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स्वर्ग में बने भारत और इजरायल के रिश्ते, ये है सबूत

संयुक्त राष्ट्र में महज एक नकारात्मक वोट भारत के साथ हमारे मजबूत संबंधों को कम नहीं कर सकता है। भारत और इजरायल के रिश्ते स्वर्ग में बने हैं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कि ये शब्द भारत और इजरायल संबंधों के फलक को व्यापक बनाते दिखाई दे रहे हैं।

स्वर्ग में बने भारत और इजरायल के रिश्ते, ये है सबूत

संयुक्त राष्ट्र में महज एक नकारात्मक वोट भारत के साथ हमारे मजबूत संबंधों को कम नहीं कर सकता है। भारत और इजरायल के रिश्ते स्वर्ग में बने हैं। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू कि ये शब्द भारत और इजरायल संबंधों के फलक को व्यापक बनाते दिखाई दे रहे हैं। इस व्यापकता को स्पष्ट आयाम देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने जुलाई 2017 में केवल इजरायल की यात्रा कर भारतीय राजनय की मान्य परंपरा को तोड़ने का साहस किया था। अकेले इजरायल की यात्रा कर मोदी ने यह संकेत दे दिया था कि इजरायल से भारत के संबंध अब टैबू की श्रेणी से बाहर आ चुके हैं।

बेंजामिन नेतन्याहू इजरायल के ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो 15 वर्षों में पहली बार भारत दौरे पर आए हैं। साथ ही उनकी यात्रा ऐसे वक्त में हो रही है जब दो मुद्दों पर भारत-इजरायल संबंधों में कुछ झटकों को महसूस किया जा चुका था। पहला झटका भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र में यरुशलम को लेकर अमेरिकी प्रयास के खिलाफ आए प्रस्ताव पर भारत के समर्थन संबंधी था, जबकि दूसरा झटका भारत द्वारा इजरायली कंपनी राफेल एडवान्स्ड डिफेंस सिस्टम्स से टैंक-रोधी निर्देशित मिसाइल (एटीजीएम) ‘स्पाइक’ विकसित करने को लेकर हुए करार को रद करने संबंधी था।

ध्यान रहे कि इजरायली कंपनी ने ‘मेक इन इंडिया’ के प्रावधानों के तहत प्रौद्योगिकी के पूर्ण हस्तांतरण पर अपनी आपत्ति जताई थी, जिसके चलते भारत सरकार ने इस प्रकार का कदम उठाया। हालांकि इस झटके की क्षतिपूर्ति करने के लिए एक विकल्प की चर्चा होती नजर आई। इन दोनों झटकों से इजरायल के व्यवहार में स्थायी परिवर्तन भले ही न आया हो, लेकिन उसने कूटनीति के माध्यम से अपनी नाराजगी जाहिर तो की ही थी। बहरहाल अभी तो नेतन्याहू के भारत आने से उन झटकों का प्रभाव सामान्य हो चुका है जो नई दिल्ली की तरफ लिए गए निर्णयों के जरियं लगते नजर आए थे।

हालांकि भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में उसके फैसले में व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ निहित थे। शायद यही वजह रही कि सोमवार को दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद जारी साझा बयान में फलस्तीन मुद्दे का कहीं जिक्र नहीं था। बहरहाल बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच नौ समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जो साइबर सुरक्षा, पेट्रोलियम, एयर ट्रांसपोर्ट, अंतरिक्ष, होम्योपैथी, निवेश, बैटरी, सोलर थर्मल और संयुक्त फिल्म प्रोडक्शन से हैं। इस दौरान बेंजामिन नेतन्याहू ने स्पष्ट किया कि वे रक्षा में ज्यादा सहयोग चाहते हैं, ताकि दोनों देशों के लोग सुरक्षित रह सकें।

जवाब में नरेंद्र मोदी का कहना था कि उन्होंने इजरायली कंपनियों को भारत में उदार विदेशी निवेश व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए कहा है। यही वजह है कि मोदी-नेतन्याहू बातचीत के बाद जारी साझा बयान में कहा गया है कि इजरायली कंपनियां भारत में ज्वाइंट वेंचर के लिए तैयार हैं। इससे एक बात तो साफ हो जाती है कि भारत-इजरायल संबंधों का नाभिक भारत का रक्षा बाजार है, शेष संबंध इसके इर्द-गिर्द कक्षाओं का प्रतिरूप हैं। भारत-इजरायल संबंधों पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले हमें यह देखने की जरूरत होगी कि विश्व कैसी करवटें ले रहा है और इनमें भारत और इजरायल किस प्रकार की साझा भूमिका निभा सकते हैं।

ऐसा लगता है कि बदलती वैश्विक स्थितियों में अमेरिका एवं रूस अपनी भूमिकाओं का चुनाव पहले ही कर चुके हैं। शायद चीन भी खुद को एशियाई महाशक्ति की परिधि से बाहर निकालकर वैश्विक मंच पर नई भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा से संपन्न है। ऐसे में वैश्विक रणनीतिक परिवेश में उपजने वाली चिंताएं केवल अमेरिका के ही हिस्से में नहीं जाती, बल्कि यदि केंद्र में एशिया को रखकर देखें तो भारत के हिस्से में कहीं ज्यादा आती हैं। अब भू-सामरिक स्थितियां एवं आवश्यकताएं परंपरागत धरातल से हटकर जटिल एवं बहुआयामी हो चुकी हैं जिससे लघु एवं वृहत स्तर के ‘स्ट्रैटेजिक वार जोन’ का निर्माण कर रही हैं।

ऐसे में उस देश (इजरायल), जो यह कहने की ताकत रखता हो (भारत के साथ रक्षा संबंधों में) कि ‘हमें न तो संकोच है और न ही हम शर्मिंदा हैं’ अथवा ‘हमारे रिश्ते स्वर्ग में बने हैं’ पर भरोसा तो किया जा सकता है। इस समय चीन का भारत के प्रति आक्रामक हो रहा रवैया और माॅस्को-बीजिंग-इस्लामाबाद का गठजोड़ तथा अमेरिकी विदेश नीति में अनिश्चितता दोनों देशों के िलए एक-दूसरे के महत्व को बढ़ा देती है। एक और बात, भारतीय रक्षा प्रणाली को तकनीकी दक्षता, कौशल संवर्द्धन और विशेषज्ञता की जरूरत है। बीते दो-ढाई वर्षों के दौरान, दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण सैन्य समझौते भी हुए हैं।

नई सरकार के गठन के बाद सितंबर, 2014 में भारत ने इजरायली एयरोस्पेस इंडस्ट्री की बराक-1 एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदने की घोषणा की थी। यह सौदे 965 करोड़ रुपये में हुए, जिससे पिछली यूपीए सरकार पीछे हट गई थी। भारतीय रक्षा खरीद परिषद ने 8,356 इजराइली निर्मित स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल और 321 लॉंचरों को 52.5 करोड़ डॉलर में खरीदने का निर्णय, जो अब निरस्त हो चुका है। दोनों देश वायु रक्षा प्रणाली पर काम कर रहे हैं जो भारत-इजराइल डिफेंस सहयोग की दिशा में बढ़ता एक सकारात्मक कदम है।

कुल मिलाकर भारत और इजरायल के बीच कूटनीतिक संबंधों को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं और इस दौर में जिन मुद्दों ने भारत तथा इजरायल को एक दूसरे के करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उनमें रक्षा क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन अब भारत चाहता है कि जो चीजें वह इजरायल से खरीद रहा है वे मेक इन इंडिया के तहत भारत में ही बनें। कुछ ऐसे भी उत्पादों का संयुक्त रूप से निर्माण हो जो भारत से बाहर भी बेचे जाएं। इजरायल के पास मानव श्रम की कमी है, जबकि भारत में आधिक्य। इजरायल के पास तकनीक एवं उत्पाद हैं जबकि भारत के पास बड़ा बाजार।

यही नहीं हिंद महासागर निर्मित हो रही चीनी संजाल को कमजोर करने के लिए इजरायल निर्णायक भूमिका निभा सकता है। हां एशिया में हो रहे उथल-पुथल को लेकर इजरायल को भी रुख साफ करना होगा। ध्यान रहे कि मध्य-पूर्व में सऊदी अरब नया आकार लेना चाहता है जिसके चलते शिया-सुन्नी टकराव की संभावनाएं निरंतर प्रबल होती जा रही हैं।

ईरान के खिलाफ सऊदी अरब, इजरायल एवं अमेरिका के बीच निर्मित हुए त्रिपक्षीय रिश्ते को भी भारत को करीब से देखना होगा क्योंकि भारत, अफगानिस्तान और ईरान के साथ त्रिपक्षीय संबंध विकसित करने का प्रयास कर रहा है ताकि चीन-पाकिस्तान गठजोड़ को कमजोर किया जा सके। ऐसे में नई दिल्ली को माइक्रोस्कोपिक आई व्यू की जरूरत होगी क्योंकि इसके बिना आगे बढ़ने पर नए संयोजन के साथ ही नए असंतुलन भी उत्पन्न होंगे। ये अंसतुलन विशेषकर अरब दुनिया के साथ उत्पन्न हो सकते हैं जिनसे जुड़े भारतीय हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

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