार भी जमीन हमारी और लाभ बाहर वालों का होगा?'

प्रशासन की एंट्री और आश्वासन
विरोध बढ़ता देख सूरज बंछोर दलबल के साथ पहुंचे और ग्रामीणों से लंबी बातचीत की। फिलहाल आंदोलन को शांत कराया गया है, लेकिन प्रशासन ने स्पष्ट किया कि उद्योग विभाग के उच्च अधिकारियों से चर्चा के बाद ही किसी भी अगली प्रक्रिया पर फैसला लिया जाएगा।
जमीन से आगे- अस्मिता की लड़ाई
भालुझुलन का यह संघर्ष सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि अस्तित्व, परंपरा और ग्रामीण जीवनशैली की रक्षा का मामला बन चुका है। एक तरफ शासन ‘औद्योगिक भविष्य’ का सपना दिखा रहा है, वहीं ग्रामीण अपनी ‘जमीनी हकीकत’ और जीवनाधार बचाने में जुटे हैं। देखना यह है कि विकास की यह पटरी ग्रामीणों के विश्वास से होकर गुजरेगी या विरोध की लपटों में ही उलझ जाएगी।










