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हरिभूमि संपादकीय लेख: गांव के रास्ते राष्ट्र विकास की तैयारी

जब कोरोना महामारी में पिछले एक माह से पूरे देश में लॉकडाउन है, उद्योग-धंधे बंद हैं, रेलगाड़ियों-बसों के पहिए ठहरे हुए हैं, विमान हवाई अड्डों पर ही खड़े हैं, ऐसी विपदा में गांव और ग्रामीण ही पूरे देश का भरण-पोषण कर रहे हैं।

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गांधी जी ने कहा था, अगर आप असली भारत को देखना चाहते है तो गांवों में जाइए, क्योंकि असली भारत गांवों में बसता है। ग्रामीण जीवन, सादगी और शोभा का भंडार है। कुछ लोग पशु-पालन से अपनी जीविका चलाते हैं तो कुछ कुटीर उद्योग से कमाते हैं। कठोर परिश्रम, सरल स्वभाव और उदार हृदय ग्रामीण जीवन की प्रमुख विशेषताएं है। गांधी जी का यह कथन आज 21वीं सदी में भी शत प्रतिशत सत्य है। आज भी देश की 70 फीसदी आबादी या तो गांव में है या गांव से जुड़ी है। जब कोरोना महामारी में पिछले एक माह से पूरे देश में लॉकडाउन है, उद्योग-धंधे बंद हैं, रेलगाड़ियों-बसों के पहिए ठहरे हुए हैं, विमान हवाई अड्डों पर ही खड़े हैं, ऐसी विपदा में गांव और ग्रामीण ही पूरे देश का भरण-पोषण कर रहे हैं। किसानों और पशुपालकों ने लॉकडाउन के समय देश को अनाज, दूध, दही, फल की कमी नहीं होने दी।

संकट के समय में गांवों के इस योगदान को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को पंचायती राज दिवस के मौके पर दो बड़े प्रोजेक्ट ग्राम स्वराज और स्वामित्व की शुरुआत की है। ग्राम स्वराज से जहां पंचायतों के संपूर्ण डिजिटलीकरण की शुरुआत होगी। वहीं स्वामित्व योजना गांव की संपत्तियों को ठीक करने का प्रयास है। देश के सभी गांवों की संपत्ति की ड्रोन से मैपिंग की जाएगी। गांव के लोगों को मालिकाना प्रमाणपत्र दिया जाएगा। जब स्वामित्व होगा तो उस संपत्ति के आधार पर ग्रामीण बैंक से लोन ले सकेंगे। इस शुरुआत के साथ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के भविष्य की संभावनाओं का भी खाका खींच दिया। उन्होंने कहा कि कोरोना संकट ने सबसे बड़ा संदेश, बड़ा सबक सिखाया है। अनुभव से हमने पाया है कि अब हमें आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा। बिना आत्मनिर्भर बने ऐसे संकटों को झेल पाना भी मुश्किल हो जाएगा।

गांव अपने स्तर पर, जिला अपने स्तर पर और राज्य अपने स्तर पर और इसी तरह पूरा भारत कैसे आत्मनिर्भर बने। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें कभी भी बाहर का मुंह नहीं देखना पड़े, यह तय करना होगा। प्रधानमंत्री के इन शब्दों से साफ है कि वो देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गांव की तरफ देख रहे हैं। आज औद्योगिक उत्पादन की दृष्टि से पड़ोसी चीन से न केवल मीलों पीछे हैं बल्कि अनेक क्षेत्रों में उस पर निर्भर भी हैं। चीन के उत्पादों से हमारे बाजार भरे पड़े हैं। दीवाली की झालर से लेकर दवा तक के लिए हम पड़ोसी पर आश्रित हैं। अब आपदा ने हमें मौका दिया है कि हम यह निर्भरता खत्म करके खुद को बड़े उत्पादक के रूप में पेश करें। समय की भी यही मांग है। वुहान शहर से कोरोना वायरस पैदा होने के कारण पुरी दुनिया में चीन का विरोध हो रहा है।

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस तो संक्रमण के लिए सीधे-सीधे चीन को दोषी ठहरा रहे हैं। इन देशों की कंपनियां चीन छोड़ने की तैयारी कर रही हैं। ऐसे में भारत के लिए बड़ा मौका है कि हम उन्हें भारत में निवेश के लिए उत्साहित करें। कंपनियों के चीन में उद्योग लगाने का सबसे बड़ा कारण था स्थान की सरल उपलब्धता और सस्ती लेबर। यह दोनों भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में भी आसानी से उपलब्ध हो सकती हैं। इसके अलावा प्रधानमंत्री ग्रामीण क्षेत्रों के लघु उद्योगों को फिर से खड़ा करने की योजना पर काम कर रहे हैं। 1991 में खुली अर्थव्यवस्था के चलते ये कुटिर उद्योग-धंधे चौपट हो गए थे। अब प्रधानमंत्री मोदी के कथन से साफ हो गया है कि वे गांव के रास्ते राष्ट्र विकास का खाका खींचने की तैयारी कर चुके हैं। इससे देश को दोहरा लाभ होने वाला है। एक तो ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नति की बयार आएगी, गांव से शहर की ओर पलायन रुकेगा, वहीं रोजगार के भी असीम अवसर प्राप्त होंगे। जो आज के समय में सबसे बड़ी जरूरत है।

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