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राष्ट्र विरोधी तत्वों पर कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत

मुख्यमंत्री सईद ने भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुर में सुर मिलाते हुए इस पर सख्त नाराजगी जताई है।

राष्ट्र विरोधी तत्वों पर कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत
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श्रीनगर में हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की रैली में बुधवार को जो कुछ भी हुआ उससे हर भारतवासी असहज है। अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की अगुआई में कट्टरपंथी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के समर्थकों ने खुलेआम न सिर्फ पाकिस्तान परस्त और राष्ट्र विरोधी नारे लगाए, बल्कि पाकिस्तानी झंडे भी लहराए।

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यह स्वाभाविक है कि मसर्रत आलम के इस कदम पर केंद्रीय गृहमंत्री ने सख्त रुख अपनाते हुए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद से देश विरोधी गतिविधियों में शामिल तत्वों पर कार्रवाई करने को कहा है। मुख्यमंत्री सईद ने भी गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सुर में सुर मिलाते हुए इस पर सख्त नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा है कि मसर्रत और गिलानी समर्थकों द्वारा जो किया गया वह मंजूर नहीं है।

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उनकी सरकार पाकिस्तानी झंडे और उसके समर्थन में नारेबाजी बर्दाश्त नहीं करेगी। इस राष्ट्र विरोधी कदम के लिए पुलिस ने मसर्रत सहित कइयों के खिलाफ मामला दर्जकर लिया है। अब इसमें शामिल तत्वों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए, ताकि वे फिर से इस तरह के कदम उठाने की जुर्रत न करें। पांच साल पहले मसर्रत आलम को इसी तरह की भारत विरोधी मुहिम चलाने की वजह से गिरफ्तार किया गया था।

हाल ही में जब उसे रिहा किया जा रहा था तब यह आशंका जताईजा रही थी कि वह बाहर आने के बाद कहीं फिर से कश्मीर में अस्थिरता फैलाने वाली गतिविधियों में शामिल न हो जाए। अब नतीजा सबके सामने है। यह असामान्य बात नहीं है कि रैली के दौरान पाकिस्तान से उसके पास करीब बीस बार फोन आए। माना जा रहा हैकि पाकिस्तान के आतंकी संगठन जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए उसे प्रेरित कर रहे थे।

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मसर्रत उस आतंकी हाफीज सईद का नाम ले रहा था जिसने मुंबई हमला कराया था। भारत के मोस्ट वांटेड आतंकी का खुलेआम समर्थन करने वाले की जगह जेल की काल कोठरी है। अलगाववादियों की विचारधारा भारत विरोधी रही है। कहा जाता है कि कश्मीर के अलगाववादियों को पाकिस्तान की शह मिली हुई है। वे पाकिस्तान के इशारों पर आम कश्मीरियों को भारत के खिलाफ भड़काते हैं। यह हास्यास्पद है कि जो अलगाववादी लोकतंत्र में विश्वास नहीं करते और न ही चुने हुए प्रतिनिधि हैं। वे चंद कश्मीरियों को गुमराह करके अपने पक्ष में कर लेते हैं और उसे ही जम्मू-कश्मीर की आवाज करार दे देते हैं।

वहीं पाकिस्तान भारत की चुनी हुई सरकारों से पूर्व इन अलगाववादियों को गले लगाता है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि ही क्षेत्र विशेष की आवाज होते हैं। हाल ही में वहां विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए हैं, जिसमें रिकॉर्ड करीब साठ फीसदी मतदान हुआ। जाहिर है, आम कश्मीरियों का भारतीय लोकतंत्र में विश्वास बढ़ रहा है। वे अलगाववाद और आतंकवाद नहीं लोकतंत्र की भाषा समझने लगे हैं और इसी से बदलाव लाना चाहते हैं।

इस बार जम्मू-कश्मीर में ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन हुआ है। भारतीय जनता पार्टी पहली बार पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई है। दोनों की गठबंधन सरकार साझा न्यूनतम कार्यक्रम के तहत जम्मू-कश्मीर में विकास के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रही है। जाहिर है, इसी से अलगाववादी और आतंकवादी बौखलाए हुए हैं। उन्हें अपना वजूद खत्म होने का भय सता रहा है। लिहाजा वे अपनी मौजूदगी दर्शाने के लिए राष्ट्र राज्य की सीमाओं का उल्लंघन कर रहे हैं। केंद्र व राज्य सरकार को भारत की संप्रभुता और अखंडता पर चोट पहुंचाने वाले इन तत्वों को करारा जबाव देने में देर नहीं करनी चाहिए।

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