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प्रणब दा का आरएसएस में जाना: बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय शिक्षा वर्ग कार्यक्रम के समापन पर मुख्य अतिथि की हैसियत में भाषण देने के पहले पक्ष विपक्ष में होने वाला विवाद खूराक ढूंढ़ने गया था। वह उसे नहीं मिला। मुखर्जी ने नपे तुले अंदाज और भाषायी मर्यादा की सायास नफासत के तेवर में बोला। मानो वे मौजूदा राष्ट्रपति हों।

प्रणब दा का आरएसएस में जाना: बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का
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पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय शिक्षा वर्ग कार्यक्रम के समापन पर मुख्य अतिथि की हैसियत में भाषण देने के पहले पक्ष विपक्ष में होने वाला विवाद खूराक ढूंढ़ने गया था। वह उसे नहीं मिला। मुखर्जी ने नपे तुले अंदाज और भाषायी मर्यादा की सायास नफासत के तेवर में बोला। मानो वे मौजूदा राष्ट्रपति हों।

उनका भाषण जस का तस कुछ बुद्धिजीवी किस्म के लोगों के भविष्य में भी काम आ सकता है। यदि उन्हें कानून या राजनीति विज्ञान की किसी फैकल्टी में दीक्षांत समारोह में अतिथि वक्तव्य के लिए बुलाया जाए। चाहते तो व्याख्यान नवोन्मेषी, व्याकुल, शोधपूर्ण और भविष्य को भारत दृष्टि की तरह से खंगाल सकता था।

वे संघ के शिविर में पर्याप्त ट्रेनिंग प्राप्त प्रशिक्षितों की चुनिंदा सभा में बोलने के कारण विशिष्ट श्रोताओं की चुनौती के लिए बहुत सा सूत्रबद्ध मंत्रोच्चार कर सकते थे। यह उन्होंने नहीं किया। प्रणव मुखर्जी ने अपने तर्क संविधान के प्रचलित, चर्चित और व्याख्यायित परिचित जुमलों में किए। ये वाक्य सरकारी भाषा और अदालतों की नजीरों से भी ज्ञान की तरह झरते हैं।

किताबी नजीरें अवाम के दैनिक जीवन को अपनी करुणा और संवेदनशीलता को संवारने में संकोच करती हैं। उन्होंने संवैधानिक देशभक्ति को राष्ट्रवाद का पर्याय बताने के मौलिक प्रयोग की कोशिश तो की। यह कहना जरूरी है कि संविधान के मकसद और भाष्य में राष्ट्रवाद नाम का शब्द नहीं है। संविधान के मकसद में लोकतंत्रात्मक गणराज्य कहा गया है।

वे उस पर नहीं बोले। राष्ट्रवाद नाम का शब्द बौद्धिक मनीषियों के तरह तरह के बहस के अखाड़े में चित पट होता रहता है। बीसवीं सदी की दहलीज पर चले गए विवेकानंद, स्वतंत्रता संग्राम की आधी सदी की भूमध्य रेखा रहे गांधी, आजादी के बाद देश को सरकार के जरिए गढ़ते नेहरू और 1920 में चले गए ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है‘ का नारा लगाते लोकमान्य तिलक ने राष्ट्रवाद को बूझा।

तिलक विवेकानंद से प्रभावित थे। नेहरू का राजनीतिक भाष्य गांधी की फिलाॅसफी से अलग चल रहा था। इससे अलग संघ का अपना थिसारस है। भारतीय होने के साथ साथ महाराष्ट्र की बीसवीं सदी की बौद्धिक चेतना ने इतिहास के संदर्भ में संघ और हिन्दू महासभा को जन्म दिया। वह बहुसंख्यक जनता की तराशी गई कांग्रेसी सड़क से अलग राह बनाती रही।

प्रादेशिक नहीं सांस्कृतिक अर्थ में प्रणव दा बंगाल की बौद्धिक, सांस्कृतिक, अकादमिक उपज होने के संदर्भ में राष्ट्रवाद को बूझ सकते थे। विवेकानंद और सुभाष बोस की अवधारणाएं भी हैं। राष्ट्रवाद के सबसे बड़े बौद्धिक विन्यासकार और शिक्षा तथा संस्कृति के अंतर्राष्ट्रीय सूक्ष्म व्याख्याकार रवींद्रनाथ टैगोर का नाम लेने से चूक गए।

राष्ट्रवाद पर कोई भारतीय भाषण उसके बिना अप्रासंगिक और असांदर्भिक है। वे चाहते तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद शब्द का भी उल्था कर सकते थे। वही शब्द तो चिंता का विषय बना हुआ है। देश किसी एक धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र का नहीं होता। यह संदेश देने में प्रणव बाबू को विवेकानंद याद आने चाहिए थे। उनके एक वाक्य से हिंदुस्तान आज तक विश्व संस्कृति के इलाके में परचम थामे हुए है।

तीस साल के उस नौजवान ने कहा था। हमारी देववाणी संस्कृत में बहिष्कार नाम का शब्द नहीं है। यह जाहिर है संघ भारतीय इतिहास, सभ्यता और संस्कृति के अनुकूल अवयवों को तिरस्कृत नहीं करता। वह उनसे ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा बनाता है। प्रणव बाबू का व्याख्यान ज्यादा अकादमिक होना चाहिए था। उसकी संघ प्रमुख को जरूर ही अपेक्षा रही होगी।

इंदिरा गांधी के कारण सेक्युलरिज्म और समाजवाद को घोषित तौर पर संविधान का मकसद बनाया गया है। छद्म सेक्यूलरिज्म के नाम पर इस मकसद की खिल्ली सफलतापूर्वक उड़ाई जा रही है। आर्थिक बदहाली के चलते समाजवाद पूंजीवाद की गुलामी करता कारपोरेटियों की ड्योढी पर है। लंबे राजनीतिक जीवन और राष्ट्रपति पद पर रहे प्रणव दा को मालूूम है।

संविधान निर्माताओं में जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी और एक अन्य अध्यक्ष रघुवीर शामिल थे। देश भविष्य के लिए इन सांसदों के ऐसे सपने याद रखेगा जिन्हें भविष्य को पूरा करना ही था। इनमें से एक सपना अनुच्छेद 39 (ख) और (ग) के अनुसार कहता है (ख) समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो,

जिससे सामूहिक हित का सर्वोच्च रूप से संसाधन हो। (ग) आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो। कांग्रेसी सरकार में प्रणव दा वित्त मंत्री रहे। वहीं से तो मोटे तौर पर उपरोक्त दोनों नीति तत्वों का कबाड़ा हुआ है। महापुरुषों के नामों का चयन करने में विचार नहर की तरह प्रवाहित नहीं होने चाहिए।

संघ के एक शीर्ष विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने महत्वपूर्ण बात कही थी। लोकतंत्र की मजबूती के लिए जनमत का परिष्कार होना चाहिए। उन्हें कट्टर हिंदुत्व के प्रचारक या तथाकथित एकात्म मानववाद का प्रवक्ता बनाते रहने की कोशिशों से अलग हटकर उनके राजनीतिक विचारों पर तटस्थ बहस नहीं होती। एकात्म मानववाद की थ्योरी में कुछ ऐसे भी बीजाणु हैं जिनको लेकर उनसे बहस मुबाहिसे की स्थिति बनती है।

समझ का परिष्कार हो पाता-इसके पहले संदेहास्पद परिस्थितियों में वे चले गए। वे मुगलसराय जंक्शन से ज्यादा विचार के जंक्शन की तरह की बहस में आने चाहिए। यह बेहतर होता अंबेडकर, दीनदयाल, गांधी, विवेकानंद, टैगोर और नेहरू आदि के दर्शन के बीच रास्ता खोजते प्रणव दा भविष्य की बीजगणित के लिए कुछ समकालीन सूत्र सिद्धांत रचने की जोखिम उठाते।

भारतीय राष्ट्रपतियों में राजेन्द्र प्रसाद, डाॅ राधाकृष्णन और डाॅ. जाकिर हुसैन जैसे बौद्धिकों के बाद के राष्ट्रपति राजनीतिक परिस्थितियों के कारण संविधान की आत्मा के बदले नेताओं के बुद्धिकौशल की खोज रहे हैं। संघ की सभा में जाने का उथला कांग्रेसी विरोध बेतुका है।

जोखिम भीरु प्रणव मुखर्जी ऐसा कुछ कह ही नहीं सकते थे। अन्यथा वे अपने अतीत से अनावश्यक मुठभेड़ करने के आरोपी हो जाते। असली आकलन तो उनकी बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने किया है। उनका भाषण तो गुमनामी में डूब जाएगा लेकिन उनकी फेक फोटो भी इस्तेमाल की वस्तु बनकर रह जाएगी।

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