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आलोक पुराणिक का लेख : पटरी पर अर्थव्यवस्था की रफ्तार

रिजर्व बैंक के आकलन में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक आश्वस्ति का भाव है, हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि रिजर्व बैंक या भारत सरकार द्वारा कुछ कदमों को उठाए जाने की जरूरत खत्म हो गई है। रिजर्व बैंक ने मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था में ब्याज को कम या ज्यादा करने जैसा कोई कदम नहीं उठाया है। रिजर्व बैंक तमाम दरों में परिवर्तन करके संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों में कमी होनी चाहिए या ब्याज दरें ज्यादा होनी चाहिए। रिजर्व बैंक का आकलन था कि 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 9.5 प्रतिशत का सिकुड़ाव होगा, पर अब रिजर्व बैंक का आकलन है कि इसमें सिकुड़ाव 7.5 प्रतिशत ही रहेगा।

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आलोक पुराणिक

रिजर्व बैंक ने हाल में मौद्रिक नीति समिति से जुड़े फैसलों को सबके सामने रखा, उनसे यह बात साफ होती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर बुरी से बुरी आशंकाएं जो व्यक्त की गई थीं, वो सत्य साबित नहीं हो रही हैं। रिजर्व बैंक के आकलन में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर एक आश्वस्ति का भाव है, हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि रिजर्व बैंक या भारत सरकार द्वारा कुछ कदमों को उठाए जाने की जरूरत खत्म हो गई है।

रिजर्व बैंक ने मोटे तौर पर अर्थव्यवस्था में ब्याज को कम या ज्यादा करने जैसा कोई कदम नहीं उठाया है। रिजर्व बैंक तमाम दरों में परिवर्तन करके संकेत देता है कि अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों में कमी होनी चाहिए या ब्याज दरें ज्यादा होनी चाहिए। ब्याज दरों में अगर रिजर्व बैंक द्वारा कमी की जाती, तो मकान के कर्ज और कार-बाइक के कर्ज पर ब्याज कम हो सकता था, इनकी मासिक किश्तों में कमी हो सकती थी, पर रिजर्व बैंक ने कोई भी परिवर्तन करके संकेत दिया है कि ब्याज दरों का स्तर ठीक ही है और कई विशेषज्ञों की उम्मीद और मांग थी कि ब्याज दरों में और कमी की जानी चाहिए।

रिजर्व बैंक का आकलन यह है कि ब्याज दरों में कमी की फिलहाल जरूरत नहीं है और ब्याज दरें यथावत रहें तो भी हालत में बेहतरी हो सकती है। रिजर्व बैंक का आकलन है कि अर्थव्यवस्था का सबसे खराब दौर बीत चुका है। आरबीआइ के मुताबिक चालू वित्त वर्ष (2020-21) की पहली दो तिमाहियों में आर्थिक विकास दर में जो गिरावट हुई है वह अब थम जाएगी। अंतिम दोनों तिमाहियों में आर्थिक विकास की दर के सकारात्मक बने रहने की संभावना जतायी गई है। रिजर्व बैंक गर्वनर डॉ. शक्तिकांत दास ने शुकवार को मौद्रिक नीति की समीक्षा करते हुए कहा कि अक्टूबर-दिसंबर की तिमाही में आर्थिक विकास दर 0.1 फीसद और जनवरी-मार्च की अंतिम तिमाही में 0.7 फीसद की विकास दर रहेगी। हालांकि, पूरे वित्त वर्ष के दौरान आर्थिक विकास दर शून्य से 7.5 नीचे रहेगी। पहले गिरावट की यह दर 9.5 फीसद रहने की बात कही गई थी।

पहले रिजर्व बैंक का आकलन था कि 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था में 9.5 प्रतिशत का सिकुड़ाव होगा, पर अब रिजर्व बैंक का आकलन है कि इसमें सिकुड़ाव 7.5 प्रतिशत ही रहेगा। यानी सिकुड़ाव की आशंकाएं कमजोर हुई हैं। रिजर्व बैंक के पास कुछ आंकड़ें और जानकारियां ऐसी होती हैं, जिन तक दूसरे संस्थानों की पहुंच नहीं होती। रिजर्व बैंक के आंकड़ों और आकलन को विश्वसनीय इसलिए माना जाना चाहिए कि इसके पास प्रामाणिक आंकड़े और जानकारियां होती हैं। जब रिजर्व बैंक 9.5 प्रतिशत के बजाय 7.5 प्रतिशत की गिरावट की बात कर रहा है, तो यह निश्चय ही सकारात्मक है। रिजर्व बैंक का आकलन है अर्थव्यवस्था में सुधार की दर उम्मीद से कहीं बेहतर है।

रिजर्व बैंक के लिए चिंताएं महंगाई के आंकड़ों से आ रही हैं। गौरतलब है कि रिजर्व बैंक की जिम्मेदारियों में से एक जिम्मेदारी यह है कि अर्थव्यवस्था में महंगाई के स्तर को वांछित स्तर पर बनाये रखा जाए। वांछित स्तर से आशय खुदरा महंगाई की 4 फीसदी दर से है। यानी रिजर्व बैंक चाहता है कि खुदरा महंगाई का स्तर 4 फीसदी पर रहे, इसमें ऊपर नीचे की संभावना अगर हो, तो वह यह हो चार प्रतिशत से गिरकर दो प्रतिशत तक आ जाए या चार प्रतिशत से उठकर 6 फीसदी पर आ जाए, पर मोटे तौर पर दो प्रतिशत से नीचे और छह प्रतिशत से ऊपर खुदरा महंगाई का स्तर रिजर्व बैंक को परेशान करता है और चार प्रतिशत के आसपास इसका स्तर रिजर्व बैंक के लिए संतोषजनक रहता है।

महंगाई को लेकर रिजर्व बैंक की चिंता दरअसल ब्याज दरों के साथ जुड़ी हुई। ब्याज और महंगाई का विशिष्ट रिश्ता है। ब्याज दर महंगी हो, तो लोग तमाम आइटमों को खरीदने से पहले बहुत सोचते हैं, क्योंकि ब्याज दर महंगी होती है तो मासिक किश्त मकान की और कार की भी महंगी हो जाती है। ब्याज दर गिरती है तो तमाम आइटमों की मांग बढ़ जाती है और ब्याज दर बढ़ती है, तो तमाम आइटमों की मांग कम हो सकती है। मांग बढ़ती है तो तमाम आइटमों की कीमत भी बढ़ जाती है। इस महंगाई से जनता परेशान हो जाती है। तो मोटे तौर पर ब्याज दरों में कमी कहीं न कहीं महंगाई को बढ़ावा देने वाली भी साबित होती है, इसलिए रिजर्व बैंक ब्याज दरों के फैसलों को महंगाई दर से जोड़कर देखता है, महंगाई दर जो अभी है, वह रिजर्व बैंक की चिंता का कारण है।

मौजूदा तीसरी तिमाही में खुदरा महंगाई दर 6.8 फीसद है और अंतिम तिमाही यानी जनवरी से मार्च 2021 में खुदरा महंगाई दर के 5.8 फीसद रहने का अनुमान लगाया है। 6.8 प्रतिशत और 5.8 प्रतिशत दोनों ही आंकड़े रिजर्व बैंक की चिंता का कारण हैं, इसलिए रिजर्व बैंक कोई ऐसे कदम नहीं उठाना चाहता है, जिनसे महंगाई में कोई बढ़ोत्तरी हो। महंगाई की वजहें तमाम हैं, खास तौर पर कोरोना काल में खाने पीने की चीजों की महंगाई के असामान्य कारण थे। फिर भी महंगाई तो महंगाई है, उसमें अगर ब्याज दरों की कमी के चलते इजाफा हो, तो रिजर्व बैंक के लिए यह चिंता की बात है। इसलिए हाल में ब्याज दरों में गिरावट को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया है।

हाल में रिजर्व बैंक की एक समिति ने सुझाव दिया था कि बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक के लाइसेंस दिए जाने चाहिए। इस विषय पर बहुत विवाद और बहस की शुरुआत हो चुकी है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इस सुझाव को खराब विचार बताया। उनका मानना था कि औद्योगिक घरानों को बैंक चलाने के लाइसेंस नहीं मिलने चाहिए। बैंक लाइसेंस देने की शक्ति भारत में रिजर्व बैंक के पास है।

रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने साफ किया है कि औद्योगिक घरानों को बैंक के लाइसेंस दिए जाएं-यह सुझाव रिजर्व बैंक की एक समिति का है। रिजर्व बैंक ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है यानी रिजर्व बैंक अभी औद्योगिक घरानों को बैंक लाइसेंस देने के लिए बहुत उत्साहित नहीं दिखता। रिजर्व बैंक के गवर्नर के इस बयान से विवादों पर ठंडा पानी पड़ना चाहिए, क्योंकि अगर रिजर्व बैंक ने इस संबंध में नीति ही नहीं बनाई है, तो इस पर विवाद व्यर्थ है। बहस, विमर्श तो किसी भी विषय पर होना चाहिए, पर जब तक रिजर्व बैंक एक साफ फैसला नहीं कर लेता, तब तक एक सार्थक विमर्श संभव नहीं है। कुल मिलाकर रिजर्व बैंक की हालिया घोषणाएं साफ करती हैं कि अर्थव्यवस्था पटरी पर आ रही है और पटरी पर आकर उसकी रफ्तार भी पहले के मुकाबले बेहतर हो रही है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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