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ओमकार चौधरी का लेख : नए फिल्म उद्योग में बढ़ेंगे मौके

दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में ग्रेटर नोएडा में प्रस्तावित नई फिल्म इंडस्ट्री को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि यहां बनने वाली फिल्म सिटी में वह सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, जो विश्व की किसी भी फिल्म इंडस्ट्री में उपलब्ध हैं। योगी ने यह भी कहा कि जो फिल्म निर्माण में लगे लोगों को सबसे अच्छी सुविधा और माहौल मुहैया कराएगा, वो वहीं जाना पसंद करेंगे। कुछ नेताओं ने योगी के मुंबई दौरे पर सवाल उठाए और ये चुनौती तक दे डाली कि यूपी सरकार में दम है तो फिल्म इंडस्ट्री को वहां से ले जाकर दिखाए। इस पर योगी को कहना पड़ा कि यहां से वो कुछ नहीं ले जा रहे हैं। केवल नई इंडस्ट्री खड़ी कर रहे हैं।

योगी
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 

ओमकार चौधरी

पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मुंबई में थे। राज्य में पूंजी निवेश की संभावना तलाशने के लिए उन्होंने बैंकर्स और उद्योगपतियों से भेंट की। राज्य में बनने वाले डिफेंस कॉरिडोर को लेकर भी उद्योग जगत से परामर्श किया। साथ में फिल्मी हस्तियों से मिलकर दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में ग्रेटर नोएडा में प्रस्तावित नई फिल्म इंडस्ट्री के लिए सुझाव भी मांगे। मुख्यमंत्री का कहना है कि यहां बनने वाली फिल्म सिटी में वह सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी, जो विश्व की किसी भी फिल्म इंडस्ट्री में उपलब्ध हैं।

योगी ने यह भी कहा कि जो फिल्म निर्माण में लगे लोगों को सबसे अच्छी सुविधा और माहौल मुहैया कराएगा, वो वहीं जाना पसंद करेंगे। इक्कीस सितंबर को उन्होंने इसी तरह का विचार-विनिमय लखनऊ में आयोजित बैठक में भी किया था। भाजपा की योगी सरकार के इस कदम की जहां सराहना हो रही है, वहीं कुछ नेता और दल इसमें राजनीति भी तलाश रहे हैं। उन्होंने तरह-तरह के बयान देकर उनके मुंबई दौरे पर प्रश्न भी खड़े किए हैं। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने तो यह चुनौती ही दे डाली कि उत्तर प्रदेश सरकार में दम है तो मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री को वहां से ले जाकर दिखाए। इस पर योगी को कहना पड़ा कि यहां से वो कुछ नहीं ले जा रहे हैं। केवल नई इंडस्ट्री खड़ी कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश कोई अनूठा राज्य नहीं है, अपने यहां फिल्मों के निर्माण का रास्ता खोल रहा है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, पंजाब और हरियाणा से लेकर कई राज्य वहां की भाषाओं में फिल्मों का निर्माण करते आ रहे हैं। कई भाषा और बोलियों में सिनेमा बनता आ रहा है, जिसे पसंद करने वालों की भी अच्छी-खासी संख्या है। भोजपुरी बिहारी भाषा में बनने वाली फिल्मों का एक बहुत बड़ा वर्ग है। हैदराबाद का रामोजीराव स्टूडियो तो एशिया के सबसे बड़े स्टूडियो में माना जाता है। दक्षिण का और बांग्ला भाषी सिनेमा का अपना एक स्थान रहा है। ऐसे में यदि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार ने हिंदी भाषी राज्यों की दिल समझी जानी वाली देश की राजधानी दिल्ली से बिल्कुल सटे हुए ग्रेटर नोएडा में वैकल्पिक फिल्म नगरी बनाने का महत्वाकांक्षी फैसला किया है तो इस पर प्रश्न खड़े करने का क्या मतलब है। अब भी देश के अलग-अलग हिस्सों में, अलग-अलग भाषा और बोलियों में प्रति वर्ष डेढ़ से दो हजार के बीच फिल्में बनती हैं। सीरियल बनते हैं। डाक्यूमेंट्री और दूसरे मनोरंजक कार्यक्रम बनते हैं, जिनमें हजारों कलाकार, निर्माता-निर्देशक और तकनीशियन से लेकर फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े दूसरे लोगों को रोजगार मिल रहा है। केवल मुंबई अकेला शहर नहीं है, जहां फिल्मों आदि की शूटिंग होती है या पोस्ट प्रोडक्शन का काम होता है। अब दूसरे शहरों और राज्यों में अत्याधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं।

हाॅलीवुड इंडस्ट्री का उदाहरण हमारे सामने है, जो किसी एक शहर तक सीमित नहीं है। अलग-अलग शहरों और क्षेत्रों में वह फैली हुई है। सभी जगह विश्व स्तरीय सिनेमा बन रहा है। सवाल यह नहीं है कि अधिकांश फिल्में अथवा मनोरंजन के दूसरे कार्यक्रम कहां बन रहे हैं। अब सवाल यह होना चाहिए कि कैसे बन रहे हैं। उनका स्तर क्या है। वहां सुविधाएं क्या मिल रही हैं। वहां का माहौल श्रेष्ठ कृतियों के निर्माण के अनुकूल है अथवा नहीं। इस पर भी विचार होना आवश्यक है कि मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में सभी प्रतिभाओं के लिए समान अवसर उपलब्ध हैं अथवा नहीं। कई तरह की कमियों-खामियों पर सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत के बाद तीखी बहस हुई है। भाई भतीजावाद को बढ़ावा देने, पक्षपात करने, मूवी माफिया, ड्रग्स माफिया और अंडरवर्ल्ड की दखल की बातें प्रमुखता से सामने आई हैं। कुछ विशेष मूवी माफियाओं की फिल्मों को ही मल्टीप्लेक्स की अधिक से अधिक स्क्रीन मिलने या दिए जाने के गंभीर आरोप लगे हैं। कई बार बहुत अच्छे विषय पर बनी फिल्मों को स्क्रीन नहीं मिलने और प्रतिभावान कलाकारों, निर्देशकों और तकनीशियन को अलग-अलग कर दिए जाने के षड्यंत्र रचे जाने के कई प्रकरण सामने आए हैं। कंगना रनौत के बंगले का हिस्सा जिस तरह तोड़ा गया। उनका मुंह तोड़ने की जिस प्रकार धमकी दी गई। इससे यह बात सिद्ध हुई है कि मुंबई का सिनेमा इधर कई तरह की समस्याओं से घिरा हुआ है।

योगी आदित्यनाथ ने एक और बात कही है कि जो बेहतर माहौल और सुविधाएं देगा, लोग फिल्म निर्माण के लिए वहां जाएंगे। मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में कई दूसरी तरह की समस्याएं भी उजागर हो रही हैं। ड्रग्स लेने, बेचने, खरीदने की समस्या इनमें प्रमुख है। सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध मौत ने कई ऐसे खुलासे कर दिए हैं, जिनकी पहले दबी ज़ुबान से बस चर्चा ही होती थी। हालांकि अवैध नशे की समस्या केवल मुंबई फिल्म इंडस्ट्री तक सीमित हो, ऐसा नहीं है। देश के बहुत से हिस्सों में यह बीमारी तेजी से फैली है। विशेषकर नौजवान इसकी गिरफ्त में आकर जीवन बर्बाद कर रहे हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो कम से कम मुंबई में तो इसकी तह तक जाने की कोशिश कर ही रहा है। बहुत से फिल्म कलाकारों से पूछताछ हो चुकी है। कुछ बरामदगी भी हुई है। तीन दर्जन से अधिक गिरफ़्तारियां भी हुई हैं, परंतु इस मुहिम को लेकर भी कुछ सियासतदानों ने तीखी टीका टिप्पणी की है, मानो केन्द्रीय एजेंसी ने जांच में तेजी लाकर कोई गुनाह कर दिया है।

मुंबई फिल्म नगरी बरसों तक एक स रंग में रंगी हुई नजर आती रही है। विगत कुछ समय से वहां दूसरी विचारधारा के कलाकारों, निर्माता निर्देशकों, तकनीशियंस की आवाजें भी सुनाई पड़नी शुरू हुई हैं। इससे वहां एक अलग तरह का टकराव और संघर्ष देखने को मिल रहा है। दोनों विचारधारा के लोगों का ध्रुवीकरण तेज हुआ है। दूसरे तौर-तरीकों से दूसरी विचारधारा के फिल्मकारों को डराने-धमकाने की कोशिशें और साजिशें भी की गई हैं। केन्द्र की मोदी सरकार के विरुद्ध मोर्चे खोले गए हैं। अवार्ड वापसी से लेकर तमाम दूसरे अभियान चलाने की कोशिशें हुई हैं। उत्तर भारतीय फिल्मकारों, संघर्षरत कलाकारों के साथ जिस तरह के पक्षपातपूर्ण व्यवहार हुए हैं, उससे कई तरह के प्रश्न उठे हैं। परदे के पीछे से मूवी माफिया, अंडरवर्ल्ड, ड्रग्स माफिया और दूसरी ताकतें वहां किस किस तरह के खेल करते हैं, इसका अहसास वहां काम की तलाश में पहुंची प्रतिभाओं को जब तक होता है, तब तक उनका करियर तबाह हो चुका होता है। ऐसे में यदि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री का दिल्ली के आस-पास विकल्प खड़ा किया जा रहा है तो इससे न केवल प्रतिभाओं को मौके मिलेंगे, बल्कि मुंबई को भी आत्ममंथन कर स्वयं के व्यवहार में सुधार करने का एक अवसर मिलेगा। ऐसे में योगी आदित्यनाथ की इस पहल का स्वागत होना चाहिए न कि विरोध। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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