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सावन 2018: क्या मैली ही रहेगी गंगा ?

सावन 2018 का महीना शुरू हो गया है और देश के विभिन्न गंगा घाटों से गंगा जल लेकर लोग शिव मंदिरों में चढ़ा रहे हैं।

सावन 2018: क्या मैली ही रहेगी गंगा ?

सावन 2018 का महीना शुरू हो गया है और देश के विभिन्न गंगा घाटों से गंगा जल लेकर लोग शिव मंदिरों में चढ़ा रहे हैं। बिहार और झारखंड में लोग पैदल यात्रा करके गंगा जल सुलतानगंज जिसे अब ‘गंगा धाम' कहते हैं, वहां से कावंडि़यों का हजारों का जत्था प्रतिदिन रंग-बिरंगी पौशाकें पहनकर झारखंड का वैद्यनाथ धाम जिसे ‘बाबा धाम' भी कहते हैं, वहां भगवान शंकर को गंगाजल अर्पित करते हैं।

सारी यात्रा पैदल ही होती है और यात्रियों को नंगे पांव कई किलोमीटर नुकीले पहाड़ी रास्तों से होकर चलना पड़ता है। ‘बाबाधाम' जिसे ‘देवघर' भी कहते हैं, पहुंचते-पहुंचते कांवड़ियों के पैर रक्तरंजित हो जाते हैं। जल चढ़ाने के बाद इसी जल को बाद में हजारों कावंिड़ये पीते भी हैं। उसी तरह हरिद्वार से प्रतिवर्ष हजारों कांवड़िये कांवड़ लेकर विभिन्न शिव मंदिरों में गंगा चल चढ़ाते हैं।

हाल में ‘हरित न्यायाधीकरण' यानि ‘एनजीटी' ने एक अत्यन्त ही कटु टिप्पणी करते हुए कहा है कि हरिद्वार से बंगाल की खाड़ी तक बहने वाली गंगा में अनेक जगह जहरीले पदार्थ मिल जाते हैं और उस पानी का सेवन करने वाले को सच्चाई का पता लग ही नहीं पाता है। खासकर हरिद्वार से उत्तर प्रदेश के उन्नाव शहर के बीच गंगा का जल पीने और नहाने योग्य नहीं है।

लोग आस्था के कारण इस जल को पीते हैं और इसमें नहाते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता है कि यह जल पीने और नहाने योग्य नहीं है और इस जल का उपयोग करने से उनके स्वास्थ्य पर घातक असर हो सकता है। एनजीटी ने यह भी कहा कि यदि सिगरेट और तम्बाकू के विभिन्न पैकेटों पर सरकार द्वारा यह लिखा जाता है कि इनके सेवन से स्वास्थ्य पर बहुुत बुरा असर पड़ेगा तो उसी तरह गंगा की धारा जहां-जहां विषैली हो गई है,

वहां साइन बोर्ड लगाकर लोगों को यह चेतावनी क्यों नहीं दी जाए कि यहां का जल पीने लायक या उपयोग में लाने लायक नहीं है। एनजीटी ने यह भी कहा है कि शीघ्रातिशीघ्र केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपनी वेबसाइट पर एक मानचित्र डाल देना चाहिये जिसमें यह बताया जा सके कि किन-किन स्थलों पर गंगा का जल पीने और नहाने लायक नहीं है।

प्रश्न यह है कि क्या केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड अविलम्ब इसकी जानकारी लोगों को देगा? अधिकृत सर्वे से अब यह पता चल गया है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में सरकार के लाख मना करने के बाद भी चमड़े की फैिक्ट्रयों और दूसरे उद्योग धंधों से प्रदूषित पानी नालों द्वारा गंगा में गिरता रहता है। विभिन्न राज्य सरकारें लोगों की आंखों में धूल झोंकने का काम करती हैं और इन गंदे नालों, जिनसे प्रदूषित पानी गंगा में बिना रोक टोक गिर रहा है, उस पानी को रोकने का कोई ठोस प्रबंध नहीं करती हैं।

विभिन्न सर्वेक्षणों में यह भी पाया गया है कि गंगा की धारा उन स्थानों पर ज्यादा विषाक्त हो गई है जहां ये जहरीले नाले गंगा में गिरते रहते हैं। इन स्थानों में लोगों को कई प्रकार की गंभीर जानलेवा बीमारियां जैसे टीबी, दमा, डायरिया, कैंसर, टाइफाइड आदि हो जाती हैं। अनेक स्थानों पर लोगों को इस विषाक्त पानी से गंभीर बीमारी लग जाती हैं और अज्ञानतावश आम जनता इस दूषित गंगाजल को पीती रहती है।

समय आ गया है जब इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाए। यह काम केवल केन्द्रीय सरकार ही नहीं कर सकती है। विभिन्न राज्यों की सरकारों और सच कहा जाए तो आम जनता को इसमें पूरा सहयेाग देना होगा। दिन रात रेडियो और टेलीविजन पर सरकार द्वारा यह विज्ञापन दिया जाता है कि पर्यावरण की रक्षा के लिए प्लास्टिक का सामान इस्तेमाल न करें। यदि आप खरीददारी के लिए बाजार जाते हैं तो अपने साथ कपड़े या जूट का थैला लेकर जाएं।

इससे पर्यावरण की रक्षा में बड़ी मदद होगी। उसी तरह रेडियो और टीवी पर यह संदेश दिया जा सकता है कि उन स्थानों का गंगाजल इस्तेमाल नहीं करें जहां यह जल दूषित हो गया है। देर सवेर लोगों में जागरूकता आ ही जाएगी और लोग उन स्थानों के दूषित गंगाजल का इस्तेमाल करने से परहेज करेंगे। साथ ही वे यह भी जान जाएंगे कि किन किन स्थलों पर गंगा जल दूषित है।

बिहार और उत्तर प्रदेश में सरकार द्वारा ऐसे ‘चापाकलों' का इस्तेमाल वर्जित कर दिया गया है जिसका पानी जहरीला हो गया है। इन चापाकलों को लाल रंग से रंग दिया जाता है और वहां एक बोर्ड लगा दिया जाता है कि इस चापाकल का पानी दूषित है। अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए कृपया इसका इस्तेमाल नहीं करें। इसी तरह यदि विभिन्न स्थानों पर जहां गंगा का जल दूषित या जहरीला हो गया है, डिस्पले बोर्ड लगा दिये जाएंगे तो वहां लोग गंगाजल का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

साथ ही लोगों में यह जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है कि गंगाजल को किसी प्लास्टिक की बोतल में नहीं भरा जाए। क्योंकि अक्सर प्लास्टिक की इन बोतलों को लोग गंगा किनारे ही फेंक देते हैं। इस प्लास्टिक की लाखों बोतले गंगा के विभिन्न घाटों पर पड़ी देखी गई हैं और सरकार के लाख प्रयास के बावजूद भी इनकी सफाई नहीं हो पा रही है। भारत सरकार के एक पूर्व पर्यावरण मंत्री ने हाल में कहा है कि पिछले कुछ वर्षों में गंगा की सफाई पर 9 हजार करोड़ रूपये खर्च हो गये हैं।

कुछ पता नहीं चल रहा है कि यह पैसा कैसे खर्च हुआ है किसकी जेब में गया। उचित तो यह होगा कि इस मामले की पूरी छानबीन की जाए और जिन लोगों ने यह पैसा डकारा है उन्हें निश्चित रूप से दंडित किया जाए। गंगा में गंगोत्री से बंगाल की खाड़ी तक केवल गंगाजल ही नहीं रहता है, उसमें अनेक छोटी बड़ी सहायक नदियां और बेशुमार नाले भी मिल जाते हैं। उदाहरण के लिये यमुना का पानी जो अत्यन्त ही दूषित है,

खासकर दिल्ली में यमुना का पानी जो अत्यन्त ही जहरीला हो गया है वह भी गंगा में अविरल गिर रहा है। इस दूषित पानी को रोकने का कोई ठोस प्रबंध नहीं किया जा रहा है। हजारों वर्षों से गंगा को ‘मां' दर्जा दिया गया है। आवश्यकता इस बात की है कि केवल केन्द्र सरकार और राज्य सरकारें ही गंगा की सफाई के लिये सक्रिय न हों बल्कि आम जनता में जागरूकता फैलाई जाए।

क्योंकि यदि गंगा का पानी जहरीली और जानलेवा होता गया तो उसके परिणाम पूरे देश को भुगतने होंगे। एक सर्वे से यह पता चला है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में चमड़े की फैिक्ट्रयों और दूसरे उद्योगों का प्रदूषित पानी गंगा में गिरता रहता है। राज्य सरकारें उस पानी को रोकने का कोई ठोस प्रबंध नहीं करती हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों में यह भी पाया गया है कि गंगा की धारा उन स्थानों पर ज्यादा विषाक्त हो गई है जहां ये जहरीले नाले गंगा में गिरते रहते हैं। यहां गंगा जल प्रयोग करने पर लोगों को कई प्रकार की गंभीर जानलेवा बीमारियां जैसे टीबी, दमा, डायरिया, कैंसर, टाइफाइड आदि हो जाती हैं।

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