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व्‍यंग्‍य: टैक्स फ्री अभिव्यक्ति, पीर फकीरों की मजार पर चादर चढ़ाने वाले क्यों नहीं डरते?

सवाल बार बार यही उठता है कि सिर्फ मंदिर में जाने वाले ही क्यों डरते हैं।

व्‍यंग्‍य: टैक्स फ्री अभिव्यक्ति, पीर फकीरों की मजार पर चादर चढ़ाने वाले क्यों नहीं डरते?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अपने यहां किसे है और किसे नहीं, यह बात कभी अपने पल्ले नहीं पड़ी। सो गहन चिंतन के उपरांत स्वयं से ही उलझने लगता हूं। और बड़बड़ाने लगता हूं- लोकतंत्र की दुहाई देने वाले दोमुंहों तुम्हारी दोगली बातें मेरी समझ में नहीं आतीं। किसी की अभिव्यक्ति को टैक्स फ्री कर देते हो और किसी की अभिव्यक्ति को तनिक भी सम्मान नहीं देते। तुम्हारी सोच को मैं गलत नहीं कहता तो सही भी नहीं कह सकता।

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आखिर एकपक्षीय राग तुम भी अलापने ही लगे। तुम साइकिल की सवारी करो या हाथी की, मुझे इससे कोई सरोकार नहीं है, मगर कम से कम आम आदमी को तो अपनी दोगली सोच से परिचित मत कराओ, बेचारा वैसे ही बहुत डरता है और जब डरता है तो मंदिर का रुख करता है, किसी मस्जिद या गिरिजाघर का नहीं। सिर्फ मंदिर में जाने वाले ही डरते हैं। सवाल बार बार यही उठता है कि सिर्फ मंदिर में जाने वाले ही क्यों डरते हैं, पीर फकीरों की मजार पर चादर चढ़ाने वाले क्यों नहीं डरते? क्या वे अपनी श्रद्धा से चादर चढ़ाने मुदरें पर जाते हैं, क्या उन्हें मुदरें से भी डर लगता है। मेरी यही बात दोगलों को बुरी लगती है। कहते हैं उनके बारे में कुछ मत कहो फतवा जारी हो जाएगा।

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तसलीमा नसरीन की तरह देश निकाला हो जायेगा। सलमान रुश्दी की तरह जगह जगह छुप कर जान बचानी पड़ेगी। यदि ऐसा तर्क करो तो हंगामा। अब एक तरह की अभिव्यक्ति टैक्स फ्री और दूसरी अभिव्यक्ति को फतवा। यह बात कुछ हजम नहीं हुई। अभी कुछ लोग नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाने का जिक्र कर रहे थे। कह रहे थे कि नाथूराम गोडसे उनके आदर्श हैं और अपने आदर्श की पूजा करने का सबको अधिकार है, वे अपने घर में अपने आराध्य की पूजा करें अपने लिए कोई नया आराध्य स्वीकार करें, इसमें कोई अन्य कौन होता है हस्तक्षेप करने वाला।

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आखिर अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है, मगर उन्होंने यह अभिव्यक्ति व्यक्त की तो हंगामा हो गया। कुछ जयचंद कहने लगे कि एक हत्यारे का मंदिर बनाओगे। देश में क्या संदेश फैलाओगे? क्यों भई अभिव्यक्ति का अधिकार क्या केवल फिल्म निर्माताओं को है कि किसी की आस्था को अंधविश्वास बताएं और किसी की आस्था को आस्था। किसी के आडंबर को आडंबर बताएं और किसी के आडंबर को पूर्ण विश्वास।

लोकतंत्र में यदि किसी एक को अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त करने का अधिकार है, तो किसी दूसरे को क्यों नहीं? गॉड, अल्लाह, ईश्वर को अलग अलग दरवाजों में बिठाने वाले भले ही किसी एक को सुप्रीम पॉवर कहते फिरें, मगर सबने अपने अपने गॉड एक दूसरे से अलग क्यों कर दिए। कबीर दास अपने समय के कुशल अभिव्यक्ति व्यक्त करने वाले रहे, जिन्होंने साफ कह दिया कि गॉड को अंधा, बहरा क्यों समझते हो। अब जिसे देखो वही लाउडस्पीकर बजाकर अपनी उपस्थिति का अहसास कराने में जुटा है। जोर जोर से चिल्ला रहा है। एजेंट हर जगह मध्यस्थ की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं।
कहीं घी के दीपक जलाये जा रहे हैं, कहीं अगरबत्तियों का धुंआ नाक में एलर्जी उत्पन्न कर रहा है, कहीं केंडिल जलाई जा रही हैं। आखिर सबकी अपनी अपनी आस्थाएं हैं। इन आस्थाओं को भले ही आडंबर का नाम दो और करोड़ों रुपए की कमाई करो, कोई मना नहीं कर सकता। सवाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो ठहरा, मगर मेरा सवाल अपनी जगह पर कायम है कि जीयो और जीने दो की लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी की अभिव्यक्ति टैक्स फ्री और किसी की अभिव्यक्ति पर हंगामा। आखिर ये दोगलापन क्यों ?
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