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रंगों के पावन संदेशों से सराबोर हो समाज

भारत को पर्व त्यौहारों की भूमि कहा जाता है परंतु ऐसी क्या वजह है कि समाज में तमाम बुराइयों का विस्तार हो रहा है।

रंगों के पावन संदेशों से सराबोर हो समाज
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नई दिल्‍ली .भारत से लौटने के बाद चीनी यात्री ह्वेंग सांग ने अपनी डायरी में एक जगह लिखा है- ‘एक दिन भारत में सभी लोग दीवाने हो जाते हैं। वे लोग इस दिन को होली कहते हैं।’ होली के बारे में बात यहीं आ कर खत्म नहीं हो जाती है, इसके संदेश इससे और भी वृहद हैं। यदि दुनिया इसके संदेशों को आचरण में उतार ले तो धरती से सारी बुराइयों मसलन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, हिंसा और विषमता आदि का अंत हो जाएगा।

हालांकि भारत को पर्व त्यौहारों की भूमि कहा जाता है परंतु ऐसी क्या वजह है कि समाज में तमाम बुराइयों का विस्तार हो रहा है। और अच्छाई एक कोने में दुबकी त्यौहारों के जरिए अपनी बारी का इंतजार करती प्रतीत हो रही है। होली के दिन जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र की दीवारों को प्राय: गिरते देखते हैं, परंतु अन्य दिनों हमारा समाज क्यों इनकी चादर ओढ़े रहता है। इसकी वजह यही है कि अब समाज इस दिन को बस एक उत्सव के रूप में मना कर भूल जाता है, जबकि जरूरत इसके संदेशों को अपने जीवन में उतारने की है। यही वजह है कि बाजार इस पर हावी हो गया है।

दरअसल, हमारे त्यौहारों की आधारशिला ही उस जीवन दर्शन पर टिकी है, जिसका केंद्र बिंदु प्रकृति के साथ साहचर्य है। इस प्रकार देखा जाए तो ये त्यौहार हमें प्रकृति के बनाए नियमों के अनुकूल व्यवहार करने को प्रेरित करते हैं। हमें याद रखनी चाहिए कि होली एक दूसरे से मिलने जुलने, सारे लोगों को वैर भाव भूलकर एक दूसरे को गले लगाने का संदेश देती है। हमें इसके संदेशों को अपने जीवन में उतारना होगा तभी इसकी सार्थकता सिद्ध होगी, वरन इसका महत्व नहीं है। हां, इसका महत्व सिर्फ बाजार के रूप में रहेगा? हम देख सकते हैं कि किस तरह शहरों में जहां बाजार हावी है, वहां होली का सांस्कृतिक स्वरूप गायब हो रहा है।

इस वक्त देश चुनावी रंग में रंगा हुआ है। यहां भी हमें होली का पवित्र संदेश कम और कटुता ज्यादा दिखाईदे रही है। जिन लोगों के कंधों पर आने वाले दिनों में इन संदेशों को जन जन तक पहुंचाने और जीवन में उतारने की प्रेरणा देने की चुनौती होगी, उनका ऐसा व्यवहार निराशाजनक है। चुनावों के दौरान देखा जा सकता है कि किस तरह से भाषा और आचरण की र्मयादाएं टूट रही हैं और निचले स्तर के आरोप-प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं।

जनप्रतिनिधि बनने की चाह रखने वालों को ऐसी भाषा और व्यवहार अंतत: वातावरण को विषैला करते हैं। वहीं हिंसा की सत्ता आज समाज को तोड़ने पर अमादा है। जाहिर है ये सभी हमारी प्रकृति का संदेश, जो कि हर साल होली के जरिए आती है, नहीं है। होली को आपसी प्रेम एवं एकता का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इस पवित्र पर्व के अवसर पर हमें ईष्र्या, द्वेष, कलह आदि बुराइयों को दूर भगाना चाहिए। वास्तव में हमारे द्वारा होली का त्यौहार मनाना तभी सार्थक होगा जब हम इसके वास्तविक महत्व को समझकर उसके अनुसार आचरण करें। इसलिए वर्तमान परिवेश में जरूरत है कि इस होली पर आडंबर की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण होगा। वही सच्ची होली होगी।

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