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नयनों से उत्पात मचा रहे नेताजी

आंखों की भूमिका मनुष्य के जीवन में अनमोल है। आंखों से ही वह दुनिया को देखता है और दुनिया उसे देखती है। आंखों से ही आदमी नजरों में आता है और आंखों के गलत प्रयोग से ही आदमी नजरों से गिर जाता है।

नयनों से उत्पात मचा रहे नेताजी
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आंखों की भूमिका मनुष्य के जीवन में अनमोल है। आंखों से ही वह दुनिया को देखता है और दुनिया उसे देखती है। आंखों से ही आदमी नजरों में आता है और आंखों के गलत प्रयोग से ही आदमी नजरों से गिर जाता है। आंखे गलती कर जाए तो आदमी जेल खाने का जमाई बन जाता है।

नारी के लिए आंखे काजल का श्रृंगार है। आंखे झुकी हो तो शर्म और तन जाएं गर तो दुर्गा का काल है। प्रचलित धारणाओं के हिसाब से आंखो का फड़कना शगुन-अपशगुन भी होता है। हालांकि यह पुराने समय की धारणाएं है। अब समय बदल गया है, लेकिन इतना भी नही बदला है।

आंखे मटका कर ही दक्षिण भारत की युवती सम्पूर्ण भारत में घर-घर तक प्रसिद्ध हुई। यह वो क्षण था जब किसी लड़की के नयनो की क्रीड़ा को समाज ने चुलबुले स्वरूप में स्वीकार किया। लेकिन आंखों का गलत प्रयोग वर्तमान समय में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। पहले तक तो लड़कियों को छेड़ने में आंखों का प्रयोग होता था।

ऐसे युवकों को मनचला कहकर भुना जाता था, लेकिन अब तो नेता भी आंखों का प्रयोग करने लगे है। कुछ समय पहले अगर वर्तमान जैसी राजनीतिक घटनाएं घटित हुई होती तो फिल्मों में गाने कुछ यूं बनते,'नेता कमाल है रे अंखियों से गोली मारे'। बच्चे स्कूलों में अब जब मुहावरों का प्रयोग करेंगे तो वे भी नेताजी का ही उदाहरण देंगे।

वे भी अब एक आंख मारेंगे और वोट मिल जायेगा, दूसरी आंख मारेंगे तो सड़क बन जायेगी,तीसरी आंख मारेंगे पानी आ जायेगा। यानि विकास अब अपने आंख मारने वाले अवतार के रूप में प्रकट हुआ है। वैसे बहुत देर कर दी उन्होंने अब। अगर उन्होंने कुछ समय पहले आंख मारी होती तो वे आज विवाहित होने का सुख भोग रहे होते,

लेकिन इतनी भी देरी नही हुई कि वे मुखिया से ही आँखे मिलाने के सपने देखने शुरू कर दे। मुखिया-मुखिया है कोई उनकी गर्लफ्रेंड नही। देश आनन्दित है यह क्षण देख जब गले मिलाप के बाद आंखों के तीर मारे जा रहे है। नेत्र रोग विशेषज्ञ ही अब चैनलो की पैनल में इस विषय पर प्रकाश डालते हुए विस्तार से समझा पाएंगे कि उनकी आंखों से यह गुस्ताखी क्यों हुई!

ऐसी घटनाएं समाज में किन परिस्थतियो के कारण हो रही है। उन कारकों का पता तो लगाया जाएं ताकि दुनिया जान सके कि नेताजी को आंख मारने पर क्यों मजबूर होना पड़ा। कहीं आंख मारना अब से शिष्टाचार के रूप में स्वीकार न कर लिया जाए? वे तो नेताजी ठहरे उनका क्या भरोसा 'नयन मटक्का संरक्षण विधेयक' पारित करने की मांग कर दे।

अब देश द्वन्द में है। नेता आते तो आंखें झुकाकर वोट मांगने के लिए है,चुनाव हो जाने के बाद आंख दिखाते नहीं हैं और वहां जनता के मंदिर में बैठ नयन मटकाते है। देश किधर जा रहा है। प्रगति इतनी हो रही है कि गांधी जी नये सौ रूपये के नोट पर आ रहे है लेकिन देश में नेता अपने नयनो से उत्पात मचा रहे है।

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