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गौरीशंकर राजहंस का लेख: कौन सुनेगा मजदूरों का दर्द

कोरोना संकटकाल में अभागे मजदूरों पर सही अर्थ में वज्रपात हो गया है। उनका दर्द सुनने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। होना तो यह चाहिए कि राजनीतिक दलों के नेता तूं-तूं, मैं-मैं छोड़कर अपने समर्थकों से कहें कि इन अभागे प्रवासी मजदूरों की वे तहेदिल से भरपूर सहायता करें, उनके दर्द को बांटे। ये बेचारे नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर चल रहे हैं। पूरा देश सांस रोककर प्रतीक्षा कर रहा है कि कब इन अभागे प्रवासी मजदूरों को राहत मिलेगी।

अम्बाला से पैदल सवारी कर लौट रहे प्रवासी मजदूरों को कार ने रौंदा, दर्दनाक मौत

इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना की बीमारी वज्रपात की तरह भारत और दुनिया पर गिरी। इस बीमारी से अमेरिका में हजारों लोग मर गए हैं और यह गिनती बढ़ती ही जा रही है। इटली और यूरोप के दूसरे देशों में भी अनगिनत लोगों की मृत्यु हो गई। भारत में भी बेशुमार लोग संक्रमित हुए और सैंकड़ों लोगों की मृत्यु हो गई। जो लोग संक्रमित हैं उनका भविष्य क्या होगा कहना बहुत ही कठिन है।

इस वायरस के शुरू होने के बाद कुछ प्रवासी मजदूर अपने गांवों में घर गए। परन्तु उनकी संख्या नगण्य रही। आज विभिन्न टीवी चैनलांे पर पक्ष-विपक्ष के दल आपस में तूं-तूं, मैं-मैं में लगे हुए हैं। किसी को मजदूरों के दु:ख-दर्द की चिंता ही नहीं है। देश के टीवी चैनलों पर उन लाखों मजदरों को दिखाया जाता है जो देश के विभिन्न भागों से अपने परिवार के सदस्यों के पैदल अपने गांव की तरफ जाते दिख रहे हैं, जिनमें दूध-मुंए बच्चे और गर्भवती महिलाएं तथा अत्यन्त ही बुजुर्ग पुरूष हैं जो लम्बी दूरी तक चलने में असमर्थ दिखते हैं। जो लोग पैदल चल रहे हैं उनके पैरों में भयानक छाले पड़ गए हैं। कुछ रिक्शे वाले अपनी टूटी फूटी रिक्शा में परिवार के बच्चे और वृद्वजनों को लाद कर अपने गांव जा रहे हैं। यह अन्तहिन कष्टदायक सफर लग रहा है। सारी दुनिया टीवी चैनलों पर इन प्रवासी मजदूरों की दर्दनाक हालत को देखती है। सरकार और कुछ निजी संस्थाएं जगह-जगह पर इनके खाने पीने का प्रबंध कर रही हैं। परन्तु ये सब यथेष्ठ नहीं है। विभिन्न राजनीतिक दल प्रवासी मजदूरों की दयनीय हालत के लिए एक दूसरे पर आरोप लगा कर अपना पल्ला छाड़ रहे हैं। सबसे बुरी हालत महाराष्ट्र, गुजरात और दिल्ली की है। लाखों की संख्या लोग चिलचिलाती धूप में बस और ट्रेनों का इंतजार कर रहे हैं। पर उन्हें कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है।

सभी निराश और हताश होकर एक दूसरे से पूछते हैं कि हमारे गांव जाने वाली ट्रेन कब आएगी या हमें हमारे राज्य में छोड़ने के लिए बसें कब तक आएंगी। परन्तु उन्हें कोई जवाब नहीं मिल रहा है। समझ में नहीं आ रहा है कि इस त्रासदी से देश कब और कैसे उबरेगा। शुरू में तो प्रधानमंत्री के आह्वान पर पूरा देश एक होकर खड़ा हो गया था और सबने वायदा किया था कि वे इस वायरस को भगाकर रहेंगे। परन्तु उन्हें अब तक कोई खास सफलता नहीं मिल पाई है। पूरे देश में एक लाख से अधिक लोग अब तक कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं और संक्रमितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हालांकि कुछ लोग स्वस्थ होकर अस्पतालों से निकले भी हैं। परन्तु उनकी संख्या पर्याप्त नहीं है। इसी दौरान भारत पर विपत्ती का पहाड़ तब टूट पड़ा जब एक भयानक चक्रवात पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और दूसरे तटवर्ती राज्यों में कहर ढहा रहा है। अभी सारी स्थिति स्पष्ट नहीं है। कुछ दिनों के बाद ही पता चलेगा कि इस भयानक चक्रवात ने इन राज्यों का कितना नुकसान कर दिया है। यह सच है कि केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारें मिलकर इस अप्रत्यासित विपत्ती का सामना कर ही हैं और प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाई जा रही है।

जब विभिन्न समाचारपत्रों के संवाददताओं और मीडिया कर्मियों ने प्रभावित लोगों से बात की तो उन्होंने रो-रोकर कहा कि हम लोग बहुत अभागे हैं। कोरोना से बचने के लिए बनाए गए शिविरों में चक्रवात प्रभावित लोग आ रहे हैं। इनमें वे लोग हैं जो चक्रवात से बचने के लिए अपनी जान बचाने के लिये इधर उधर भटक रहे हैं। परन्तु इन शिविरों में सभी प्रभावित लोगों का स्वागत नहीं हो सकता है। क्योंकि लोगों को डर है कि भीड़ बढ़ जाने से अनेक लोग कोरोना से संक्रमित हो सकते हैं।

यह राहत की बात है कि सरकार ने अगले कुछ दिनों में 200 रेलगाड़ियां चलाने का निर्णय लिया है। परन्तु लाखों मजदूर धूप और गर्मी में तड़प तड़प कर अपने गांव जाने के लिए बेचैन हैं। ये कब तक अपने गन्तव्य तक जा पाएंगे, कहना बहुत ही कठिन है। इस बीच अनेक लोग भूख-प्यास और गर्मी से तड़प रहे हैंे। भारत ने ऐसी त्रासदी पहले कभी नहीं देखी थी। बुजुर्गों का कहना है कि 21 वर्ष पहले भी देश ने लगभग इस तरह की विपत्ती झेली थी। परन्तु उस विपदा में देश का जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई नहीं हो पाई।

समय का तकाजा है कि लोग अभागे मजदूरों को राहत प्रदान करें जिससे वे इन कठिन परिस्थितियों से उबर सकें। एक गंभीर समस्या और भी है कि दिल्ली, बुम्बई और अहमदाबाद के अधिकतर कल कारखाने बंद हो गए और अब यदि कभी इनके मालिक इन कारखानों का चलाने या खोलने का प्रयास भी करेंगे तो उन्हें मजदूर प्राप्त नहीं हो पाएंगे।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि इन अभागे मजदूरों पर सही अर्थ में वज्रपात हो गया है और राजनीतिक दलों के नेता तूं-तूं, मैं-मैं छोड़कर अपने समर्थकों से कहें कि इन अभागे प्रवासी मजदूरों की वे तहेदिल से भरपूर सहायता करें। पूरा देश सांस रोककर प्रतीक्षा कर रहा है कि कब इन अभागे प्रवासी मजदूरों को राहत मिलेगी।

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