Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

किशनगंगा बांध परियोजना: समझौतों पर कब कायम रहा बदनीयत पाकिस्तान, फिर खानी पड़ी मुंह की

भारत की किशनगंगा बांध परियोजना से परेशान पाकिस्तान को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है। इस पर भारत की शिकायत लेकर विश्व बैंक पहुंचे पाक को भारत के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने की सलाह दी गई है।

किशनगंगा बांध परियोजना: समझौतों पर कब कायम रहा बदनीयत पाकिस्तान, फिर खानी पड़ी मुंह की

भारत की किशनगंगा बांध परियोजना से परेशान पाकिस्तान को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है। इस पर भारत की शिकायत लेकर विश्व बैंक पहुंचे पाक को भारत के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेने की सलाह दी गई है। पाकिस्तान इस विवाद को हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में लेकर गया है जहां भारत ने एक निष्पक्ष विशेषज्ञ की नियुक्ति का प्रस्ताव दिया है।

पाकिस्तान स्थित डॉन न्यूज के अनुसार गत सप्ताह विश्व बैंक के अध्यक्ष जिम योंग किम ने पाकिस्तान सरकार को यह सलाह दी है कि वह इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में ले जाने के अपने फैसले को बदले। पाकिस्तान यह दावा करता आया है कि सिंधु नदी में भारत की कई परियोजनाएं विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में हुए सिंधु जल समझौते का उल्लंघन करती हैं।

गौरतलब है कि विश्व बैंक ने ही सिंधु और उसकी सहायक नदियों के पानी का बंटवारा करने के लिए दोनों देशों के बीच यह समझौता करवाया था। दिलचस्प तथ्य यह है कि इसी मुद्दे पर 2013 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय भारत के पक्ष में फैसला दे चुका है। उसका साफ कहना था कि भारत की परियोजना से 1960 में हुए करार का बिल्कुल उल्लंघन नहीं होता है।

उसे वहां परियोजना का पूरा हक है। इसके बावजूद बदनीयत पाकिस्तान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा पनबिजली परियोजना के उद्घाटन के बाद पहले विश्व बैंक की शरण में पहुंच गया और जब विश्व बैंक ने कहा कि भारत की परियोजना को नहीं रोका जा सकता तो वह फिर से अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पहुंच गया है।

वहां भी भारत ने उसे यह कहते हुए घेर लिया है कि परियोजना के डिजाइन को लेकर जो भी आपत्तियां हैं, उसके लिए निष्पक्ष विशेषज्ञ की नियुक्ति कर दी जाए। अब पाकिस्तान इससे भी बचने की कोशिश कर रहा है क्योंकि उसे लगता है कि जब भी वह कोई मसला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय लेकर जाएगा, भारत निष्पक्ष विशेषज्ञ की मांग कर देगा।

ऐसे में पंचाट में जाने के उसके रास्ते बंद हो जाएंगे और वह अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामलों की सुनवाई का हक ही खो देगा। दरअसल, भारत के खिलाफ आतंकवाद के रूप में छद्म युद्ध लड़ रहे पाकिस्तान को रास्ते पर लाने के लिए भारत ने जल समझौते को कड़ाई से लागू करने का संकल्प ले लिया है।

करीब पांच दशक पहले हुए समझौते के अनुसार भारत अपने हिस्से में परियोजनाएं बनाकर जल का उपयोग करने का हकदार है परंतु उसने कभी इस पर गंभीरता से विचार कर परियोजनाएं नहीं बनाई। पाकिस्तान को समझौते से कहीं ज्यादा पानी मिलता रहा है। और यही वजह है कि अब सिंधु नदी पर पाकिस्तान की 80 प्रतिशत सिंचित कृषि निर्भर करती है।

समझौते का सम्मान पाकिस्तान खुद नहीं कर रहा है। अब उसका तर्क है कि बांध बनाने से न सिर्फ नदी का मार्ग बदलेगा बल्कि पाकिस्तान में बहने वाली नदियों का जल स्तर भी कम होगा। इसलिए इस विवाद की सुनवाई अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में होनी चाहिए। दूसरी तरफ, भारत का दावा है कि सिंधु नदी समझौते के तहत उसे पनबिजली परियोजना का अधिकार है और इससे नदी के बहाव में या फिर जल स्तर में कोई बदलाव नहीं आएगा।

दरअसल, विश्व बैंक के रुख ने पाकिस्तान को इस मामले में बहुत बड़ा झटका दिया है। यदि वह विश्व बैंक का सुझाव नहीं मानता है तो भी उसकी मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। वैसे समझौतों के पालन के मामले में भारत के प्रति दुर्भावना रखने वाले पाकिस्तान का ट्रैक रिकार्ड बहुत खराब रहा है। चाहे शिमला समझौता हो या 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी और जनरल मुशर्रफ के बीच हुआ लाहौर समझौता हो, उसने कभी उनका पालन नहीं किया है।

लाहौर समझौते में पाक ने कहा था कि वह भारत के खिलाफ अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवादियों को नहीं करने देगा। इसके बाद सीमा पार से आए आतंकवादियों ने भारत पर कितने हमले किए हैं, पूरी दुनिया के सामने हैं। वह पहले भी बेनकाब होता रहा है और किशनगंगा परियोजना में फिर विश्व के समक्ष बेनकाब हो गया है।

Next Story
Top