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प्रभात दुबे की लघुकथा : गर्म हवा

बहू ने मुझे धमकाते हुए कहा था, सुन लिया न बाबूजी, मुझे और उनको आपका ज्यादा घूमना-फिरना पसंद नहीं है

प्रभात दुबे की लघुकथा : गर्म हवा
महानगर की एक शाम, सूरज डूब रहा था। रोज की तरह कॉलोनी के इस पार्क में दो बूढ़े आदमी सीमेंट की एक बेंच पर आकर बैठे ही थे कि तभी एक बूढ़े ने आंखों से चश्मे को उतार कर उसके कांच को पहनी हुई कमीज के निचले हिस्से से साफ करते हुए कहा यार वर्मा जी, पिछले तीन दिनों से शर्मा जी दिखाई नहीं दे रहे, क्या वे बीमार हैं? वर्मा जी ने बड़ी धीमी और दुखी आवाज में बतलाया- खन्ना साहब, आज दोपहर मेरी बहू को घर की नौकरानी बतला रही थी कि शर्मा जी को उनकी बहू और बेटे वृद्ध आश्रम छोड़ आए हैं।
अब वे शायद ही कभी आएं। गहरी खामोशी के बाद एक लम्बी सांस लेकर वर्मा जी ने फिर कहा, यार खन्ना में चलता हूं। अरे यार ऐसी भी क्या जल्दी है? इतनी जल्दी तो आप कभी नहीं जाते। आज कुछ विशेष बात है क्या? खन्ना जी ने बड़ी आत्मीयता से पूछा।
सहमे-बुझे हुए स्वर में वर्मा जी ने बतलाया, खन्ना साहब नौकरानी के जाते ही बहू ने मुझे धमकाते हुए कहा था, सुन लिया न बाबूजी, मुझे और उनको आपका ज्यादा घूमना-फिरना पसंद नहीं है। घर में रहकर घर के कामों में हाथ बंटाया कीजिए। वरना आप स्वयं समझदार हैं।
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