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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : दुस्साहस बढ़ाती लचर व्यवस्था

देश में कुत्सित प्रवृत्ति के लोगों के विरुद्ध आवाज़ उठाना, खुद को बचाने के लिए हिम्मत दिखाना, दुर्व्यवहार का विरोध करना बेटियों और उनके अपनों के लिए अपराध बन गया है। ऐसे मामलों का सबसे दुखद पक्ष यह है कि वक्त रहते कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। दुस्साहस की हद ही है कि आपराधिक तत्वों को लेकर अगर किसी जागरूक परिवार द्वारा समय पर शिकायत दर्ज करवा दी जाए तो भी असुरक्षा और ऐसे जानलेवा हमले ही परिवारजनों के हिस्से आते हैं। लचर व्यवस्था मनचलों की हिम्मत बढ़ाती है।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : दुस्साहस बढ़ाती लचर व्यवस्था
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डॉ. मोनिका शर्मा

डॉ. मोनिका शर्मा

हमारे परिवेश में स्त्री सम्मान को लेकर सब कुछ सहो, कुछ ना कहो की दुर्भाग्यपूर्ण स्थितियां बन गई हैं। छेड़खानी हो या कोई बर्बर अपराध, अपने-पराये या स्वयं महिलाएं भी मान बचाने के लिए हिम्मत दिखाएं तो जान जाने की सजा मिलती है। 'आवाज़ उठाओ, दोषी को सजा दिलाओ।' दुनियाभर में मानो ये शब्द ध्येय वाक्य की तरह हैं, लेकिन भारत की बेटियों के लिए नहीं। देश में कुत्सित प्रवृत्ति के लोगों के विरुद्ध आवाज़ उठाना, खुद को बचाने के लिए हिम्मत दिखाना, दुर्व्यवहार का विरोध करना बेटियों और उनके अपनों के लिए अपराध बन गया है। कैसी विडंबना और विरोधाभास है कि कोई बेटी और उसके अपने किसी ज़्यादती का विरोध भी ना करें ? शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता जैसे मानवीय हक़ तो आज भी लाडलियों के हिस्से नहीं आए हैं, अब वे अपनी सुरक्षा को लेकर मुखर भी ना हों?

हाल ही में उत्तर प्रदेश के हाथरस में बेटी से छेड़खानी का विरोध करने पर पिता गोली मारकर की हत्या कर दी गई। गौरतलब है कि लड़की के पिता ने आरोपितों के खिलाफ पुलिस में छेड़छाड़ की शिकायत की थी। बीते दिनों राजधानी दिल्ली में भी बहन से छेड़खानी कर रहे मनचलों का विरोध करने पर एक भाई को चाकू मारकर घायल कर दिया। स्कूल से छुट्टी होने के बाद दोनों भाई-बहन अपने घर जा रहे थे। बिहार के जहानाबाद जिले में भी एक युवक को बहन के साथ छेड़खानी कर रहे बदमाशों का विरोध करने पर चाकू से गोदकर गंभीर रूप से जख़्मी कर दिया गया। लंबी फ़ेहरिस्त है ऐसी घटनाओं की। साथ ही ऐसे वाकये भी कम नहीं जिनमें सार्वजनिक स्थल पर किसी अनजान व्यक्ति के लिए भी छेड़खानी का विरोध करना भारी पड़ा।

ऐसे मामलों का सबसे दुखद पक्ष यह है कि वक्त रहते कोई कार्रवाई नहीं की जाती है। दुस्साहस की हद ही है कि बदमाश पुलिस में उनके गलत रवैये की शिकायत किए जाने से और नाराज होते हैं। आपराधिक तत्वों को लेकर अगर किसी जागरूक परिवार द्वारा समय पर शिकायत दर्ज करवा दी जाए तो भी असुरक्षा और ऐसे जानलेवा हमले ही परिवारजनों के हिस्से आते हैं। लचर व्यवस्था मनचलों की हिम्मत बढ़ाती है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहती है। इसी वजह से ऐसी घटनायें न केवल कानून व्यवस्था की चिंतनीय स्थितियां सामने रखती हैं, बल्कि छेड़छाड़ के दुर्व्यवहार को छोटी और सहज बात समझे जाने की सोच का भी आइना हैं। तकलीफदेह है कि हमारे यहां ऐसी अधिकतर शिकायतों की अनदेखी ही की जाती है। शिकायत के बावजूद छेड़खानी की घटनाओं में समय पर कार्रवाई नहीं की जाती। ऐसी लचरता का परिणाम जानलेवा घटना के रूप में सामने आता है, जबकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी महिलाओं से छेड़छाड़ को एक बड़ा अपराध बताते हुए सरकार से इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए कड़ा कानून बनाने की बात कही जा चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक जब तक इस संबंध में कानून नहीं बनता, तब तक सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारें कुछ दिशा-निर्देशों का पालन करें, ताकि सार्वजनिक स्थलों पर महिलाओं की सुरक्षा तय हो ।

व्यापक रूप से देखा जाए तो ऐसी घटनाएं हमारी सामाजिक-पारिवारिक व प्रशासनिक व्यवस्था की दुखद हकीक़त से रूबरू करवाने वाली हैं। पारिवारिक मोर्चे पर रीत रहे समझ-संस्कार और सामाजिक पहलू पर समाज में आ रही भयावह गिरावट की स्थितियां सामने रखती हैं। समाज और परिवार के मोर्चे पर यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि ऐसे बेटे और पुरुष किन घरों से आते हैं, जो इतनी हिमाकत करते हैं। साथ ही इंसानी सोच को लेकर भी सवाल है कि कैसे इस आपदा के दौर में भी हमारे गली-मोहल्लों में छेड़खानी और विरोध करने पर जान ले लेने जैसा कुत्सित व्यवहार जारी है। चिंतनीय है कि अभद्र हरकतों की शिकायत से क्रोधित बदमाशों का ऐसा दुस्साहस आमजन को भयभीत करने वाला है, जबकि ऐसी जानलेवा घटनाएं अचानक नहीं होतीं। प्रशासन की अनदेखी ही ऐसे बदमाशों की हिम्मत बढ़ाती है। हालिया बरसों में ऐसे वाकये भी तेज़ी से बढ़े हैं जिनमें छेड़छाड़ जैसे दुर्व्यवहार को लेकर आवाज़ उठाना भी बेटियों और उनके अपनों के लिए अपराध बना गया है। हालिया मामले में भी दबंगों को पिता द्वारा थाने में छेड़छाड़ की शिकायत करवाना अखर रहा था|

देश के हर कोने में स्कूल-कॉलेज और यहां तक कि दफ्तर आते-जाते भी बेटियां कुत्सित बर्ताव झेलती हैं। राह चलते उनसे छेड़छाड़ और अभद्र टिप्पणियां करना हमारे यहां आम बात है। बावजूद इसके छेड़खानी जैसे दुर्व्यवहार को आम ज़िंदगी का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया गया है, जबकि बदसलूकी और बदतमीजी का यह रवैया बेटियों का घर से बाहर निकलना बंद करवा देता है। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या उनके अपने भी इस बेहूदगी का विरोध ना करें? पुलिस में इस कुत्सित बर्ताव की शिकायत ना करें? अस्मिता को ठेस पहुंचाने वाले दुर्व्यवहार को बेटियां और उनके परिवार चुपचाप सहते रहे ?

दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी कई परिवारों में लड़के उसी सोच के साथ बड़े हो रहे हैं जिसकी बानगी निर्भया के साथ क्रूरता करने वाले सोच में भी दिख चुकी है। ग़ौरतलब है कि निर्भया के एक रेपिस्ट ने एक साक्षात्कार में कहा था कि अगर निर्भया चुप रहती, प्रतिरोध नहीं करती तो उसकी जान नहीं जाती। कहना गलत नहीं होगा कि विचार और व्यवस्था, दोनों ही मोर्चों पर हमारे असुरक्षित परिवेश में बेटियों का जीवन आशंका से घिरा रहता है। शिक्षित होने और आत्मनिर्भरता के सपने देख रही बच्चियां और उनके परिवारजन हर पल इस भय से जूझते हैं कि जाने कब कोई दुर्घटना घट जाए? ऐसी घटनाओं का चिंतनीय पक्ष है जनमानस में असुरक्षा और भय के भाव का आना। अफ़सोस कि छेड़खानी की घटनाओं को आज भी छोटी बात ही समझा जाता है, जबकि छेड़खानी से तंग आकर हर साल कितनी ही लड़कियां आत्महत्या तक लेती हैं। कई परिवार बेटियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं। कम उम्र में उनकी शादी कर देते हैं। छेड़खानी का प्रतिकार करने पर उपजी बदला लेने की भावना के चलते कई लड़कियों पर तेज़ाब फेंकने के मामले भी सामने आए हैं। ऐसे में जरूरी कि ऐसी शिकायतों को पहले कदम पर ही गंभीरता से लिया जाए, ताकि आगे इनकी परिणति ऐसी जानलेवा घटनाओं के रूप में ना हो साथ ही बेटियों को सुरक्षित व सम्मानजनक परिवेश भी मिले।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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