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चिंतन: देश की बोझिल टैक्स प्रणाली को सरल बनाने की जरूरत

जीएसटी के अलावा डीटीसी भी लागू करना होगा और टैक्स ट्रांसपेरेंसी भी लानी होगी।

चिंतन: देश की बोझिल टैक्स प्रणाली को सरल बनाने की जरूरत
नई दिल्ली.भारत में अर्से से टैक्स रिफॉर्म लंबित है। हम अभी भी अंग्रेजों के जमाने के टैक्स स्ट्रक्चर में उलझे हुए हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि हमारी टैक्स व्यवस्था उबाऊ है, बोझिल है। इनमें कई लूपहोल्स हैं इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्व ज्ञान संगम में शिरकत करते हुए भारतीय टैक्स की जटिल प्रणाली को सरल बनाने का संदेश ठीक ही दिया है। देश में इनडायरेक्ट टैक्स (अप्रत्यक्ष कर) के मल्टी लेयर सिस्टम के चलते ही पेट्रोल-डीजल पर उसकी लागत से ज्यादा टैक्स है। कई उत्पादों के कच्चे माल पर कई चरणों में टैक्स लगते हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ जाती है।
उदाहरण के लिए अगर एक टीवी बनाने में 50 पार्ट्स की जरूरत है, तो निर्माता कंपनी को उन 50 पार्ट्स पर सेल टैक्स चुकाना होगा, इसके बाद जब टीवी तैयार होगा, तब एक्साइज ड्यूटी, मैट, कॉरपोरेट टैक्स आदि देने होंगे। फिर जब उस टीवी को उपभोक्ता खरीदने जाएगा तो उसे सेल टैक्स देना होगा। इस तरह एक टीवी पर ही कई चरणों में टैक्स देने होते हैं, जबकि वन प्रॉडक्ट पर वन टाइम टैक्स लगना चाहिए। 1991 में उदारीकरण लागू होने के बाद से अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में कई बार सुधार किए गए हैं, लेकिन अभी भी यह पेचीदा ही है। उबाऊ टैक्स व्यवस्था के चलते ही लोग कर चोरी के लिए प्रेरित होते हैं, टैक्स हैवेन देशों की ओर रुख करते हैं। वस्तु और सेवा कर में सुधार के लिए सरकार जीएसटी बिल लेकर आई है। अप्रत्यक्ष कर सुधार के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित होने वाला यह बिल जीएसटी पिछले सात साल से संसद की खाक छान रहा है। 2010 में ही इसे लागू होना था, लेकिन संसद की वोट पॉलिटिक्स के चलते साल दर साल टलता रहा।
पहले कांग्रेस सरकार के समय भाजपा ने अडं़गा लगाया और अब भाजपा सरकार के समय कांग्रेस रोड़ा अटका रही है। 2017 में भी यह बिल पास हो जाए, तो बड़ी बात होगी। ऐसे ही प्रत्यक्ष कर की ऊंची दर की शिकायत के बाद यूपीए सरकार डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) बिल लेकर आई थी, लेकिन संसद में जारी लगातार अड़ंगेबाजी के चलते मोदी सरकार को इसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डालना पड़ा है। प्रत्यक्ष कर में अब कब सुधार होगा, पक्के तौर पर कहा नहीं जा सकता है। तब तक ब्लैकमनी व हवाला कारोबार बढ़ने की संभावना बनी रहेगी। पिछली तारीख से टैक्स कानून के चलते भी भारत सरकार की किरकिरी हो चुकी है। उस समय प्रणब मुखर्जी वित्त मंत्री थे और वोडाफोन को टैक्स नेट में लाना चाहते थे। क्योंकि वोडाफोन ने भारतीय टैक्स प्रणाली की कमियों का लाभ उठाकर हचिसन के अधिग्रहण में भारत सरकार को करीब ग्यारह हजार करोड़ रुपये टैक्स का चूना लगाया था इसलिए प्रणब को रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स (पिछली तारीख से) कानून लाना पड़ा था।
सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा। इस कानून के बाद भी सरकार वोडाफोन को टैक्स नेट में नहीं ला सकी, लेकिन निवेशकों में इस टैक्स कानून का भय अवश्य व्याप्त हो गया। अब नई सरकार को सफाई देनी पड़ती है कि पिछली तारीख से टैक्स नहीं लगेगा। टैक्स पेचीदगी के ऐसे कई उदाहरण हैं। टैक्स ट्रिब्यूनल में हजारों केस पैंडिंग हैं। अब प्रधानमंत्री का कर प्रशासन में सुधार के लिए रैपिड (रेवेन्यू, अकाउंटबिलिटी, प्रॉबिटी, इन्फॉर्मेशन और डिजिटाइजेशन) मंत्र कारगर साबित हो सकता है। पीएम ने टैक्सपेयरों के मन से उत्पीड़न का खौफ हटाने के लिए भी कहा है, लेकिन यदि भारत को अपनी टैक्स प्रणाली में सुधार करना है तो केवल मंत्रों से काम नहीं चलेगा। जीएसटी के अलावा डीटीसी भी लागू करना होगा और टैक्स ट्रांसपेरेंसी भी लानी होगी।
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