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विवेक शुक्ला का लेख : भगत सिंह की वो कौन थी

दुर्गा भाभी असल जिंदगी में पत्नी थी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन(एचएसआरए) के सदस्य भगवती चरण वोहरा की। इसी संगठन के सदस्य भगत सिंह भी थे। वोहरा की बम का टेस्ट (Test) करते वक्त विस्फोट में जान चली गई थी। दुर्गा भाभी के अलावा एचएसआरए में और महिलाएं भी एक्टिव थीं।

विवेक शुक्ला का लेख : भगत सिंह की वो कौन थी
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राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद शहर में एक सड़क का नाम दुर्गा भाभी मार्ग है। हो सकता है कि नौजवान पीढ़ी (Young generation) को दुर्गा भाभी के संबंध में कम या कतई जानकारी न हो। वह शहीद भगत सिंह की परम सहयोगी थीं। दुर्गा भाभी, जिनका पूरा नाम दुर्गा देवी वोहरा था, ने एक बार पत्नी बनकर भगत सिंह को पुलिस से बचाया था। वो मशहूर हुईं दुर्गा भाभी के रूप में। उन्हीं को लेकर भगत सिंह और उनके साथी राज गुरु में तनावपूर्ण संबंध भी पैदा होने के दावे किए जाते हैं।

दुर्गा भाभी असल जिंदगी में पत्नी थी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन(एचएसआरए) के सदस्य भगवती चरण वोहरा की। इसी संगठन के सदस्य भगत सिंह भी थे। वोहरा की बम का टेस्ट करते वक्त विस्फोट में जान चली गई थी। दुर्गा भाभी के अलावा एचएसआरए में और महिलाएं भी एक्टिव थीं।

भगत सिंह ने अपने क्रांतिकारी साथी राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर, 1927 को लाहौर में गोरे पुलिस अफसर जेपी सांडर्स की हत्या (killing) की। उसके बाद वे मौका-ए-वारदात से फरार हो गए। पंजाब पुलिस उनकी गिरफ्तारी के लिए दबिश मारने लगी। सारे लाहौर को घेर लिया गया। चप्पे-चप्पे पर पुलिस। तब भगत सिंह के साथियों ने तय किया कि दुर्गा भाभी को भगत सिंह की पत्नी बनाया जाए।

दुर्गा भाभी ने इस मिशन को पूरा करने की जिम्मेदारी उठाई। दुर्गा भाभी तय जगह पर पहुंची। वहां पर भगत सिंह थे। तब उनकी गोद में उनका तीन साल का पुत्र साची भी था। तब भगत सिंह एंग्लो इंडियन लुक में दुर्गा भाभी के साथ लाहौर से निकले थे। वे पुलिस की पैनी नजरों से बचने के लिए विवाहित इंसान बनने की कोशिश में सफल रहे। दुर्गा भाभी इस दौरान उनकी पत्नी बनने का रोल कर रही थीं। उनके साथ राज गुरु भी थे। कुछेक जगहों पर पुलिस ने उन्हें रोका भी, लेकिन फिऱ जाने दिया। वे लाहौर रेलवे स्टेशन से निकल गए।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक कुलदीप नैयर ने भगत सिंह के जीवन पर गहन अध्ययन किया था। उनकी अंतिम पुस्तक भगत सिंह पर ही 2015 में आई थी। नाम था विदाउट फियर- दि लाइफ एंड ट्रायल आफ भगत सिंह। उसमें उन्होंने भगत सिंह और राजगुरु के संबंधों में तनाव का निर्भीकता से खुलासा किया। आमतौर पर हमारे यहां शहीद भगत सिंह पर रत्तीभर भी नकारात्मक बात लिखी, कही, सुनी नहीं जाती। कुलदीप नैयर दावा करते हैं कि भगत सिंह के साथी सुखदेव इस बात से नाखुश थे कि भगत सिंह और दुर्गा भाभी के बीच घनिष्ठता बढ़ती जा रही थी।

दुर्गा भाभी का जन्म सात अक्टूबर 1907 को पंडित बांके बिहारी के यहां हुआ। इनके पिता इलाहाबाद कलेक्ट्रेट में काम करते थे। उनका अल्प आयु में ही विवाह लाहौर के भगवती चरण बोहरा के साथ हो गया। इनके ससुर शिवचरण रेलवे में ऊंचे पद पर तैनात थे। भगवती चरण बोहरा राय साहब का पुत्र होने के बावजूद अंग्रेजों की दासता से देश को मुक्त कराना चाहते थे। वर्ष 1920 में पिता की मृत्यु के पश्चात भगवती चरण वोहरा खुलकर क्रांति में आ गए और उनकी पत्‌नी दुर्गा भाभी ने भी पूर्ण रूप से सहयोग किया।

मार्च 1926 में भगवती चरण वोहरा व भगत सिंह ने संयुक्त रूप से नौजवान भारत सभा का प्रारूप तैयार किया और रामचंद्र कपूर के साथ मिलकर इसकी स्थापना की। कहते हैं कि दुर्गा भाभी का काम साथी क्रांतिकारियों के लिए राजस्थान से पिस्तोल लाना व ले जाना था। चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजों से लड़ते वक्त जिस पिस्तोल से खुद को गोली मारी थी वो दुर्गा भाभी ने ही लाकर उनको दी थी।

भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 में फांसी राज गुरु और सुखदेव के साथ फांसी हो जाती है। उनका संगठन बिखर सा गया। उसके बाद दुर्गा भाभी ने 1940 में लखनऊ के कैंट इलाके में एक बच्चों का स्कूल खोला। उसे वह दशकों तक चलाती रहीं।

70 के दशक तक दुर्गा भाभी लखनऊ में ही रहीं। फिर उन्होंने अपने परिवार के कुछ सदस्यों के साथ गाजियाबाद में शिफ्ट कर लिया। उनसे इस लेखक को भी 1992 में मुलाकात करने का मौका मिला। काफी वृद्ध हो चुकी थी दुर्गा भाभी तब तक। गुजरे दौर की यादें धुंधली पड़ने लगी थीं। पर, भगत सिंह का जिक्र आते ही फिर वह उन्हीं दिनों में वापस चली गई थीं। उन्होंने उस सारे घटनाक्रम को सुनाया जब वह बनीं थी भगत सिंह की पत्नी।

कुलदीप नैयर ये भी दावा करते थे कि भगत सिंह ने जेल में लगभग चार किताबें लिखीं हिस्ट्री ऑफ दि रेव्युल्यूशनरी मूवमेंट इन इंडिया, दि आइडियल सोशलिज़्म, अपनी जीवनी और एट दि डोर ऑफ डेथ। कुलदीप नैयर कहते थे कि इन किताबों की हस्तलिपि क्रांतिकारियों द्वारा भगत सिंह की फांसी से पहले ही चोरी छिपे जेल से बाहर निकाल ली गई थी।

इन हस्तलिपियों को क्रांतिकारियों के संरक्षण में ही रखा गया, मगर चालीस के दशक में इन्हें कुमारी लाजवंती को सौंप दिया गया, जो बाद में जालंधर के एक स्कूल की प्रिंसिपल बनीं। लाजवंती ने ये हस्तलिपियां बंटवारे से कुछ समय पहले ही भारत भेजने के उद्देश्य से लाहौर में 'किसी को' सौंप दी। कुलदीप नैयर को विश्वास था कि वो हस्तलिपियां कभी अवश्य सामने आएंगी। खैर, दुर्गाभाभी का 1999 में गाजियाबाद में निधन हो गया था। उसके बाद उनके राजनगर स्थित घर के पास ही दुर्गा भाभी मार्ग और पार्क बने।

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