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प्रभात कुमार रॉय का लेख : तालिबान से निपटने की चुनौती

तालिबान के अफ़गानिस्तान में सत्तानशीन हो जाने के तत्पश्चात सबसे अधिक खतरा भारत के समक्ष उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि नाटो फौज़ों के विरुद्ध तालिबान को सक्रिय सैन्य सहायता प्रदान करने में पाकिस्तान ने अहम किरदार अदा किया है। तालिबान आते हैं तो पाकिस्तान अपने नापाक़ मंसूबों के तहत तालिबान को कश्मीर में जारी जेहाद में इस्तेमाल करेगा। भारत को अब तक पाक़ और चीन की सैन्य चुनौतियों का मुकाबला करना है, किंतु तालिबान के आधिपत्य में अफ़गानिस्तान यदि चला जाता है तो फिर भारत के समक्ष तालिबान हुकूमत से निपटने की भी चुनौती उपस्थित हो जाएगी।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : तालिबान से निपटने की चुनौती
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

अमेरिकी फौज की वापसी के बाद अफगानिस्तान का भविष्य अधर में है। यक्षप्रश्न है कि क्या अफ़गानिस्तान में इतिहास स्वयं को दोहरा देगा? क्या तालिबान पुनः अफ़गानिस्तान पर आधिपत्य स्थापित कर सकेंगे? तालिबान ने दावा पेश किया कि अफ़गानिस्तान के 85 फीसदी इलाके पर उसके जेहादियों द्वारा सैन्य कब्जा किया जा चुका है। तालिबान के पास इस वक्त तकरीबन एक लाख सक्रिय ज़ेहादी हैं, जबकि अफ़गानिस्तान हुकूमत के पास तकरीबन तीन लाख से अधिक फौज़ है। विगत महीनों में अफ़गान फौज़ अनेक इलाकों में पराजित हुई, किंतु अनेक क्षेत्रों में अफ़गान फौज़ ने तालिबान को जबरदस्त शिकस्त दी है। अफ़गानिस्तान में जबरदस्त गृहयुद्ध जारी है, इससे प्रतीत होता है कि अफ़गान फौज़ का हौंसला बहुत बुलंद है। अफ़गान फौज़ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बड़ी तादाद में अफ़गान नागरिकों ने और विशेष तौर पर अफ़गान महिलाओं ने तालिबान का सशस्त्र मुकाबला करने शानदार हौसला प्रदर्शित किया है। तालिबान द्वारा एक के बाद एक इलाका फतह करके काबुल की तरफ बढ़ने की यही गति कायम बनी रही तो फिर आगामी कुछ ही महीनों में तालिबान का आधिपत्य काबुल पर स्थापित हो सकता है। किंतु अभी इस परिणाम पर पहुंचना जल्दबाजी होगी कि गृहयुद्ध में अफगान फौज़ को निर्णायक तौर पर तालिबान पराजित कर सकेंगे।

तालिबान के अफ़गानिस्तान में सत्तानशीन हो जाने के तत्पश्चात सबसे अधिक खतरा भारत के समक्ष उत्पन्न हो सकता है, क्योंकि नाटो फौज़ों के विरुद्ध तालिबान को सक्रिय सैन्य सहायता प्रदान करने में पाकिस्तान ने अहम किरदार अदा किया है। तालिबान के लिए लगातार लड़ते रहने वाले कुख्यात हक्कानी गिरोह के जेहादियों को पाक़ हुकूमत ने सैन्य सहायता और पाक़ सरजमीन को उपलब्ध कराया। तालिबान आते हैं तो पाकिस्तान अपने नापाक़ मंसूबों के तहत तालिबान को कश्मीर में जारी जेहाद में इस्तेमाल करेगा।

पाक़ प्रधानमंत्री इमरान खान सदैव से ही तालिबान के प्रबल हिमायती रहे हैं। बड़ी ही बेशर्मी के साथ इमरान खान ने ज़ेहादी सरगना ओसामा बिन लादेन को शहीद करार दिया। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ग्रे लिस्ट से पाकिस्तान को प्रोन्नत करके ब्लैक लिस्ट में दाखिल कराके ही इमरान खान अब दम लेंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर इमरान खान ने बेबुनियाद इल्जाम आयद किया कि भारत और पाक़ के मध्य समझौता वार्ता, इसलिए संभव नहीं हो पा रही है, क्योंकि नरेंद्र मोदी आरएसएस की विचारधारा से प्रेरित और संचालित होते रहे हैं। जबकि 2014 में भारत की राजसत्ता संभालते ही नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के साथ ताल्लुकात सुधारने के लिए भरपूर प्रयास अंजाम दिए, यहां तक प्रोटोकॉल तोड़कर नवाज़ शरीफ के घर द्वार तक जा पंहुचे। भारत के साथ समझौता करने के लिए उत्सुक नवाज़ शरीफ का अंततः तख्तापलट कर दिया गया। भारत सरकार का स्पष्ट नजरिया है कि कश्मीर में पाक़ द्वारा प्रेरित और पोषित सशस्त्र जेहाद के जारी रहते हुए पाक़ के साथ कोई समझौता वार्ता मुमकिन नहीं हो सकती।

तालिबान हुक्मरानों ने अमेरिका के साथ चीन और रुस को अपने कूटनीतिक अंदाज में भरोसा दिलाया कि वह अपनी गतिविधियों को अफ़गानिस्तान तक सीमित बनाए रखेंगे और उनको किसी तरह की कोई क्षति नहीं पहुंचाएंगे। एक सितंबर तक अमेरिका के नेतृत्व में नाटो फौज़ों द्वारा अफ़गानिस्तान को पूर्णतः अलविदा कह दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि अमेरिकन फौज़ की कयादत में नाटो फौज़ें वर्ष 2001 में अफ़गानिस्तान में दाखिल हुई और तालिबान को राजसत्ता से बेदखल करके राजधानी काबुल पर अधिकार स्थापित किया था। तकरीबन 20 वर्षों के दौरान नाटो फौज़ें अफ़गानिस्तान में तालिबान के विरुद्ध निरंतर सैन्य संघर्ष करती रही, किंतु तालिबान को निर्णायक तौर पर पराजित नहीं कर पायी, क्योंकि जिस पाकिस्तान को अमेरिका अपना सबसे अहम दोस्त समझता आया था, उसने दगाबाजी अंजाम दी और दोहरा पाखंडी आचरण अंजाम देकर तालिबान को भरपूर सैन्य सहायता फराहम की। अमेरिका के नेतृत्व में नाटो देशों के कूटनीतिज्ञ कतर की राजधानी दोहा में 2018 से तालिबान सरगनाओं से लगातार बातचीत करते रहे।

उल्लेखनीय है कि दुर्भाग्यपूर्ण तौर पर अफ़गानिस्तान की हुकूमत को अमेरिका ने दोहा वार्ता में शिरक़त करने का अवसर प्रदान नहीं किया गया। अंततः दोहा में तालिबान के साथ एक कूटनीतिक समझौता संपन्न हुआ, जिसके तहत करार हुआ कि अफ़गानिस्तान को अधर में छोड़कर नाटो फौज़ें वापस लौट जाएंगी। विगत 20 वर्षों में तालिबान के साथ जंग में अमेरिका और नाटो देशों ने अपने लगभग पच्चीस सौ सैनिकों को कुर्बान किया और तकरीबन पच्चीस हजार सैनिक जख़्मी हुए। अफ़गान फौज़ के तकरीबन सत्तर हजार सैनिक युद्ध में बलिदान हुए। तालिबान के भी तकरीबन पचास हजार जेहादी लड़ाके हलाक़ हुए। अफगानिस्तान में विगत 20 वर्षों के दौरान अमेरिका ने बेशुमार दौलत खर्च की, जोकि एक अनुमानित आंकड़े के मुताबिक तकरीबन 2.50 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है। भारत द्वारा अफ़गानिस्तान के निर्माण में तकरीबन बीस हजार करोड़ लगाए गए हैं।

इतिहास साक्षी है कि तालिबान हुक्मरानों ने 1996 से 2001 तक अफ़गानिस्तान में सत्तानशीन होकर किस कदर वहशियाना जुल्म ओ सितम महिलाओं पर बरपा किया था। अफ़गान लड़कियों की तालीम पर सख्त पाबंदी आयद कर दी गई। तालिबान हुकूमत के इस्लामिक शरिया कानून के तहत मामूली अपराधों पर नृशंस ढंग से कोड़े मारना और साधारण अपराधियों का बर्बर तरीकों से अंगभंग कर देना तालिबान की रोजमर्रा की बर्बर वारदातें थीं। दोहा करार में तालिबान हुक्मरानों ने नाटो देशों यह वादा किया कि वे मानवाधिकारों को पूरा सम्मान प्रदान करेंगे। तालिबान के आधिपत्य क्षेत्रों से जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वो दिल दहलाने वाली है। तालिबान की बुनियादी बर्बर और नृशंस फितरत और उनके द्वारा हुकूमत संचालित करने का अंदाज बिलकुल भी नहीं बदला है। उसके द्वारा विजित इलाकों में फरमान जारी कर दिया कि समस्त औरतों को बुर्का नशीन होना होगा और मर्दों को दाढ़ी रखनी होगी। इस्लामिक शरिया कानून आयद कर दिया गया है।

अफ़गानिस्तान को तालिबान के हाथों बरबाद कराके, यकीनन पाकिस्तान कदापि अमन ओ चैन से सो नहीं सकेगा। तहरीक ए तालिबान पाक़ हुकूमत और फौज़ के दुश्मन रहे हैं। अफ़गानिस्तान में तालिबान की कामयाबी से पाक़ में तहरीक ए तालिबान के हौसले बहुत बुलंद हो जाएंगे और पाकिस्तान में भी गृहयुद्ध प्रारम्भ हो सकता है। पाकिस्तान में पहले से ही धर्मान्ध सरगना शक्तिशाली रहे हैं। भारत के समक्ष भी निपटने तिहरी चुनौती होगी।

(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं, इस लेख में उनके अपने विचार हैं।)

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