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अनुराग अन्वेषी की कविताएं : मल्लिका का विरह और उड़ान

कालिदास,महीना चाहे कोई हो /बारिश जब भी होती है /तुम्हारी मल्लिका भीगती उपत्यकाएं निहारती रह जाती है निहारती रह जाती है

अनुराग अन्वेषी की कविताएं : मल्लिका का विरह और उड़ान
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1. मल्लिका का विरह
कालिदास,
महीना चाहे कोई हो
बारिश जब भी होती है
तुम्हारी मल्लिका
भीगती उपत्यकाएं
निहारती रह जाती है
किंतु मन नहीं भीग पाता उसका
कह नहीं पाती वह
कि मुझे भीगने का तनिक भी खेद नहीं,
नहीं भीगती तो वंचित रह जाती…
बारिश से धुले आकाश में
बकुल पंक्तियां
अब भी दिखती हैं उसे
पर उसकी आंखों में छाए बादल
इस तरह बरस जाते हैं
कि बकुल पंक्तियां
व्याकुल कर जाती हैं उसे
सुनो कालिदास,
तुम्हारे संदेश की तलाश में
बारिश की हर बूंद
वह अपने
पोर-पोर में भर लेने की
अथक चेष्टा करती है
और फिर किसी एकांत में
उन बूंदों को
नयनों के रास्ते
हौले-हौले निकाल कर
पता नहीं क्या तलाशती है शून्य में
कालिदास,
तुम उज्जयिनी में जा बैठे हो
राजधर्म निभाते हुए
तुम्हें नहीं पता
कि अकारण विस्मृत हो गई है तुमसे
तुम्हारी मल्लिका
पर यह मतवाली
तुम्हें भूली ही नहीं क्षण भर को भी
तुम्हारी स्मृति में तुम्हारी मल्लिका
प्रेम का महाकाव्य रच रही है
बता रही है
कि वह ऐसे आकंठ डूबी है
तुम्हारे प्रेम में
कि इजाडोरा की तरह
नाच सकती है
किसी भी समुद्र के किनारे
वह कहती है
आएंगे मेरे कालिदास
पर अभी
ढेर सारे राजधर्म निबाहने हैं उन्हें
जब भी अवसर मिलेगा
हम साथ-साथ चलेंगे
उज्जयिनी जैसे किसी भी शहर से दूर
किसी भी वन प्रांतर में
वह मेरे जख्मी हरिण को औषधि देंगे
और फिर देखना तुम मेरी कुलांचे…
यह सब बताते बताते
उसके नयन
बादल बन जाते हैं
और फिर
धारासार वर्षा होती है
कालिदास,
तुम्हारे रचे मेघदूतम के सामने
सारे महाकाव्यों की कौंध
फीकी पड़ जाती है
पर तुम्हें नहीं पता
कि जब तुम्हारी मल्लिका
प्रेम करती है
तो मरुस्थल भी गुनगुनाने लगते हैं
उनमें भी प्राणवायु का संचार होता है
माना
कि प्रेम पगे इन दिनों
अनुपस्थित होकर भी
उसके अंग-प्रत्यंग से फूटते हो तुम
पर सचमुच कालिदास
सच कहता हूं
कि तुम हतभागे हो
जो भूल गए
उसका जादुई स्पर्श,
भले तुम भरी सभा में बैठ
स्वयं को परिपूर्ण समझते होगे
तब तो और भी ज्यादा
जब सारे सभासद
तुम्हारे ज्ञान पर अभिमान जताते होंगे
तुम्हारी विद्वता
सब पर भारी पड़ती होगी
पर मेरी बातों का
अन्यथा मत लेना कालिदास
मैं तो ग्राम-प्रांतर का वासी हूं
मैं नहीं जानता
राज-काज की बातें
मुझे तो यह भी नहीं पता
कि कैसे रची जाती है कविता में सांसें
हां कालिदास,
तुम्हारी रचनाओं के पाठ से
मैंने तुम्हें जाना
मल्लिका से अक्सर होने वाली वार्तालाप से
मैंने अब यह माना
कि तुमने
अपना कुछ नहीं रचा
चेतन-अचेतन में जो कुछ लिखा
वह 'मल्लिका' लिखा
क्षमायाचना के साथ कहूंगा
कि तुम तो तुम ही रहे
कालिदास को तो मल्लिका ने रचा
हां कालिदास,
तुम भले स्वयं से होगे तृप्त
पर मेरी दृष्टि कहती है
जिसने मल्लिका को भुलाया
वह भरा-पूरा कैसे, वह तो सहज रिक्त।
सुनो कालिदास
इस ग्राम प्रांतर के लोग कहते हैं अब
कि तुम नहीं लौटोगे
राजधर्म में लीन हो
यहीं मुझे फिर दृष्टिगत होता है
कि तुम कितने दीन हो
मल्लिका का मर्म जिसने न जाना
उसे क्या पता सुख का राज
उसे क्या पता राज का धर्म।
लौट आओ कालिदास,
मल्लिका के लिए न सही, अपने लिए लौटो
देखना वह बारंबार भीगेगी और कहेगी
उसे भीगने का खेद नहीं...
और तब देखना
कि जितनी बार वह भीगेगी, वह तुम्हें ही रचेगी
जितनी बार उसका जादुई स्पर्श तुम्हारे साथ होगा
तुम्हारे लिखे का अपना जादुई आकाश होगा
तुम्हारे लिखे से वह भीगेगी
और अपने भीगने से तुम्हें लिखेगी
लौट आओ कालिदास, लौट आओ...
2. उड़ान
तुम्हारे कान मेरी हथेलियों से दबे हैं
और अंगुलियां घुंघराले केशों में फंसी हैं
तुम्हारी आंखें बंद हैं
सरसराती हुई सांसें हैं
थरथराते हुए होठ हैं
रुका-रुका सा वक्त है
फंसी-फंसी आवाज है
कामनाओं की उड़ान है
प्यार का वितान है।
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