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आ बैल मुझसे पंगा ले, प्लीज!

‘मैं तुमसे जमीनी बहस करना चाहता हूं।’ ‘बहस और मुझसे? अरे साहब क्यों बाजार में खड़े हो मुझसे मसखरी कर रहे हो?

आ बैल मुझसे पंगा ले, प्लीज!
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जिस तरह बिल्ली चूहे को मारने से पहले उसे खूब दौड़ाती है और जब बेचारा चूहा दौड़-दौड़ कर थक जाता है तो उसे अपना शिकार बना लेती है उसी तरह उन्होंने पहले तो बाजार में मुझे जी भर दौड़ाया और जब मैं पहले ही बाजार में दौड़ उनके दौड़ाने के बाद दौड़ कर थक गया तो वे मुझे मेरे कॉलर से पकड़ने की कोशिश करते बोले, ‘बोल बच्चू, अब छूट कर कहां जाएगा? तू मौत के हाथों से बच सकता है पर मेरे जैसे नेता के हाथों से नहीं। जब उन्हें मेरे कुरते में कॉलर नहीं मिला तो भन्नाते बोले, ‘ये क्या? कुरते का कॉलर कहां है?

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‘शादी के बाद से मैंने कुरते में कॉलर लगवाना ही छोड़ दिया है,’ कह मैंने चैन की सांस ली, ‘अब पकड़ो जहां से पकड़ना चाहते हो मुझे!’ ‘पहले लगवाते थे?’ ‘हां! शादी से पहले तो कमीज में कॉलर न होने के बाद भी कॉलर खड़े किए ही सोता था।’ ‘तो अब क्या हो गया?’ ‘शादी हो गई! बीवी ने आते ही कॉलर से पकड़ना शुरू किया तो मैंने कॉलर का खटका ही खत्म कर दिया। न कुरते में रहे कॉलर न पकड़े कॉलर से बीवी!’ मैंने सहजता से कहा तो वे अपनी कमीज के कॉलर टटोलने लगे। जब उन्हें अपने कुरते में कॉलर मिल ही गए तो काफी देर तक अपने कुरते के कॉलर मरोड़ते रहने के बाद वे बोले, ‘मैं तुमसे जमीनी बहस करना चाहता हूं।’ ‘बहस और मुझसे? अरे साहब क्यों बाजार में खड़े हो मुझसे मसखरी कर रहे हो?
आलू-प्याज की मसखरी तक मुझसे सहन नहीं हो रही और अब आप पर ये बहस-वहस क्या होती है साहब?’ ‘किसी बात का बतंगड़ बना किसी का किसी के पीछे पड़ना और फिर क्या तुम्हारे घर में किसी बात का बतंगड़ नहीं बनता?’ ‘वहां कोई बात ही नहीं होती तो बतंगड़ क्या खाक बनेगा?’ मैंने सपाट मुंह से कहा तो वे चौंके। कुछ देर तक मुझे घूरते रहने के बाद बोले, ‘पर मैं तो तुमसे बहस करके ही दम लूंगा। मेरा मन बहस करने को पागल हुआ जा रहा है। देखो, मैंने बहस के लिए सोनिया जी को खत लिखा, बहस के लिए अण्णा को खत लिखा, शरद भाई साहब को खत लिखा कि आओ। इधर-उधर बक-बक मत करो! हिम्मत है तो किसी भी मंच पर आकर बहस करो, किसी भी अखाड़े में आकर दो-दो हाथ करो।
इधर-उधर क्यों बड़बड़ाए जा रहे हो? हमारे बड़बड़ाने के लिए टीवी चैनल हैं, अखबार हैं। कामरेड प्रकाश करात से भी बहस के लिए अनुरोध किया। कामरेड आओ! टीवी पर बहस करें, अखबारों में बहस करें। मिल बैठ कर बहस करें। पर उनके पास वक्त ही नहीं। बहस के लिए मुलायम के आगे जितना मुलायम हो सकता था, हुआ। पर सारे हैं कि फेस टु फेस आने को तैयार नहीं। देखो बंधु! अब मेरे बहस करने की सीमा सारे बांध तोड़ चुकी है। अब तो जब तक मैं तुमसे बहस नहीं कर लेता तुमको घर नहीं जाने दूंगा। माफ करना! घर में भाभी परेशान होती हो तो होती रहे।’ ‘मित्र! वह तो खुशी मनाएगी कि..।
वह परेशान मेरे बाहर रहने पर नहीं बल्कि मेरे घर होने पर ही होती है।’ ‘देखो तो, महसूस करो! मेरे पेट के भीतर बहस न होने पर मरोड़ सा फिर रहा है। मुझ पर रहम कर प्लीज मुझसे बहस करो और फिर..’ कह उन्होंने अपने पेट पर मुझसे हाथ फिरवाया तो मैंने साफ महसूस किया कि उनके भीतर बहस न होने के चलते तूफान सा कुछ घुमड़ रहा है। तब उन्होंने मेरे कंधे से आलू-प्याज-बंद गोभी के छिलकों से भरा झोला जबरदस्ती छीनने के बाद कहा, ‘अब हम देखते हैं कि हमसे बिन बहस किए तुम घर कैसे जाते हो?’ ‘पर बंधु! मुझे तो बस करने के सिवाय और कुछ आता ही नहीं, ऐसे में आपसे भिड़ू तो कैसे?
मैं तो घर में बीवी तक से भिड़ने से बचता रहा हूं और अब आप कहते हो कि..।’ कह मैंने दोनों हाथ जोड़े तो वे बोले, ‘बीवी से तो मैं भी आजतक बहस नहीं कर पाया पर..।’ ‘पर क्या?’ ‘पर धंधा मुझसे भिड़ने की मांग कर रहा है सो प्लीज मुझसे बहस करो, ताकि मैं आज रात तो चैन से सो सकूं। देखो तो मीडिया वाले हमारी बहस को प्रसारित, प्रकाशित करने के लिए कबसे कैमरा, पेन ऑन किए खड़े-खड़े उंघियाने लगे हैं।’
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