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प्रभात कुमार रॉय का लेख : आतंकवाद पर गहरी चोट का मौका

भारत ने इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष पद संभाला है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के नाते भारत के समक्ष वैश्विक आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा और विश्व में शांति स्थापना सरीखी अनेक विकट चुनौतियां विद्यमान हैं। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस मूर्ति जो कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष पद पर आसीन हो गए हैं। सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष पद पर भारत के आसीन हो जाने पर विश्व के अनेक प्रमुख राष्ट्रों पे प्रसन्नता जताई है। सारी दुनिया में केवल पाकिस्तान भारत की इस पदस्थापना से बेहद नाखुश हुआ है।

प्रभात कुमार रॉय का लेख : आतंकवाद पर गहरी चोट का मौका
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प्रभात कुमार रॉय 

प्रभात कुमार रॉय

भारत ने जनवरी 2021 में दो वर्षो के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य का पद संभाला था। अगस्त माह के लिए भारत ने इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष पद संभाला है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के नाते भारत के समक्ष वैश्विक आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा और विश्व में शांति स्थापना सरीखी अनेक विकट चुनौतियां विद्यमान हैं। उल्लेखनीय है पंद्रह सदस्यीय सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी और दस अस्थायी सदस्य होते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा सुरक्षा परिषद में दो वर्ष के लिए अस्थायी सदस्यों की नियुक्ति की जाती है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति जो कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष पद पर आसीन हो गए हैं। सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष पद पर भारत के आसीन हो जाने पर विश्व के अनेक प्रमुख राष्ट्रों पे प्रसन्नता जताई है। सारी दुनिया में केवल पाकिस्तान भारत की इस पदस्थापना से बेहद नाखुश हुआ है। कश्मीर विवाद पर अपना पुराना राग अलापते हुए पाक़ विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने फरमाया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को कश्मीर विवाद में दखलंदाजी करनी चाहिए और जम्मू कश्मीर पर अपने पुराने प्रस्ताव को लागू करना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के आयोजन प्रोग्राम ऑफ वर्क के तहत इसके वर्तमान अध्यक्ष टीएस मूर्ति ने कहा कि भारत वस्तुतः पाकिस्तान के साथ एक पड़ोसी देश की तरह से मित्रता का संबंध स्थापित करना चाहता है। उन्होने आगे कहा कि भारत और पाकिस्तान के मध्य जो भी कटु विवाद रहे हैं। इन तमाम विवादों का भारत द्विपक्षीय वार्ता के जरिये निदान करना चाहता है। टीएस मूर्ति ने स्पष्ट तौर पर कहा कि कश्मीर विवाद में भारत किसी भी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी के सदैव विरुद्ध रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने भी कश्मीर विवाद में मध्यस्थता करने का प्रस्ताव पेश किया था, जिसे भारत ने बाकायदा अस्वीकार कर दिया था। वर्ष 1947 में भारत के विभाजन के पश्चात के चार बड़े युद्धों में भारत द्वारा पाक़ पराजित हुआ। भारत के विरुद्ध सीधे युद्धों में हासिल हुई विकट नाकामी के कारण वर्ष 1989 से कश्मीर पर आधिपत्य करने की गरज़ से पाक़ ने प्रॉक्सी वॉर की रणनीति अख्त्यार की। कश्मीर की सरजमीन पर पाक़ द्वारा प्रेरित और पोषित प्राक्सी वॉर की जेहादी रणनीति विगत 32 वर्षों से निरंतर जारी रही है। प्रॉक्सी वॉर के आरम्भिक दस वर्षों में पाक़ द्वारा पोषित और प्रशिक्षित जेहादियों को अमेरिका और सऊदी अरब ने अकूत दौलत और आधुनिकतम हथियारों से नवाजा था। हिजबुल मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन और अलबर्क सरीखी अनेक जेहादी तंजीमों ने कश्मीर में कहर बरपाया है। कश्मीर में जारी प्रॉक्सी वॉर में तकरीबन एक लाख से अधिक इंसानों की जिंदगी जा चुकी हैं। 2001 में 9/11 के न्यूयार्क ट्रेड सेंटर पर नृशंस जेहादी आक्रमण के बाद अमेरिका वस्तुतः भारत के निकट आया और पाक से दूर होता गया। पाक़ द्वारा अमेरिका के साथ अफ़गानिस्तान में की गई दगाबाजी ने पाक़ को अमेरिका से दूर कर दिया है।

भारत के अनेक प्रधानमंत्रियों ने पाकिस्तान के साथ विवादों का समुचित तौर पर निदान करने के प्रयास किए। बांग्लादेश के युद्ध के तत्पश्चात वर्ष 1972 में भारत और पाक़ के मध्य शिमला समझौता संपन्न हुआ। शिमला समझौते में दोनों देशों के लिखित मध्य करार हुआ कि भविष्य में दोनों देशों के बीच उत्पन्न परस्पर विवादों को बातचीत द्वारा निपटाया जाएगा। शिमला समझौते के तमाम करारों का उल्लंघन करते हुए वर्ष 1979 से पाक़ सरकार और फौज़ ने पंजाब में सक्रिय खालिस्तानी आतंकवादियों को सक्रिय समर्थन दिया। आजकल भी अनेक खालिस्तानी आतंकवादी सरगनाओं को पाक़ सरकार ने अपनी पनाह में रखा हुआ है। वर्ष 1989 से तो पाक़ द्वारा पोषित जेहादियों ने भारत को आतंकवादी आक्रमणों का निशाना बना रखा है। भारतीय संसद ने वर्ष 1992 में एक प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। इस पारित प्रस्ताव में कहा गया कि संपूर्ण कश्मीर वस्तुतः भारत का अभिन्न हिस्सा है। पाक अधिकृत कश्मीर और गिलगिट और बालटिस्तान भारत के दो ऐसे भूभाग हैं, जो अभी तक भारत के आधिपत्य में नहीं हैं। पाक अधिकृत कश्मीर का एक बड़े भूभाग को पाक सरकार ने चीन के आधिपत्य में सौंप दिया है। अतः संपूर्ण कश्मीर और गिलगिट और बालटिस्तान पर यदि भारत को अपना आधिपत्य स्थापित करना है तो फिर पाक़ और चीन दोनों ही शक्तियों से निपटना होगा। अफ़गानिस्तान की सरजमीन पर निरंतर गति से शक्तिशाली होते जाते तालिबान जेहादी, यदि भविष्य में अफ़गान हुकूमत पर काबिज हो जाते हैं, तो फिर कश्मीर में भारत के लिए तालिबान की चुनौती से भी भारत को निपटना होगा। आज के दौर में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भारत के अत्याधिक अनुकूल हैं और पाकिस्तान के बेहद प्रतिकूल हैं। विश्व पटल पर पाकिस्तान एक अगल-थलग पड़ा हुआ देश है, जिसका चीन के अतिरिक्त पाकिस्तान को कोई निकट मित्र नहीं है।

सारी दुनिया पाकिस्तान को वैश्विक जेहादी आतंकवादियों के निर्माण करने का केंद्रीय प्रस्थान बिंदु मानती है। इसी कारण जेहादी आतंकवादियों का निरंतर वित्तीय परिपोषण करने के लिए फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट के हवाले किया है। अफ़गानिस्तान में तालिबान की अंध हिमायत और सहायता करना पाकिस्तान यदि जारी रखता है तो फिर फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स उसको ब्लैक लिस्ट में धकेल सकता है। बलूचिस्तान की बगावत पाकिस्तान की गले की हड्डी बन चुकी है। बलूचिस्तान में अभी तक पाक फौज ने लगभग एक लाख बलूचों को मौत के घाट उतार दिया है। बलूचिस्तान में पाक फौज़ द्वारा बेगुनाह बलूच नागरिकों के मानवाधिकारों का घनघोर उल्लघंन किया जा रहा है। बलूचिस्तान में पाक फौज के कुकृत्यों पर वैश्विक निगाहें टिकी हुई हैं। विश्व पटल पर भारत ने भी बलूचिस्तान के प्रश्न को उठाया है। भारत और पाक के मध्य विवादों को आपसी बातचीत तभी निपटाया जा सकता है, यदि पाक सरकार और फौज भारत के विरुद्ध प्रॉक्सी वॉर की रणनीति का पूर्णतः परित्याग कर दिखाए। भारत सरकार का स्पष्ट नज़रिया रहा है कि कश्मीर में जेहादी आतंकवाद और कश्मीर पर कूटनीतिक बातचीत एक साथ नहीं चल सकते हैं। पाकिस्तान वस्तुतः फौज के वास्तविक आधिपत्य वाला मुल्क है। पाक फौज किसी न किसी तरह से भारत के विरुद्ध युद्धरत रहना चाहती है, ताकि उसका वर्चस्व पाकिस्तान पर बरक़रार रह सके। पाक फौज का चाल, चरित्र और चेहरा जब तक पूर्णतः परिवर्तित नहीं होगा, दोनों देशों के मध्य विवादों को शांतिपूर्वक कदापि सुलझाया नहीं जा सकेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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