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मनोज कुमार झा की कविताएं

उन अधूरी कविताओं की तरह और कितने करीब आ गए

मनोज कुमार झा की कविताएं
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1. उन अधूरी कविताओं की तरह

उन अधूरी कविताओं की तरह
जो कभी कहीं
किसी तलाश में
मिल जाती हैं
शायद
कभी तुम भी
कहीं ऐसे ही मिलो
तो फिर
फिर से कुछ लिखूं
बहरहाल, अधूरी बातों
अधूरे सपने
अधूरी नींद
अधूरे ख़्यालात से
बाहर निकलता
एक भटकन
लगातार
दुर्निवार...ज़िंदगी का कोई
सच तो हासिल हो...
2. कितने करीब आ गए
कितने करीब आ गए
झुक आया थोड़ा आसमान
धरती से थोड़ा ऊपर
उठे हम
नदी पास आ गई
पहाड़ों के सिर झुके
समंदर की लहरों ने
तट को सराबोर
कर दिया
कैसी ख़ुशबू
हवाओं में तैरने लगी
तुम्हारे पास से होकर
हम गुज़रने लगे
कितने क़रीब आ गए
तुम्हारे।
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