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Editorial : ममता की हार से बंगाल में जीत का स्वाद फीका

चुनाव परिणाम को देखकर ऐसा लग रहा है मानो भाजपा ने बाजीगर जैसा प्रदर्शन किया है। भाजपा ने सत्ता से दूर रहकर भी काफी कुछ जीती है। 2011 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 4.1%, 2014 के लोकसभा चुनाव में 17 फीसदी, 2016 के विधानसभा चुनाव में 10.3 फीसदी और 2019 के लोकसभा चुनाव में 40.3 फीसदी वोट मिले थे। 2021 में तृणमूल कांग्रेस को 49 फीसदी व भाजपा को करीब 38 फीसदी वोट मिले हैं, कांग्रेस 3 फीसदी से नीचे आ गई है व वाम मोर्चा 5 फीसदी के करीब सिमट गया है।

Editorial : ममता की हार से बंगाल में जीत का स्वाद फीका
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सीएम ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी - फाइल फोटो

Haribhoomi Editorial : पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम अपेक्षित ही आए हैं। चुनाव पूर्व सर्वे, विशेषज्ञों के अनुमानों और एक्जिट पोलों में जो दावे किए गए थे, पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल व पुडुचेरी में कमोबेस वही नतीजे आए हैं। असम में भाजपा की वापसी हुई है, केरल में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) ने सत्ता बरकरार रख इतिहास रचा है, तो तमिलनाडु में नागरिकों ने बदलाव किया है, वहां सत्ताधारी अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन की हार हुई है और दस साल बाद डीएमके की वापसी हुई है। वहां डीएमके कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही थी। पुडुचेरी में राजग को सत्ता मिलती दिख रही है।

इस बार सबसे बड़ा चुनाव पश्चिम बंगाल का माना जा रहा था, जहां भाजपा ने 'असोल परिबोर्तन', 'सोनार बांग्ला' नारों के साथ पूरी ताकत झोंक रखी थी। पश्चिम बंगाल में भाजपा पीएम नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा जैसे स्टार प्रचारकों के साथ अपनी पूरी ताकत विधानसभा चुनाव लड़ रही थी। बंगाल में बेशक ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी (ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस) को तीसरी बार सत्ता मिली है, लेकिन वहां भाजपा की हार नहीं मानी जा सकती है। भाजपा जहां 2016 में तीन सीट पर थी, इस बार 2021 में 78 सीट पर जीत दर्ज की है। किसी इलेक्टोरल पार्टी को पांच साल में इतनी बड़ी सफलता कम ही देखने को मिलती है। नंदीग्राम से ममता बनर्जी की हार टीएमसी की बड़ी शिकस्त व भाजपा की यादगार विजय है। इस हार ने टीएमसी की हैट्रिक का स्वाद फीका कर दिया है। भाजपा ने वाम मोर्चा व कांग्रेस को चुनावी रूप से राज्य से बाहर कर दिया है और पार्टी टीमएसी के सामने मजबूत विपक्ष बनकर उभरी है। कायदे से इस चुनाव में बंगाल में भाजपा स्थापित हो गई है।

वर्ष 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 211, लेफ्ट को 33, कांग्रेस को 44 और भाजपा को मात्र 3 सीटें मिली थीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने बंगाल में अच्छा प्रदर्शन किया था। राज्य के 42 लोकसभा सीटों में से 18 पर जीत दर्ज की थी, उस वक्त 122 विधानसभा सीटों पर भाजपा को बढ़त हासिल हुई थी। चुनाव परिणाम को देखकर ऐसा लग रहा है मानो भाजपा ने बाजीगर जैसा प्रदर्शन किया है। भाजपा ने सत्ता से दूर रहकर भी काफी कुछ जीती है। 2011 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 4.1%, 2014 के लोकसभा चुनाव में 17 फीसदी, 2016 के विधानसभा चुनाव में 10.3 फीसदी और 2019 के लोकसभा चुनाव में 40.3 फीसदी वोट मिले थे। 2021 में तृणमूल कांग्रेस को 49 फीसदी व भाजपा को करीब 38 फीसदी वोट मिले हैं, कांग्रेस 3 फीसदी से नीचे आ गई है व वाम मोर्चा 5 फीसदी के करीब सिमट गया है। विस चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशत में 28 फीसदी का जंप है।

वोटिंग प्रतिशत बता रहे हैं कि पश्चिम बंगाल की जनता ने केवल टीमएमसी और भाजपा पर भरोसा किया है, तीन दशक तक पश्चिम बंगाल में सत्ता चलाने वाली वाम दलों को जनता ने नकार दिया है व कांग्रेस का भी यही हश्र है। इन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम अगले साल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों पर असर डालेंगे, जिसमें भाजपा की राह कठिन होगी। भाजपा को जहां हिंदुत्व, आक्रामक राष्ट्रवाद व अस्मिता-भावना से आगे बढ़कर अपनी चुनावी रणनीति बदलनी होगी, वहीं अब विपक्ष अधिक एकजुट व आक्रामक दिखेगा। ममता की जीत से विपक्षी खेमे को संजीवनी मिली है, अब पश्चिम बंगाल से बाहर ममता का राजनीतिक कद बढ़ेगा। डीएमके भी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका निभाती नजर आएगी। गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस फेडरल फ्रंट के आइडिया को पंख लगेगा। कांग्रेस को पार्टी के रूप में अपने भविष्य को लेकर गहन चिंतन करना होगा। पांच राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन संतोषजनक भी नहीं रहा।

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