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भक्ति का सागर, इन दिनों जिधर देखो लग रहा है सतियुग आ गया

पवित्र आत्माओं ने ऐसी रोशनी का इंतजाम किया है कि इस चौंधियाते चोरी के प्रकाश में उन्हें भक्तों को देखना तो मुश्किल हो ही रहा है, वे अपने आप को भी नहीं देख पा रहे हैं।

भक्ति का सागर, इन दिनों जिधर देखो लग रहा है सतियुग आ गया
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इन दिनों मेरे भीतर भी भक्ति का सागर हिलोरे मार रहा है। रोम-रोम से श्रद्धा का पारावार उमड़ रहा है। असल में साल में ये ही आठ नौ दिन होते हैं जब भक्ति औरश्रद्धा का चश्मा मेरे भीतर यकायक कहीं से फूट पड़ता है। पड़ोस में चल रहे अखंड फिल्मी गीतों की तरजों पर बने भजनों का अमृतपान करते करते मेरे कान के परदे फटे जा रहे हैं। हर फटा गला आजकल लता, मन्नाडे, महेंद्र कपूर, अनूप जलोटा बना हुआ है। बच्चों को कल पेपर अच्छा न होने का डर सता रहा है पर उनकी चिंता किसे? साल भर जमकर नास्तिक रहने वाला देखो तो आजकल भक्ति रस से कितना सराबोर है? ऐसे में मैं नास्तिक बना रहूं, ये नहीं हो सकता। खाता तो मैं भी इसी देश की चक्की का पीसा आटा हूं न!

कल से क्या घबराना, नकल अब हाईटेक हो ली है

मंदिर तो मंदिर, गली के कूड़े के ढेर तक के पास जयकारे गूंज रहे हैं। भगवान कूड़े के ढेर के पास अपने नाक को बंद कर बैठने को मजबूर हैं। उनके चारों ओर बिजली वालों से मिल मिलाकर पवित्र आत्माओं ने ऐसी रोशनी का इंतजाम किया है कि इस चौंधियाते चोरी के प्रकाश में उन्हें भक्तों को देखना तो मुश्किल हो ही रहा है, वे अपने आप को भी नहीं देख पा रहे हैं। इन दिनों जिधर देखो, लग रहा है सतियुग आ गया। सब भगवान का गुणगान करने में जुटे हैं। कहीं दूर दूर तक लूटमार की परछाई तक नहीं दिख रही।
चौबीसों घंटे संतरी की तरह चौकी पर विराजमान भगवान बेचारे अपने भक्तों के दर्शन करते-करते बेहाल हो रहे हैं। भगवान के हाथ आशीर्वाद देते देते थक न जाएं, इसलिए पुजारी ने भगवान के हाथों को ठीक ढंग से बांध कर परमानेंट भक्तों की ओर कर दिया है ताकि भगवान अगर सो भी जाएं तो भक्तों को चढ़ावे के बदले उनका आशीर्वाद बिना रुकावट के मिलता रहे! देखो तो भक्तों के साथ साथ रतजगा कर भगवान की आंखें भी कितनी सूज गई हैं। कोई बात नहीं भगवान! नौ दिनों की ही तो बात है। उसके बाद तो मंदिर में भक्तों के दर्शन तक को आंखें तरस जाएंगी। कोई आए तो सोया पुजारी जागे।
वाह! गला तक काटने वालों ने अपने चाकू-छुरियां सान चढ़ाने वाले को दे मंदिरों से नाता जोड़ रखा है। इनकी भक्ति को देख कर तो ऐसा लगता है मानो अपने नाखून काटने तक को पाप समझते हों। बकरों और मुगरें की आयु ईश्वर के परताप से नौ दिन और बढ़ गई है। वे अपने को मृत्युंजयी मानकर उद्घम मचा रहे हैं पर बकरे की मां आखिर कब तक खैर मनाएगी? चिकन मटन खाने वाले केले-संतरे खा जीवन यापन कर रहे हैं। बाजार में लहसुन प्याज टुकुर टुकुर ग्राहकों को ताकते सड़ियाए जा रहे हैं। जिस लहसुन-प्याज को देख कभी मैं मुंह बनाया करता था, आजकल वे मुझे देख आंसू बहा रहे हैं। वक्त-वक्त का फेर है सब हे लहसुन प्याज!
इन नौ दिनों में मैं भी चाहता हूं कि साल भर किए अपने कारनामों को ईश्वर के चरणों में रख अगले साल के लिए चकाचक हो जाऊं। इसीलिए आपकी तरह मैं भी आजकल उपहास सॉरी उपवास पर हूं। अपने जैसे हर बंदे के दर्द को मैं बराबर महसूस कर रहा हूं कि रिश्वत खाए बिना उनको जनता का काम करना कठिन हो रहा होगा पर क्या करें, नवरात्रे हैं भाई साहब। मैंने अपने मन को खाने से रोकने के लिए जैसे कैसे मना लिया है। नौ दिन चुप रह। बाकि तो तीन सौ पैंसठ दिनों में से सब तेरे ही हैं पर मन है कि मानता नहीं..। उपवास होने के चलते आजकल चार चपातियों के बदले दो दर्जन केले ले रहा हूं। तीन टाइम आधा आधा किलो दूध काजू-बादाम डाल कर अलग। लंच में सिंघाड़े के आटे के पकौड़े। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे इस त्याग पर ईश्वर अवश्य प्रसन्न होंगे।
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