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गजल जैगम की कहानी : उजले पाक-अंधेरे पाक

चंदनिया को आस थी कि उसका प्यार उसे एक न एक दिन जरूर उसके पास ले आएगा। इसी आस में चंदनिया ने कई साल गुजार दिए

गजल जैगम की कहानी : उजले पाक-अंधेरे पाक
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गांव की भोली-भाली चंदनिया का पति शादी के कुछ समय बाद ही उसे छोड़कर मुंबई चला गया और चंदनिया को जैसे भूल ही गया। लेकिन चंदनिया को आस थी कि उसका प्यार उसे एक न एक दिन जरूर उसके पास ले आएगा। इसी आस में चंदनिया ने कई साल गुजार दिए। क्या चंदनिया का इंतजार कभी खत्म हो पाया?
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‘अबकी फागुन मा, जब उजेल पाक पड़ी है तो ‘ऊ’ अवय्या है।’ चंदनिया ने अपने सफेद-सफेद मोतियों जैसे दांत झिलमिलाते हुए मुस्कुराकर एक बार फिर ऐलान किया। उसके ऐलान को सुनते ही बड़ी अम्मा ने बेजारी से पानदान का ढक्कन जोर से बंद किया और हाथ में सरौता उठाकर अंदर वाले कमरे में चल दीं। उनके तख्त से टिकी-बैठी बल्कि आधी पसरी सी चंदनिया के चेहरे की वह चमक भी उन्होंने नहीं देखी, जो उसके पक्के गहरे सांवले रंग की खूबी थी।
वह देखतीं भी भला क्यों? क्योंकि चंदनिया जिसका नाम कभी चांदनी था, बिगड़ कर चंदनिया बन गया था। हर दूसरे महीने ही अपने ‘ऊ’ के आने की खबर सुनाती थी। उसका ‘ऊ’ मुंबई जैसी महानगरी में रहता था। चंदनिया से शादी करने के बाद ही वह उसको छोड़कर चलता बना था। इस बात को छ: साल गुजर चुके थे। पहले कभी-कभी तीज-त्यौहार पर वह चंदनिया को मनीऑर्डर से थोड़ा-बहुत पैसा भी भेजता था, पर अब तो वह भी आना बंद हो गया था। वह अब लौटकर कभी आएगा भी नहीं, किसी को क्या परवाह थी। लेकिन चंदनिया को पक्का यकीन था कि उसकी बेपनाह सच्ची मुहब्बत यूं बेअसर नहीं जा सकती। उसका ‘ऊ’ एक न एक दिन जरूर लौट आएगा।
चंदनिया इतनी भोली थी कि उसको दुनिया का भूगोल, इतिहास कुछ भी पता नहीं था, हद तो यह थी कि उसको महीनों व दिनों के नाम ठीक से याद नहीं थे, इसीलिए वह अपने ‘ऊ’ के आने की तारीखें दिनों, महीनों में न जोड़कर उजले पाक और अंधेरे पाक यानी चांदनी और अंधेरी रातों के हिसाब से जोड़ती थी। वैसे शायद कुछ जानना, कुछ न जानने से ज्यादा तकलीफदेह है, सब कुछ जानने के लिए ही तो इंसान बौखलाया रहता है और सब कुछ जानकर हासिल होती है एक बेचैनी, एक खलिश, एक और तलाश....
चंदनिया भी इसी दुनिया की वासी थी। पर हर चीज से अलग, उसे तो मुंबई और दिल्ली तक में कोई फर्क नजर नहीं आता था। उसके लिए तो सारे शहर एक समान थे। उसका ख्याल था कि एक बहुत बड़ा सा शहर होगा, जिसमें सभी शहर वाले रहते होंगे। उसे तो बस यह पता था कि बड़े साहब और छोटी बीबी शहर में रहते हैं और वो ‘ऊ’ को समझा-बुझाकर, डांट पिलाकर गांव वापस भेज दें। मैंने उसे लाख समझाया कि चंदनिया हम लोग दिल्ली में रहते हैं, और तुम्हारा ‘ऊ’ मुंबई में रहता है और दोनों शहरों के बीच हजारों मील का फासला है, लेकिन उसकी भैंस जैसी अकल में यह बात आती ही नहीं थी। वह तो बस अपने ही में मस्त रहती।
तेज धूप भरी दोपहर में घास का गट्ठर लेकर अकसर आंगन में आकर खड़ी हो जाती। उसके माथे पर मेहनत का पसीना हीरे की कनी की तरह चमकता है। धूप में उसके पीतल के झुमके झिलमिल करते हैं। उसके तेल चुपड़े बाल दमकते हैं, सेहतमंद हाथ-पांव जिंदगी की ललक में झटपट सारा काम निबटा लेते हैं, कितनी जिंदादिल है यह मजदूर लड़की।
जिंदगी के अभावों का उसे अहसास ही नहीं, फिक्र है तो बस अपने ‘ऊ’ की।
मेरी और उसकी दोस्ती भी बड़े इत्तफाक से हुई, हुआ यूं कि मैं हमेशा की तरह अपनी जाड़े की छुट्टियों में पापा के साथ बड़ी अम्मा से मिलने गांव आई थी। साल में एक बार पापा गांव जरूर आते थे अपनी मम्मी से मिलने और शहर की हलचल से बचने। उन दिनों मैं दिल्ली मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी और देहाती गंवार औरतों से सख्त चिढ़ती थी।
उनके पास से उठती बू से तो मेरा सिरदर्द होने लगता था। गोद में भिनकते, रोते, नाक टपकाते, लार बहाते बच्चों को लिए देहाती औरतों को देखकर मुझे नफरत सी आती थी। हमारे खेतों में काम करने वाली चंदनिया और दूसरी औरतें अकसर हमारे घर आती थीं और बड़ी अम्मा के तख्त के पास जमीन पर बैठकर घंटों बतियाती थीं। बड़ी अम्मा भी उनकी बातों में दिलचस्पी लेतीं और पानदान से तंबाकू या डली निकालकर उनको देतीं। साथ ही साथ उनके दु:ख-दर्द को सुनकर मशविरा भी देतीं।
मैं दालान के आखिरी सिरे पर आराम कुर्सी डाले कोई दिलचस्प किताब पढ़ती रहती। दूर से ही गांववालियों के सलाम का जवाब सिर हिलाकर दे देती। किसी की हिम्मत भी न पड़ती कि शहर में लड़कों के संग ‘दागदरी’ पढ़ रही अंग्रेजी बोलने वाली छोटी बिटिया से कोई बात करने की कोशिश करता। हां, कभी-कभी दो-एक ढीठ किस्म की औरतें मेरे करीब आ जाती तो मैं सिर झुकाकर किताबें पलटती रहती, जब और करीब आ जाती तो मैं चुपचाप उठकर वहां से चलती बनती।
चंदनिया से भी जाड़े की एक सुनहरी सुबह में ही मुठभेड़ हुई। मैं अपनी आरामकुर्सी पर अधलेटी-सी अंग्रेजी का एक मोटा नॉवेल पढ़ने में मगन थी। धूप भी उस दिन हल्के दुशाले-सी नरम-नरम छिटकी थी। सारे घर में गाजर के हलवे की तेज खुशबू फैल रही थी। बड़ी अम्मा बावर्चीखाने में खानसामा को दोपहर के खाने के बारे में ताकीद कर रही थीं। पापा शिकार खेलने गए थे।
मेरी कुर्सी के करीब एक परछाई आकर ठमक गई। हुलिए से लगा कि यह चंदनिया ही होगी।
इधर कई दिनों से वह मेरे करीब घुसने की कोशिश में लगी थी। वह कोई भी बात पूछती तो मैं काफी तेजी से ‘हां’ या ‘नहीं’ में जवाब देकर बात खत्म कर देती। लेकिन वह फिर भी मेरी कुर्सी के करीब आकर खड़ी हो जाती। मेरे बेरुखी का उस पर जरा भी असर नहीं होता था।
चंदनिया काफी देर खामोश खड़ी रही। मैंने भी जान-बूझकर नॉवेल से नजर नहीं उठाई। करीब आधा घंटा इसी चुप्पी में गुजर गया। मेरा दिल भी नॉवेल से उचाट हो गया। एक तपस्वी की तरह चंदनिया अटल खड़ी थी। आजिज आकर मैंने काफी गुस्से से पूछा, ‘क्यों, क्या बात है?’उसने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए। हरी-हरी नर्म शाखों के बीच हरे चने मुस्कुरा रहे थे। अच्छा तो इसने यह भी पता लगा लिया कि मुझे हरे चने बेहद पसंद हैं और खानसामा नाश्ते में खासकर मेरे लिए हरे चने खेत से तुड़वाकर रखता था।
मेरे दिल पर उसकी मासूम मुहब्बत का असर हुआ और मुझे अपनी नफरत पर थोड़ी शर्मिंदगी भी हुई। मैंने लहजे में नरमी लाकर कहा, ‘अच्छा, ठीक है, यह खानसामा को दे दो।’ फिर भी वह उसी तरह हाथों में चने लिए खड़ी रही। उसकी जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा और मैंने उसके हाथों से चने ले लिए। यूं हुई थी हमारी दोस्ती की शुरुआत। फिर तो वह तकरीबन रोज ही आती।
यूं ही कई साल गुजर गए। मेरा मेडिकल का आखिरी साल था और हमेशा की तरह जाड़े की छुट्टियों में मैं और पापा बड़ी अम्मा से मिलने आए हुए थे। अब बड़ी अम्मा भी काफी बूढ़ी और कमजोर हो गई थीं, उनकी मुहब्बत भी कुछ और ही बढ़ गई थी। खुद तो अब उनसे कुछ होता नहीं था, लेकिन नौकरों से तरह-तरह के पकवान बनवाकर हमारी खातिर में पेश किए जा रही थीं।
चंदनिया फिर वारिद हो गई थी और मुझ पर हमेशा की तरह नजराने चढ़ा रही थी। कभी सिंघाड़े तोड़ लाती, तो कभी मक्खन समेत मट्ठा, तो कभी ताजा-ताजा गन्ने का रस लेकर चली आती। लेकिन अब उसके सांवले रंग में गहरापन आ चुका था। हंसी भी कम हो गई थी। पहले तो उसकी बत्तीसी ही कभी नहीं बंद होती थी। सफेद झक दांत, एक बार मैंने पूछा भी था, ‘तू अपने दांत काहे से साफ करती है?’
‘नीम की दातून से।’
वह मुस्कान देकर बोली थी। लेकिन अब उसमें बड़ी अजीब सी तब्दीली आ गई थी, जो उस पर कतई अच्छी नहीं लग रही थी।एक दिन वह बड़ी चुप-चुप देर तक मेरी कुर्सी के पास बैठी रही। मैंने ही कहा, ‘कुछ बोलो न चंदनिया।’
‘एक बात पूछे का है छोटी बीबी’, उसने बड़े मुरझाए लहजे में कहा।
‘हां, पूछो,’ मैंने भी बड़े मूड में आकर कहा।
‘बीबी जी, का शहर मा सबहे लड़कियां गोर होत है?’
‘क्यों?’ मैं हंसने लगी।
‘यह तुमने इस कदर बेतुका सवाल क्यों पूछा?’
उसने शरमा कर कहा, ‘गांव भरे मा सबे कहते हैं कि ओ तुमका सहर ई कारण नहीं ले जात कि तुम करिया हो, उहां ‘ऊ’ कोऊ गोर राखे है जानो?’
‘नहीं, जी नहीं, ऐसा नहीं है। फिर तुम खुद इतनी प्यारी हो, तुम्हारा रंग काला थोड़े है, सांवला है। चमकीला सांवला, हजारों गोरों से कहीं ज्यादा खूबसूरत हो तुम। मालूम है तुमको... तुम्हारा रंग ही असली हिंदुस्तानी रंग है। ऐसा रंग पाने के लिए गोरे अंग्रेज घंटों साहिल की रेत पर नंगे बदन पड़े रहते हैं और जब तुम हंसती हो तब तो और भी अच्छी लगती हो। ये गांव वाले बेवकूफी की बातें करते हैं। इन पर ध्यान मत दो। तुम्हारे ‘ऊ’ जरूर आएंगे... भला तुम्हें छोड़कर वह कैसे रह सकते हैं?’
मेरे इस तरह के भाषण को सुनकर उसके गाल गुलाल हो चुके थे और वह ‘धत्’ कहकर छम-छम पायल बजाती भाग खड़ी हुई थी।
आखिर वह दिन भी आ गया जब मेरी छुट्टी खत्म होने पर आ गई और हम लोग वापसी के लिए तैयारी करने लगे। बड़ी अम्मा हम लोगों के साथ ले जाने के लिए चावल, सरसों का तेल, अरहर की दाल, अचार, गुड़, चूड़ा, तिल के लड्डू वगैरह बंधवाने लगीं।
तभी चंदनिया बड़ी उदास-उदास सी आंगन में दाखिल हुई। मैंने उसे देखते ही पूछा, ‘क्या बात है चंदनिया, चेहरा क्यों जर्द हो रहा है, बीमार हो क्या?’
‘नाहीं तो,’ कहकर वह मेरे पैरों के पास आकर बैठ गई और नीम के एक तिनके से जमीन पर लकीरें खींचने लगी, फिर बोली, ‘कोओ दवाई है का?’‘काहे की?’ मैंने झल्लाकर पूछा-‘अजब हो तुम भी, कहती हो बीमार नहीं हो, फिर दवा भी चाहिए। तुम्हें हुआ क्या है?’‘बीबी जी! तुम तो दागदरी पढ़ रही हो.... सब जानती होगी... हम का अस दवाई देय दो कि ‘ऊ’ हमका चाहे लागे।’
‘चाहे लागे’, मुझे उसकी बदअकली पर बेहद हंसी आई और मजबूरी पर दु:ख भी हुआ।मैंने समझाते हुए कहा, ‘चंदनिया भला ऐसी दवा कैसे हो सकती है कि कोई किसी को चाहने लगे? ऐसा होता तो सब ही ऐसी दवा खाते खिलाते।’
‘छोटी बीबी, तुम हमका ऐसी दवा पिलाय दो, चाहे हमार सब गहना पाता रखाय लो,’ वह मेरे पैरों पर अपना सिर रखने लगी।
मैं बेहद घबरा गई, तभी खानसामा लपक कर मेरे पास आ गया और चंदनिया को डांटने लगा, ‘चल उठ, मरी जा रही है उसके लिए जिसका कुछ अता-पता नहीं, क्या-क्या करेगी तू उस निरमोही के लिए पगली, चल अब घर जा’।
चंदनिया थकी-थकी सी उठकर चल दी।
तब खानसामा ने मुझे बताया कि चंदनिया ने अपने ‘ऊ’ को पाने के लिए क्या-क्या जतन नहीं किए। पीर-फकीर-पंडित सभी आजमा डाले, मंदिर में कई रातें भूखी-प्यासी पड़ी पूजा करती रही। गंगा में एक टांग पर भी खड़ी रहकर देख लिया। तंत्र-मंत्र, जादू-टोना सब करा डाला।दूसरे दिन जब हम लोग स्टेशन चलने के लिए निकलने ही वाले थे, तो चंदनिया आ गई। बड़ी अम्मा ने उसकी चुप्पी तोड़ने के लिए चुटकी ली, ‘क्यों री तेरा ‘ऊ’ अबकी उजले पाक में आ रहा है न?’‘ऊ’ अब कोनो उजले पाक न अंधेर पाक मा अयहैं... ‘ऊ’ अब कभी न अयहैं...।’ उसने बेहद ठंडेपन से कहा और नीम के तिनके से दालान के कच्चे फर्श पर आड़ी-तिरछी लकीरें कुरेदने लगी।
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