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राजा चौरसिया का व्यंग : नुक्स निकालने की कला

नुक्स निकालने का नजरिया जी की जलन शांत करने तथा भड़ास निकालने का गारंटेड जरिया है।

राजा चौरसिया का व्यंग : नुक्स निकालने की कला
किसी के एक्शन पर रिएक्शन दर्शाने का गुर्राने वाले ही औरों के गुड़ को गोबर कर देता है, मगर इससे अहम की संतुष्टि डंके की चोट पर होती रहती है। नीचा दिखाने का लुत्फ काबिल बड़भागियों को ही हासिल होता है। नुक्स निकालने का नजरिया जी की जलन शांत करने तथा भड़ास निकालने का गारंटेड जरिया है।
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इस धरा-धाम में जैसे नाना प्रकार की व्यथाएं, कथाएं और प्रथाएं हैं, वैसे ही नाना प्रकार की कलाएं हैं। उनमें से एक कला ज्यादा खास व झकास प्रतीत हो रही है, वह है नुक्स निकालने की कला। आजकल दूसरों की खूबियां बर्दाश्त के बाहर मानी जाती हैं।
इसीलिए दूसरों की खामियों को डे एंड नाइट हाईलाइट करने में ही मनचाहा मजा आता है। वैसे तो यह बात भी सच है कि अच्छाइयों को ढूंढ़ने में कष्ट होता है, लेकिन बुराइयों को ढूंढ़ने में नो टाइम।
जो लोग छिद्रान्वेषण के विशेषण पर टीका-टिप्पणी करते हैं, उसे बुरी आदत या लत कहते हैं। वास्तव में वे भी इससे अछूते नहीं हैं। अपनी प्रशंसा छोड़कर दूसरों की प्रशंसा प्रशंसनीय नहीं है। पर निंदा एक चुनिंदा हुनर है। हवा भरने में परिश्रम लगता है, पर हवा निकालने का सद्कार्य यूं ही आनन-फानन में हो जाता है। नुक्स निकालने में महारत हासिल करना सबके बस की बात नहीं है।
लेकिन किंतु, परंतु, अगर, मगर आदि पेटेंट शब्दों के जरिए मीन-मेख निकालकर और कमियों को उछालकर दूसरों की शान को फुर्र या फुस्स करने से स्वयं के अहम की तुष्टि की पुष्टि होती है।तारीफ के पुल बांधने पड़ते हैं लेकिन चुटकी भर नुक्ता-चीनी से ही किसी का भी घमंड खंड-खंड करना बाएं हाथ का खेल है।खुद की खामियां तलाशने एवं खुद को तराशने की किसी भी सूरत में जरूरत नहीं है। बुरा जो देखन मैं चला...मुझसा बुरा न मिलिया कोय, वाली मान्यता कबीरदास के विदा होते ही विदा होने लगी है। खासियत के बखान के बाद कमी पर कटाक्ष, रसगुल्ले के साथ नमकीन जैसा मजेदार लगता है।
कहीं रात्रि में प्रीति-भोजन का आयोजन था। लजीज से लजीज खाने का अजीज से अजीज लोग भी लुत्फ उठा रहे थे। उसी वक्त एक मेहमान ने ताना मार ही दिया-ये तमाम इंतजाम कबिले तारीफ हैं। खाने के आइटम भी जायकेदार हैं, मगर दही बडे़ ज्यादा कड़े हैं। यह सुनकर बेचारे मेजबान की जान सूख गई। दूसरों ने भी नुक्स निकालने में कसर नहीं छोड़ी-हलवा ज्यादा पके पपीते की तरह पिलपिला है। आज बड़ी से बड़ी खासियत को नजरअंदाज कर सड़ी से सड़ी भूल या कमी को फोकस में रखने वाले दोष-दर्शकों की खासी भरमार है।
भीरू प्रकृति के मनुष्य ही सामने अंगुली न उठाकर केवल पीठ पीछे निंदा करते हैं। सही नुक्सबाज मुंहफटिए ताल ठोंककर सीधे मुंह पर कहकर अपनी बहादुरी का शानदार परिचय देते हैं। किसी के एक्शन पर डायरेक्शन न देकर मात्र रिएक्शन दर्शाने का गुर-भले ही औरों के गुड़ को गोबर कर देता है, मगर इससे अहम की संतुष्टि डंके की चोट पर होती रहती है।
नीचा दिखाने का लुत्फ काबिल बड़भागियों को ही हासिल होता है। नुक्स निकालने का नजरिया जी की जलन शांत करने तथा भड़ास निकालने का वांटेड व गारंटेड जरिया है।
हमारे एक शर्माजी हैं जो इस कला में बहुत पारंगत है। उन्हें पूरी तरह खुश करना पापड़ बेलना नहीं बल्कि पहाड़ धकेलना है। कोई भी आयोजन हो, पहले तो उसकी बड़ाई की बखूबी रस्म अदाई करते हैं फिर अपनी औकात पर उतारू होकर किरकिरी करने पर उतर आते है।पीठ थपथपाकर थप्पड़ मारकर वे यह सिद्ध करने में प्रसिद्ध हैं कि सुधार के लिए गलतियां खंगालना सच्चा सुधाकर व उद्धारक होना है। यारी हो या रिश्तेदारी, वे अपनी या पराई इज्जत को दरकिनार करने की सदाबहार आदत से लाचर हैं। थू-थू होने की नौबत को हंसकर झेल जाते हैं। वे अकसर फुल फॉर्म में रहकर खुद को वार्म करने के चांस को खोना अपना फॉल्ट मानते है।
निंदकों की भीड़ को भाड़ में जाने वाली कहकर बाल की खाल तक निकालते जाना, उनका पुरुषार्थ है। जब उनके बेटे का विवाह हुआ तो घर में आई नई-नवेली बहू को उनकी नुक्स-निकालू प्रवृत्ति का पता चल गया। उसे यह सुनकर खास खुशी हुई कि ससुर साहब खीर खाने के जन्मजात शौकीन हैं। एक दिन उसने सुस्वादु खीर बनाकर परोस दी कि वे खीर में कमी ढूंढ़ते रह जाएंगे। वे जमकर तारीफ ही करेंगे। ससुर जी ने चटखारे ले-लेकर पेट भर के खीर तो खा ली लेकिन दिल है कि मानता नहीं, वाली उस कला का प्रदर्शन कर ही दिया-बहूरानी के हाथों की खीर का टेस्ट तो बेस्ट रहा पर उसमें शक्कर कुछ ज्यादा थी। नई बहू लजाकर एवं कसमसाकर रह गई। फिर भी वह हार मानने वाली कहां थी।
दूसरे दिन उसने कम शक्कर की खीर बनाकर परोसी तो उसका जायका लेने के बाद ससुर जी ने फिर खोट निकालते हुए कह दिया- शक्कर की कमी रहने से मजा किरकिरा हो गया। इस बार की भी शिकायत चुपचाप सुन ली। उसके मूड में मजा चखाने का अच्छा आइडिया अचानक आया तो वह चहक उठी। अगली बार उसने फिर खीर परोसी, लेकिन शर्माजी ने ज्यों ही लपालप खाना शुरू किया त्यौं ही तेज तीखेपन की वजह से उनकी जीभ हाय-हाय करने लगी। वे तुरंत अपना मुंह लटकाए सीधे बाथरूम की तरफ दौड़ पड़े। उनकी बोलती बंद थी।
उनकी बहू, टिट फार टैट के अदांज में खूब खुश हो गई। उसने खीर में चीनी के बजाय नमक ही नमक झोंक दिया था।
नुक्स निकालने के नुस्खे बेहिसाब होते हैं। किसी की बेइज्जती और नाराजगी के प्रति न कोई संकोच और न सोच। चर्चा में बने रहने का यह उपाय प्रणम्य है और नमस्य है। जिस पत्तल में खाना उसी में छेद करना पुरातन काल से चला आ रहा है, जो इस समय परवान चढ़ रहा है। खुशी जाहिर करना तो आम बात है, नाखुशी जाहिर करना खास बात है। झूठी प्रशंसा की औपचारिकता उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं होती जो स्वयं को हरिशचंद्र के वंशज मानते हैं। फेस अच्छा है पर कट अच्छा नहीं है। इस तर्ज के लोगों की महती कृपा से थान का थान कटपीस-में बदला जा सकता है।
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