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अब सभी के पास होगा निजता की रक्षा का हक

उच्चतम न्यायालय ने देश के सभी नागरिकों को अपनी निजता की रक्षा करने का हक प्रदान कर दिया है।

अब सभी के पास होगा निजता की रक्षा का हक

भारतीय संविधान ने देश के प्रत्येक नागरिक को कई मौलिक अधिकार दिए हैं। इनमें स्वतंत्रता, समानता, जीविका यानी सम्मान से जीने का हक, धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा-संस्कृति और संवैधानिक उपचार आदि शामिल हैं। शीर्ष अदालत के सामने प्रश्न था कि क्या निजता का अधिकार, मौलिक अधिकारों में आता है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने निजता को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना। अदालत ने कहा कि निजता स्वतंत्रता और सम्मान से जीने के हक का हिस्सा है। निजता को मौलिक अधिकार के दायरे में रखकर उच्चतम न्यायालय ने देश के सभी नागरिकों को अपनी निजता की रक्षा करने का हक प्रदान कर दिया है।

इसका मतलब है कि अब निजता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों के दायरे में है। यानी किसी की निजी जानकारी पर केवल उनका ही हक होगा, वे चाहेंगे तो अपनी जानकारी किसी को दे सकते हैं या नहीं दे सकते हैं। इसे ऐतिहासिक फैसला माना जा सकता है।

दरअसल, केंद्र सरकार ने सरकारी योजनाओं के लाभ लेने वालों के लिए आधार को अनिवार्य किया था। इसके बाद लोग इसे निजता का उल्लंघन मानते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर की अध्यक्षता में सर्वोच्‍च अदालत की 9 जजों की संविधान पीठ ने निजता के अधिकार पर एक मत से फैसला सुनाया।

अदालत ने माना कि निजता का अधिकार सबसे अधिक महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार जीने की स्वतंत्रता में ही समाहित है और स्वतंत्रता के अधिकार में ही निजता का अधिकार शामिल है। शीर्ष अदालत ने अपने ही दो पूर्व के फैसले को पलटा है। इन फैसलों में कहा गया था कि निजता मौलिक अधिकार नहीं है।

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पहला 1954 में आठ जजों की खंडपीठ ने एमपी शर्मा व अन्य शबनाम सतीश चंद्र मामले में दिया गया था। दूसरा फैसला 1962 में छह जजों की खंडपीठ ने खड़क सिंह बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दिया था। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट की ही छोटी बेंचों ने कई मामलों में निजता को मौलिक अधिकार बताया।

1978 में मेनका गांधी बनाम भारत सरकार के मामले में भी सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार को मौलिक अधिकार माना गया था। निजता के मौलिक अधिकार बन जाने के बाद अब किसी मामले में अगर आधार से जुड़ी या कोई अन्य निजी जानकारी किसी से मांगी जाती है तो वे आपत्ति जता सकते हैं।

केन्द्र ने निजता को एक अनिश्चित और अविकसित अधिकार बताया था और कहा था कि गरीब लोगों को जिसे जीवन, भोजन और आवास के उनके अधिकार से वंचित करने के लिये प्राथमिकता नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी सरकार ने अपने पूर्व के निर्णय का बचाव किया है।

सरकार की वह दलील सही है जिसमें संविधान में ही कहा गया है कि राष्ट्रीय एकता-अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थितियों में जरूरी होने पर मौलिक अधिकारों को सरकार सीमित कर सकती है। लोगों को समझना होगा कि उन्हें अगर संविधान ने मौलिक अधिकार दिया है तो उसने उनके लिए मौलिक कर्तव्य भी तय किए हैं।

राष्ट्र की एकता-अखंडता और सुरक्षा से ऊपर निजता को नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का आधार से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने केवल निजता के अधिकार पर अपना फैसला सुनाया है। आधार निजता के अधिकार का हनन है या नहीं, इस पर अलग पीठ सुनवाई करेगी।

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प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने दो अगस्त को फैसला सुरक्षित रखते हुए सार्वजनिक दायरे में आई निजी सूचना के संभावित दुरूपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि मौजूदा प्रौद्योगिकी के दौर में निजता के संरक्षण की अवधारणा ‘एक हारी हुई लड़ाई' है।

इससे पहले, 19 जुलाई को सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की थी कि निजता का अधिकार मुक्म्मल नहीं हो सकता और सरकार के पास इस पर उचित प्रतिबंध लगाने के कुछ अधिकार हो सकते हैं। अब शीर्ष अदालत ने निजता को मौलिक अधिकार कहा है तो सरकार के पास अन्य मौलिक अधिकारों को लेकर जो विशेषाधिकार है,

वहीं अब निजता को लेकर भी होगी। हालांकि अभी निजता को परिभाषित किए जाने की भी जरूरत है। क्योंकि जो जानकारी एक व्यक्ति के लिए निजी हो सकती है, वही दूसरे के लिए नहीं हो सकती है। तीन तलाक के बाद शीर्ष अदालत का यह एक और बड़ा फैसला है। अब जनता को अपनी निजता की रक्षा का अधिकार मिल गया है।

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