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पीएम मोदी की बौद्ध सर्किट कूटनीति

श्रीलंका के राष्ट्रपति बनने के बाद सिरिसेना ने सबसे पहले भारत की यात्रा ही की थी।

पीएम मोदी की बौद्ध सर्किट कूटनीति

भारत के लिए हमेशा मुश्किल खड़ी करने की चीन की कूटनीति अब मुंह की खाने लगी है। यह बात अब चीनी थिंक टैंक और चीनी सरकारी मीडिया को शिद्दत से समझ आने लगी है। बात-बात पर भारतीय कूटनीति की आलोचना करने वाले चीन को महसूस होने लगा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीनी दबाव व झांसे में नहीं आने वाले हैं।

चीनी चाल पर पैनी नजर रखने वाले पीएम मोदी ने वन बेल्ट वन रोड शिखर सम्मेलन से ठीक पहले श्रीलंका की यात्रा कर चीन को करारा कूटनीतिक झटका दिया है। प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी लगातार बौद्ध सर्किट देशों की यात्रा कर रहे हैं और भारतीय कूटनीति को मजबूत कर रहे हैं।

भारत के जापान, म्यांमार, थाईलैंड, श्रीलंका, कंबोडिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया आदि बौद्ध बहुल देशों से संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। जापान को छोड़कर चीन की भी इन बौद्ध बहुल देशों पर नजर है।

चीन की कोशिश भारत को हर ओर से घेरने की है, लेकिन मोदी बौद्ध सर्किट कूटनीति के सहारे चीन के पैंतरे को मात दे रहे हैं। 14-15 मई को चीन के नेतृत्व में वन बेल्ट वन रोड सम्मेलन होने जा रहा है। इस सम्मेलन के जरिये चीन अपने वन बेल्ट वन रोड आइडिया को आगे बढ़ाएगा।

दरअसल चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग का यह 2013 में शुरू किया ड्रीम प्रोजेक्ट है। यह चीन को एशिया और यूरोप के देशों तक चीन की पहुंच बढ़ाने और चीनी व्यापार को प्रमोट करने की योजना है। इसमें सिल्क रूट और मैरीटाइम रूट दोनों शामिल है।

चीन चाहता है कि भारत भी इस ओबीओआर प्रोजेक्ट से जुड़े, लेकिन चीनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा के चलते भारत दूरी बनाए हुए हैं। अमेरिका भी चीन की परियोजना को लेकर चिंता जाहिर कर चुका है।

इस सम्मेलन से पूर्व मोदी की कोलंबो यात्रा के बाद श्रीलंका ने जिस तरह श्रीलंकाई बंदरगाह में चीनी पनडुब्बी को खड़ा करने की इजाजत देने से इनकार कर दिया है, उससे चीन के माथे पर शिकन और बढ़ गई है। 2014 में भारत ने चीनी पनडुब्बी के श्रीलंकाई बंदरगाह में खड़ा करने का कड़ा विरोध किया था।

श्रीलंका सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से भारत के ज्यादा करीब है। श्रीलंका को भी चीन के विस्तारवादी नीति से खतरा लगता है, जबकि भारत बौद्ध सर्किट समेत सभी पड़ोसी देशों से शांतिपूर्ण और बराबरी का संबंध रखता है। बौद्ध धम्म के चलते श्रीलंका का भारत से गहरा जुड़ाव है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति बनने के बाद सिरिसेना ने सबसे पहले भारत की यात्रा ही की थी। मोदी की इस यात्रा के कई राजनीतिक और कूटनीतिक मायने हैं। इसे चीन समझ रहा है। चीन की सरकारी मीडिया ने शी चिनफिंग सरकार को चेताया भी है कि भारत को हल्के में लेना उसके लिए ठीक नहीं है।

पाकिस्तान के पीछे मजबूती से खड़े चीन की कोई भी चाल भारत को रोक नहीं पा रहा है। विकास दर में भी चीन से आगे भारत है। बांग्लादेश को भी अपने पाले में करने में चीन नाकाम हो चुका है। नेपाल से चीन के संबंध परवान नहीं चढ़ रहे हैं।

सर्जिकल स्ट्राइक व विमुद्रीकरण जैसा बोल्ड फैसला लेकर मोदी ने मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय दिया है। विदेश नीति के मामले में मोदी की अगुअाई में भारत ने पहले की रक्षात्मक नीति को किनारे किया है और दूसरे देशों के मामलों में अपने हित को प्राथमिकता देते हुए बोल्ड फैसले लिए हैं।

दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर भी चीन की धमकी के आगे भारत का नहीं झुकना चीन को मोदी का स्पष्ट संकेत है। निस्संदेह मोदी की बौद्ध सर्किट कूटनीति चीन की भारत के खिलाफ कुटिल चाल की काट है।

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