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अवधेश कुमार का लेख : आंदाेलन के नाम पर राजनीति

साफ है कि आंदोलन किसान के नाम पर अवश्य है, इसमें पंजाब एवं हरियाणा के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का ही समूह है, इसलिए यह पूरी तरह किसानों का आंदोलन नहीं है। कृषि को सशक्त करने तथा किसानों की हालत में सुधार करके उनकी प्रगति के लिए निजी क्षेत्र को निवेश करने का ढांचा उपलब्ध कराया जाए। आंदोलन में शामिल अनेक संगठन ऐसी मांग कर चुके हैं। जो पार्टियां सरकार का विरोध कर रही हैं वो स्वयं इसके लिए कोशिश कर चुकी हैं। यूपीए सरकार के मंत्री तक इसकी वकालत और प्रयास करते रहे। उस समय के रिकॉर्ड भी सामने आ गए हैं। जाहिर है, इस आंदोलन के साथ राजनीति हो रही है।

Farmers Protest: केंद्र के खिलाफ किसान का
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केंद्र के खिलाफ किसान का 'सद्भावना दिवस' शुरू

अवधेश कुमार

कृषि कानूनों के विरुद्ध जारी आंदोलन पर सरकार एवं आंदोलनकारियों के बीच सहमति न होना दुर्भाग्यूपर्ण है। किसानों के प्रति किसकी सहानुभूति नहीं होगी, पर जिस तरह आंदोलनकारियों ने जिद पकड़ी हुई है, सरकार की बात तक सुनने को तैयार नहीं तथा जबरन मार्गों को बाधित कर रहे हैं उसमें बीच का रास्ता निकल ही नहीं सकता। लंबी बातचीत के बाद सरकार की ओर से 20 पृष्ठों का जो प्रस्ताव आया उसमें इनकी शंकाओं का समाधान तथा मांगों को समायोजित करने की पूरी कोशिश की गई थी। सरकार ने बार-बार कहा कि कृषि कानूनों को वापस नहीं लेगी लेकिन किसानों की शंकाओं को दूर करने तथा संशोधन करने को तैयार है। जिस तरह आंदोलनकारियों ने सरकार का प्रस्ताव खारिज किया उससे ऐसा लगा जैसे पहले से मन बना लिया गया था कि हमें प्रस्ताव मानना ही नहीं है।

आम धारणा यही है कि सरकारें खुले मन से सामने आएं तो किसी आंदोलन का अंत समझौते के साथ हो सकता है। अगर राजनीति को परे रखकर निष्पक्षता से देखें तो मोदी सरकार खुले मन से सामने आई। जिन्होंने प्रस्तावों को देखा है वे स्वीकार करेंगे कि इसके बाद आंदोलन समाप्त हो जाना चाहिए। आंदोलनकारियों ने सरकार के समक्ष जो मांगें रखीं थी, आशंकाएं प्रकट कीं थीं, सब पर जवाब और प्रस्ताव आ गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी पर प्रस्ताव में साफ कहा गया कि सरकार लिखित भरोसा देने को तैयार है, एमएसपी खत्म नहीं होगी। बाजार समितियों की ओर से स्थापित मंडियों के कमजोर होने और किसानों के निजी मंडियों के चंगुल में फंसने की आशंकाओं के समाधान के लिए सरकार ने कानून में इस तरह संशोधन करने की बात कही है जिनसे राज्य निजी मंडियों में भी निबंधन की व्यवस्था कर सके। मंडी समितियों में और एमएसपी पर फसल बेचने के विकल्प भी बरकरार हैं। आंदोलनकारियों की शिकायत थी कि विवाद हो जाए, तो किसान सिविल कोर्ट नहीं जा सकते। सरकार का जवाब है कि 30 दिन में समस्या का हल हो, ऐसा प्रावधान किया गया है, सुलह बोर्ड के जरिये समझौते की भी व्यवस्था है।

बावजूद संशोधन द्वारा सिविल कोर्ट जाने का विकल्प भी दिया जाएगा। कहा गया कि कृषि करारों के निबंधन की व्यवस्था नहीं है। सरकार ने कहा है कि नए कानून के तहत राज्य सरकारें निबंधन की व्यवस्था शुरू कर सकती हैं। प्रस्ताव दिया गया है कि जब तक राज्य सरकारें निबंधन का ढांचा नहीं बनातीं, तब तक करार होने के 30 दिन के अंदर उसकी एक कॉपी एसडीएम ऑफिस में जमा कराने की व्यवस्था करेंगे। किसानों की जमीन पर बड़े उद्योगपतियों द्वारा कब्जा कर लेने की शंका का तो कानून में कोई आधार ही नहीं है। कानून के अनुसार खेती की जमीन की बिक्री, लीज और मॉर्टगेज पर करार नहीं हो सकता। किसान की जमीन पर स्थायी ढांचा भी नहीं बनाया जा सकता। अगर ढांचा बनता है, तो फसल खरीदने वाले को करार खत्म होने के बाद उसे हटाना होगा। नहीं हटा, तो उसकी मिल्कियत किसान की होगी। यह साफ किया जाएगा कि ढांचा बनाए जाने की स्थिति में फसल खरीदार न उस पर कर्ज ले सकेगा और न ही ढांचे को अपने कब्जेे में रख सकेगा। जमीन कुर्क होने के भय के जवाब में प्रस्ताव में कृषि करार कानून की धारा 15 को उद्धृत किया गया है जिसके अनुसार किसान की जमीन के विरुद्ध कोई वसूली या कुर्की नहीं की जा सकती है। प्रस्ताव के अनुसार इनके बावजूद कोई सफाई चाहिए, तो उसे जारी किया जाएगा।

सवाल है कि सरकार के प्रस्ताव में आखिर कौन सी बात गलत है? यह आम समझ से परे है कि जब सरकार स्पष्टीकरण दे रही है, उचित मांगों को स्वीकार कर कानून में संशोधन को तैयार है तो फिर समस्या कहां है? तीनों कानून रद करने की जिद का कोई आधार नहीं है।

अनेक हलकों से मांग की जा रही थी कि कृषि को सशक्त करने तथा किसानों की प्रगति के लिए निजी क्षेत्र को निवेश करने का ढांचा उपलब्ध कराया जाए। आंदोलन में शामिल अनेक संगठन ऐसी मांग कर चुके हैं। जो पार्टियां सरकार का विरोध कर रहीं हैं वो स्वयं इसके लिए कोशिश कर चुकीं है। यूपीए सरकार के मंत्री तक इसकी वकालत और प्रयास करते रहे। उस समय के रिकॉर्ड भी सामने आ गए हैं। जाहिर है, इस आंदोलन के साथ राजनीति हो रही है। राष्ट्रपति से मिलने जाने वाले नेताओं को देख लीजिए। शरद पवार ने कृषि मंत्री रहते मुख्यमंत्रियों को इसके लिए पत्र लिखा और अब विरोध कर रहे हैं। जो किसान संगठन आंदोलन में शामिल है उनमें ज्यादातर की राजनीतिक विचारधारा है। वामपंथी राजनीति में विश्वास करने और उसके लिए काम करने वाले संगठनों के साथ इसमें ऐसे भी समूह हैं जिन पर कई राज्य सरकारें संदेह प्रकट कर चुकी हैं। इनके पैम्फलेट में आंदोलनों में गिरफ्तार किसानों के साथ एक्टिविस्टों, अधिवक्ताओं, छात्र नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को रिहा करने की मांग है। ये लोग कौन हैं? माओवादियों से संबंध, उनको संसाधन मुहैया कराने, उनके लिए कानूनी संघर्ष करने, देश विरोधी नारे व हरकते, हिंसा कराने की साजिश रचने आदि के आरोपों में गिरफ्तार लोगोंकी रिहाई का किसान आंदोलन से क्या संबंध हो सकता है?

साफ है कि आंदोलन किसान के नाम पर अवश्य है, इसमें पंजाब एवं हरियाणा के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का ही समूह है, इसलिए यह पूरी तरह किसानों का आंदोलन नहीं है। जिस तरह नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में आरंभ शाहीनबाग के अवैध धरने में ऐसे सारे संगठन शामिल हो गए थे ठीक वही स्थिति इस आंदोलन की भी है। इनकी समस्या कृषि कानून नहीं, मौजूदा सरकार है। सरकार का विरोध करने में कोई समस्या नहीं है, लेकिन छद्म रूप से कानूनों के बारे में दुष्प्रचार कर, जो है नहीं उसका डर पैदा कर सड़कों पर उतारने-उतरने वालों का लक्ष्य कुछ और है। आढ़तियों के बेईमान तबके, खरीद बिक्री के बिचौलिए, किसानी के नाम पर बड़े कृषक व्यापारी बने निहित स्वार्थी तत्वों ने किसानों को भड़काया तथा आंदोलन में पूरी शक्ति लगा दी है। इसलिए सहमति और समझौते से आंदोलन के अंत की संभावना न के बराबर है। आंदोलन का शांतिपूर्ण अंत तभी संभव है जब ये तत्व बाहर हो जाएं और विशुद्ध किसानों से बात हो।

किंतु उद्देश्य कुछ और हो तो प्रस्ताव स्वीकार कर या कुछ और चाहिए तो बातचीत से रास्ता निकालकर आंदोलन खत्म करने पर ये विचार कैसे करेंगे। किसान आंदोलनों के साथ यही दुर्भाग्य जुड़ा रहा है। हमेशा निहित स्वार्थी एवं राजनीतिक हित साधने वाले अगुवा बनकर, हावी होकर सत्यानाश करते रहे हैं और इस आंदोलन में भी यही हो रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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