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अनिता भारती का व्यंग्य : एक नया दल बनाएं

फिलवक्त तो जरूरत है एक छतरी तले आकर सामूहिक एकजुटता का प्रदर्शन करना।

अनिता भारती का  व्यंग्य : एक नया दल बनाएं
नए दल में शामिल होने की पहली शर्त होगी, एक-दूसरे पर भरपूर अविश्वास होना, मगर सार्वजनिक मंचों से गजब का विश्वास प्रदर्शित करना। स्वभाव में टांग खींचने की केकड़ा प्रवृत्ति का पाया जाना और उसे सिर्फ बंद दीवारों के भीतर ही आजमाना। सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के नेतृत्व में आस्था का अव्वल दर्जे का दिखावा करना।
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यदि उम्र के तकाजे से आप संन्यास आश्रम में प्रवेश कर चुके हैं या पूर्ण कर चुके हैं, पांव कब्र में लटके हों, मगर मन अभी बेताल की तरह सियासी पेड़ से उलटा लटका हो, तन लरज-लरज जाता हो, किंतु हसरतें और हरकतें देखकर लोग दांतों तले अंगुली दबा लेते हों। और जिनकी राजनीति में संभावनाएं ‘कांग्रेस’ हो चुकी हैं, ऐसे लोगों से नैतिक आह्वान किया जाता है कि वे आएं और एक नया दल बनाने का श्रीगणेश करें।
जब राजनीति में संभावनाएं खत्म होती हैं, तब राष्ट्र हित के रूप में यह नैतिक प्रेशर आ जाता है कि नया दल बनाकर तथाकथित विध्वंसकारी शक्तियों से मुकाबला कर लोकतंत्र की रक्षा करें! लोकतंत्र के रक्षार्थ यह नैतिक बल है, जिसके मुहाने पर बैठकर नए दल का बिगुल फूंका जा सकता है। वैसे भी नया दल खिचड़ी बनाने की तरह होता है, बस रायता फैलाने का हुनर आना चाहिए। चार बेमेल लोग स्वार्थ के इरादे से एक स्थान पर आकर बैठ भर जाएं, तो विक्रमादित्य के टीले की तरह दल बनाने को स्वप्रेरित हो जाते हैं।
वैसे प्रेरणा के लिए यह उक्ति ही काफी है कि कहीं की र्इंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति का कुनबा जोड़ा।आज सारा सिस्टम चीख-चीखकर कह रहा है कि प्रोफाइल पिक्चर बदली जाए। नए दल से पूर्व चिंतन, मंथन, विचार, चुनाव चिन्ह, सिद्धांत जैसी बातों के लिए दर-दर की खाक छानने की कोई दरकार नहीं होती। ये सब बाद में दल की नीयत और नियति के आधार पर तय होते रहते हैं या ना भी हों, तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता।
फिलवक्त तो जरूरत है एक छतरी तले आकर सामूहिक एकजुटता का प्रदर्शन करना। एक दूसरे को लाख पसंद ना करें, भले फूटी आंख न सुहाएं, मन में कृट-कूट कर जहर भरा हो, लेकिन उसे नीलकंठ की तरह गले में थाम कर देश धर्म की जिम्मेदारियों का गरल कह कर ऊंचाइयां प्रदान कर सकते हैं। भीतर कितनी ही धूर्तता भरी हो, मगर चेहरे पर स्माइल ऐसी हो कि लोगों के साथ-साथ खुद भी चकमा खा जाएं। यह चकमा खा जाना ही, हमारे लिए चमकने का अवसर है। वरना हम चुक-चुके हैं। चुक चुके लोग जल्द ही फुंके हुए मान लिए जाते हैं। हमारी फूंक बची रहे, इसलिए बेमेल ही सही, मगर यूनिटी ही हमारी एकमात्र उम्मीद है। वैसे भी यूनिटी करेंगे, तो बचेंगे। बचे रहे तो फिर टूट तो कभी -कभी सकते हैं।
नए दल में शामिल होने की पहली शर्त होगी, एक-दूसरे पर भरपूर अविश्वास होना, मगर सार्वजनिक मंचों से गजब का विश्वास प्रदर्शित करना। स्वभाव में टांग खींचने की केकड़ा प्रवृत्ति का पाया जाना और उसे सिर्फ बंद दीवारों के भीतर ही आजमाना। सार्वजनिक रूप से एक-दूसरे के नेतृत्व में आस्था का अव्वल दर्जे का दिखावा करना। दल में लोकतंत्र होने का दावा किया जा सकता है, लेकिन उसमें अपने-अपने परिवारों को बढ़ाने की फुल छूट होगी। कायदे से यह परिवार पार्टी ही होगी, मगर शक्ल से राष्ट्रीय लगनी चाहिए। प्लीज, चुनाव तक आपसी लड़ाई को बंद ही रखें।
अपने भीतर के पीएम, सीएम बनने के इरादों की भनक खुद को भी नहीं लगनी चाहिए। चुनाव नतीजों के बाद वे पार्टी से बाहर जाने, तोड़ने, नई बनाने को पूर्णत: स्वतंत्र होंगे। यह दल सूखाग्रस्त लोगों के लिए ही होगा, चाहें तो उसे दल के रूप में राजनीतिक पुनर्वास की संज्ञा दे सकते हैं।समय आने पर पार्टी तोड़ने और अपने परिवार के लिए नई उप पार्टी बनाने के लिए उकसाया जाएगा। कहने को तो यह नाम के आधार पर एक पार्टी ही होगी, मगर उसके भीतर सबकी अपनी-अपनी पार्टियां रहेंगी।तो फिर देर किस बात की, आइए इस विचारधारा से सहमत सभी लोग साथ आएं और बनाएं एक नया दल।
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