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सतीश सिंह का लेख : युद्ध से तेज होगी तेल की धार

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद विश्व युद्ध का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। प्रतिकूल माहौल में ब्रेंट ब्लेंड क्रूड ऑइल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है। इस युद्ध का प्रभाव भारत में भी कच्चे तेलों पर दिखेगा, क्योंकि भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग पूरी तरह से कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। अभी तक पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल नहीं किया गया है। जीएसटी में शामिल करने से इनकी कीमत में एकरूपता आ सकती है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। ऐसे में आमजन को फिलवक्त इस मोर्चे पर कोई भी राहत मिलना मुश्किल प्रतीत हो रहा है।

सतीश सिंह का लेख : युद्ध से तेज होगी तेल की धार
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सतीश सिंह

सतीश सिंह

रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद विश्व युद्ध का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। प्रतिकूल माहौल में ब्रेंट ब्लेंड क्रूड ऑइल की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गई है, जो वर्ष 2014 के बाद सर्वाधिक है। फिलवक्त, भारत का क्रूड बास्केट 25 देशों में फैला हुआ है। बावजूद इसके इस युद्ध का प्रभाव भारत में भी कच्चे तेलों पर दिखेगा, क्योंकि भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए लगभग पूरी तरह से कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। भारत में कुछ राज्यों में फिलहाल चुनाव चल रहा है, जिसके कारण पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की जा रही है, लेकिन चुनाव के बाद इनकी कीमतों में भारी वृद्धि देखने को मिल सकती है।

एक अनुमान के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में तेजी से देश का चालू खाते का घाटा अगले वित्त वर्ष में जीडीपी का 2.5 प्रतिशत हो सकता है, जिसका वित्त वर्ष 2021-22 में 1 से 1.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। हालांकि, चालू खाते का घाटा बढ़ने के बावजूद देश में संकट की स्थिति नहीं होगी, क्योंकि देश में 11 फरवरी 2022 को विदेशी मुद्रा का भंडार 630 अरब डॉलर था। कच्चे तेल की कीमत में तेजी का राजकोषीय घाटा पर भी ज्यादा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि अब पेट्रोलियम सब्सिडी गैस सिलेंडर तक सीमित रह गई है। वित्त वर्ष 2023 के लिए रसोई गैस सिलेंडर पर 5,812 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि चालू वित्त वर्ष में यह 6,517 करोड़ रुपये था। मौजूदा संकट से इतर, केवल वर्ष 2021 में भारत में कच्चे तेल की कीमत में 21 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हो चुकी है। वैसे, भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमत में वृद्धि का कारण सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ज्यादा कीमत नहीं है। भारत में केंद्र एवं राज्य सरकार पेट्रोल एवं डीजल पर बहुत ज्यादा उत्पाद कर एवं वैट आरोपित करते हैं, जिसकी वजह से भारत में हमेशा पेट्रोल और डीजल की कीमत ज्यादा रहती है। पेट्रोल और डीजल की अंतिम कीमत को समझने के लिए कच्चे तेल के पेट्रोल और डीजल में तब्दील होने की पूरी कहानी समझनी होगी। भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है। भारत में लगभग 80 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात किया जाता है, जबकि 20 प्रतिशत कच्चे तेल का उत्पादन देश में किया जाता है। भारत में कच्चे तेल का उत्पादन ऑयल इंडिया, ओएनजीसी, रिलांयस इंडस्ट्री, केयर्न इंडिया आदि कंपनियां करती हैं।

तेल आयात करने वाली कंपनियों को ओएमसी यानी ऑयल मार्केटिंग कंपनियां कहते हैं। इसमें इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड प्रमुख हैं। 95 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात इन्हीं तीन कंपनियों द्वारा किया जाता है। शेष 5 प्रतिशत का आयात रिलायंस, एस्सार आदि कंपनियां करती हैं। कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करने के बाद उसे रिफायनरी भेजा जाता है, जहां से पेट्रोल और डीजल को तेल कंपनियों को भेजा जाता है, जिस पर तेल कंपनियां अपना मुनाफा जोड़कर उसे पेट्रोल पंप के डीलरों को भेजती हैं। तदुपरांत, डीलर उस पर अपना कमीशन जोड़ता है, जिसका निर्धारण भी तेल कंपनियां करती हैं। उसके बाद केंद्र और राज्य सरकार उस पर कर लगाती हैं। भारत में पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य का निर्धारण रोज किया जाता है। सरकारी तेल विपणन कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों को हर पखवाड़े समीक्षा करती हैं। हालांकि रोज सुबह 6 बजे से पेट्रोल-डीजल की नई कीमत लागू होती हैं। रोज मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया विकसित देशों में भी लागू है।

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के लेन-देन में खरीदार, बेचने वाले से निश्चित तेल की मात्रा पूर्व निर्धारित कीमतों पर किसी विशेष स्थान पर लेने के लिए सहमत होता है। ऐसे सौदे नियंत्रित एक्सचेंजों की मदद से किए जाते हैं। कच्चे तेल की न्यूनतम खरीदारी 1,000 बैरल की होती है। एक बैरल में करीब 162 लीटर कच्चा तेल होता है। चूंकि,कच्चे तेल की कई किस्में व श्रेणियां होती हैं। इसलिए, खरीदार एवं विक्रेताओं को कच्चे तेल का एक बेंचमार्क बनाना होता है। 'ब्रेंट ब्लेंड' कच्चे तेल का सबसे प्रचलित वैश्विक मानदंड है। इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज (आइपीई) के अनुसार दुनिया में दो तिहाई कच्चे तेल की कीमतें 'ब्रेंट ब्लेंड' के आधार पर तय की जाती है। अमेरिका ने अपना एक अलग मानदंड बना रखा है, जिसका नाम है वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट है। कच्चे तेल के आयात से चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी होती है। आम तौर पर कच्चे तेल के मद में हर साल कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की बढ़ोतरी से लगभग 1.6 बिलियन अमेरिकी डॉलर की वृद्धि होती है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से मुद्रास्फीति में इजाफा होता है, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक को नीतिगत दरों में कटौती करने में परेशानी होती है। रिजर्व बैंक ने खुदरा मुद्रास्फीति के चालू वित्त वर्ष में 5.3 प्रतिशत, वित्त वर्ष 2022-23 में 4.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है।

केंद्रीय बैंक के अनुसार चालू तिमाही में मुद्रास्फीति लक्षित सीमा के उच्च स्तर पर बनी रहेगी, जबकि अगले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही से इसमें नरमी आएगी। बावजूद इसके, 11 फरवरी 2022 की मौद्रिक समीक्षा में मौद्रिक नीति समिति ने नीतिगत दरों को यथावत रखा है, जबकि विश्व के अनेक देशों के केंद्रीय बैंकों द्वारा मुद्रास्फीति में तेजी को देखते हुए नीतिगत दरों में इजाफा किया जा रहा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) जनवरी 2022 में बढ़कर 6.01 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो रिजर्व बैंक द्वारा लक्षित दायरे से अधिक है, जबकि सीपीआई दिसंबर 2021 में 5.66 और जनवरी 2021 में 4.06 प्रतिशत थी। वहीं, जनवरी 2022 में थोक महंगाई दर 2021 की तुलना में 12.96 प्रतिशत रही, जबकि यह नवंबर 2021 में यह 14.87 और दिसंबर 2021 में 13.56 प्रतिशत थी। अगर सरकारें पेट्रोल-डीजल पर आरोपित करों में कटौती करेंगी तो आम लोगों को जरूर राहत मिलेगी, लेकिन इससे केंद्र एवं राज्य सरकारों के राजस्व में कमी आएगी। वैसे, पेट्रोल एवं डीजल की कीमत में बढ़ोतरी से भारतीय तेल और गैस कंपनियों को ज्यादा लाभ हो सकता है और खाड़ी देशों में रहने वाले प्रवासी भारतीय ज्यादा धन अपने घर भेज सकते हैं। बहरहाल,सरकारें उत्पाद कर या वैट कम करने के मूड में नहीं हैं।

अभी तक पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल नहीं किया गया है। जीएसटी में शामिल करने से इनकी कीमत में एकरूपता आ सकती है। इस तरह,पेट्रोल-डीजल की कीमत को कम करना पूरी तरह से केंद्र, राज्य सरकार, विपणन कंपनियां, डीलर आदि के हाथों में है, लेकिन फिलवक्त, कोई अपने हिस्से की कमाई को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है और ऊपर से मुद्रास्फीति में भी इजाफा हो रहा है। इधर, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। ऐसे में आमजन को फिलवक्त इस मोर्चे पर कोई भी राहत मिलना मुश्किल प्रतीत हो रहा है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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