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आलोक पुराणिक का लेख: महामारी में सहारा बनी खेती

संकट से घिरी अर्थव्यवस्था को खेती सहारा दे सकती है और दे रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल 2020 को केंद्रीय पूल में 7.39 करोड़ टन का अनाज भंडार था, जो न्यूनतम जरूरी भंडार की मात्रा का साढ़े तीन गुना था। इसके लिए किसानों को धन्यवाद कहा जाना चाहिए, जिनकी मेहनत से देश अन्न के मामले में आत्मनिर्भर है।

किसान रथ ऐप के जरिए फसल की बाजार-मंडी में होगी बिक्री, किसान ऐसे उठा सकते हैं लाभBig relief to farmers, paddy purchase will be done from old record

आलोक पुराणिक

कोविड-19 से पैदा हुई परिस्थितियों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर को गहरा धक्का लगने की आशंका है। विश्व बैंक ने अपने आकलन में साफ किया है कि 2020-21 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 1.5 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत के बीच रह सकती है। नीति आयोग के सदस्य और कृषि अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ रमेश चंद के अनुसार ऐसी सूरत में कृषि और संबंधित क्षेत्रों की विकास दर तीन प्रतिशत रह सकती है। यानी अर्थव्यवस्था के बाकी क्षेत्रों के मुकाबले कृषि की विकास दर बेहतर दिख सकती है।

संकट से घिरी अर्थव्यवस्था को खेती सहारा दे सकती है और दे रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल 2020 को केंद्रीय पूल में 7.39 करोड़ टन का अनाज भंडार था, जो न्यूनतम जरुरी भंडार की मात्रा का साढ़े तीन गुना था। इसके लिए किसानों को धन्यवाद कहा जाना चाहिए, जिनकी मेहनत से देश अन्न के मामले में आत्मनिर्भर है। 2013-14 में देश में अनाज का उत्पादन 26.40 करोड़ का था, जो 2018-19 में बढ़कर 28.70 करोड़ टन हो गया। पर यह मुद्दा अपनी जगह बना हुआ है कि देश में किसानों की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है।

ऐसी खबरें आती हैं कि किसानों ने आर्थिक समस्याओं के चलते आत्महत्या कर ली। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2018 में खेती से जुड़े 10,349 लोगों ने आत्महत्या की। ऋण चुकाने में असमर्थता इसके एक महत्वपूर्ण कारण के तौर पर चिन्हित की जा सकती है। कृषि की लागत कम रखने को लेकर कई तरह के विचार सामने आए हैं। हाल में एक विचार बहुत चर्चा में रहा है, जीरो बजट नेचुरल फार्मिंग। महाराष्ट्र के किसान सुभाष पालेकर ने इस पर काम किया है। पर अभी इसका व्यापक प्रचार-प्रसार नहीं हुआ है। अप्रैल 2016 को ई-नाम यानी इलेक्ट्रानिक नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट की शुरुआत हो चुकी है। इसके व्यापक असर आने वाले सालों में महसूस किए जाएंगे।

महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि किसानों को उनके उत्पादों की उचित कीमत नहीं मिलती है, इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति को लेकर संकट खड़ा होता रहता है। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए दुविधा का सवाल खड़ा हो जाता है। अगर खाने पीने की चीजों से जुड़ी कीमतों को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो निश्चय ही किसानों की आय का स्तर एक सीमा तक बढ़ सकता है। पर खाने पीने की चीजों की कीमतों का रिश्ता आम आदमी की जिंदगी से है, इसलिए सरकारें संवेदशीलता दिखाती हैं। इंडियन कौंसिल फार रिसर्च आन इंटरेशनल इकोनोमिक रिलेशन्स नामक भारतीय शोध संस्थान और वैश्विक वित्तीय संगठन आर्गनाइजेशन फाॅर इकोनोमिक कारपोरेशन एंड डेवलपमेंट के जुलाई 2018 के एक शोधपत्र के अनुसार सरकार की ऐसी ही तमाम नीतियों के कारण उपभोक्ता तमाम वस्तुओं पर औसतन 25 प्रतिशत कम कीमतें चुकाते हैं। यूं कई महत्वपूर्ण कृषि उपजों के लिए न्यूनतम मूल्य समर्थन योजना है, पर उस योजना के असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर उतने सकारात्मक नहीं पड़े हैं, जितने पड़ने चाहिए थे।

बड़ा प्रश्न यह है कि कृषि से जुड़ी तमाम वस्तुओं की जो कीमत उपभोक्ता चुकाता है, उस कीमत का कितना हिस्सा किसान को जाता है। कर्नाटक में काफी उत्पादकों की एक संस्था-नेशनल ग्रोअर्स फेडरेशन के आकलन के अनुसार उच्च-स्तरीय महंगे रेस्टोरेंट में उपभोक्ता एक कप काफी की कीमत 250 रुपये देते हैं, इस राशि में से सिर्फ एक रुपया ही किसान को मिलता है। अमूल डेयरी उत्पादों से जुड़ी सहकारी संस्था के मामले में एक रुपये की कीमत में अस्सी पैसे यानी अस्सी प्रतिशत रकम डेयरी से संबंद्ध किसानों को जाती है। यानी मूल प्रश्न यह नहीं है कि कितनी कीमत उपभोक्ता चुकाता है, महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बीच के मध्यस्थों के हिस्सा-बांट के बाद कितनी रकम किसान को मिलती है। कृषि-वित्त से जुड़े राष्ट्रीय संस्थान नाबार्ड-नेशनल बैंक फाॅर एग्रीकल्चर एंड रुरल डेवलपमेंट के अनुसार 2016-17 में भारत में किसानों की औसत मासिक आमदनी 8931 रुपये प्रति माह थी। निश्चय ही ये असंतोषजनक हैं। 2022-23 तक किसानों की आय का स्तर 2015-16 की आय के स्तर के मुकाबले दोगुना होना है, 2015-16 में किसानों की औसत मासिक 8059 रुपये थी इसकी दोगुनी राशि यानी 16,118 रुपये प्रति माह का स्तर 2022-23 तक आना चाहिए। यह कई कारणों से चुनौतीपूर्ण है।

2019-20 के केंद्रीय बजट के आंकड़ों के अनुसार प्रधानमंत्री किसान योजना के तहत 2019-20 में 75,000 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, पर संशोधित अनुमानों के अनुसार इस मद में 54,370 करोड़ खर्च का अनुमान था। 2020-21 में भी प्रधानमंत्री किसान योजना के लिए 75000 करोड़ का प्रावधान रखा गया है। इसके तहत किसान परिवारों को हर साल कुल 6000 रुपये की धनराशि उपलब्ध करायी जाती है। कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों के कारण इस मद में खर्च बढ़ाने की मांग सामने आ सकती है।

केंद्र सरकार 10000 फार्मर्स प्रोड्यूसर्स आर्गनाइजेशन विकसित करने की नीति पर अमल कर रही है। फार्मर्स प्रोड्यूसर आर्गनाइजेशन एक ऐसा विशिष्ट संगठन स्वरुप है, जिसमें कंपनी और सहकारी संगठन की विशिष्टताएं, खूबियां उपलब्ध होती हैं। किसान इनका इस्तेमाल करके आय बढ़ा सकते हैं। यानी कई किसान एक साथ इकठ्ठे होकर अपनी संगठित शक्ति के कारण खरीद और बिक्री के फैसलों में सामूहिक सामर्थ्य का असर दिखा सकते हैं। किसानों को उनके उत्पादों की कीमत उचित स्तर पर मिलती रहें, तो किसानों की आर्थिक समस्याएं कम होंगी। इसके लिए जरुरी है कि किसानों का सीधा संपर्क बड़े खरीदारों से हो। किसानों के उत्पादों की उचित मार्केटिंग हो, उनके ब्रांड बेहतरीन बनें। आधुनिक दौर में सिर्फ उत्पाद की कीमत नहीं है, ब्रांड की कीमत है। ब्रांड बनाना विशेषज्ञता वाला काम है। एफपीओ इस तरह के कामों को दक्षता से कर सकते हैं। खाद्य-प्रसंस्करण क्षेत्र में भारतीय किसानों के संगठन भरपूर आय पैदा कर सकते हैं। अमूल ब्रांड से जुड़े संगठनों के कामकाज इस संबंध में भारतीय किसानों के लिए उदाहरण का काम कर सकते हैं। दरिद्रता खेतिहर की नियति नहीं है, पर किसानों को उनकी वर्तमान स्थितियों से उबारने के लिए नीतिगत पुरुषार्थ आवश्यक है। 1965 में भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था-जय जवान जय किसान। यही नारा फिर दोहराने का वक्त आ गया है।

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