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लोकसभा चुनाव 2019 : राहुल गांधी जी ''वायनाड'' के खतरे भी जान लो

वायनाड को तमिल और मलयालम के शब्द नाड का विस्तार माना जाता है जिसका अर्थ होता है धान की खेती। राहुल गांधी के अमेठी के साथ केरल की वायनाड से भी चुनाव लड़ने की घोषणा कर पूरे देश का ध्यान इस ओर खींच गया है। एडक्कल गुफाओं, झरनों व अन्य पर्यटक स्थलों के कारण प्रसिद्ध वायनाड चुनाव तक चर्चा का केन्द्र बना रहेगा।

लोकसभा चुनाव 2019 : राहुल गांधी जी

वायनाड को तमिल और मलयालम के शब्द नाड का विस्तार माना जाता है जिसका अर्थ होता है धान की खेती। राहुल गांधी के अमेठी के साथ केरल की वायनाड से भी चुनाव लड़ने की घोषणा कर पूरे देश का ध्यान इस ओर खींच गया है। एडक्कल गुफाओं, झरनों व अन्य पर्यटक स्थलों के कारण प्रसिद्ध वायनाड चुनाव तक चर्चा का केन्द्र बना रहेगा।

वायनाड में ही कबिनी की सहायक नदी करमनतोडु पर बना देश का सबसे बड़ा बांध बाणसुर सागर भी है। चूंकि यहां की कुछ चोटियां समूह समुद्र तल से 2100 मीटर तक उंची हैं, इसलिए यह ट्रैकिंग के लिए भी लोकप्रिय है। राहुल गांधी के उम्मीदवार बनने के बाद यह राजनीतिक ट्रैकिंग का क्षेत्र भी बन गया है।

अमेठी में 2009 के मुकाबले 2014 में जीत का अंतर काफी कम हो जाने और 2017 में यहां की सारी विधानसभा सीटें हार जाने के तर्क को हम परे रखते हैं। राहुल अमेठी में पराजय के डर से भागेंगे यह नहीं माना जा सकता, तो फिर? कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एके एंटोनी के अनुसार पिछले कई हफ्ते से मांग उठ रही थी कि राहुल दक्षिण भारत से भी चुनाव लड़ें।

केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक से नेताओं के ऐसे बयान आए जिनमें राहुल गांधी को अपने राज्य से चुनाव लड़ने का आमंत्रण दिया गया था। ऐसे आमंत्रण को सार्वजनिक कराने के पीेछे मुख्यतः पार्टियों की राजनीतिक रणनीति की भूमिका सर्वोपरि होती है। इससे एक वातावरण बनाकर घोषणा की जाती है ताकि लगे कि वाकई उनके नेता की इतनी लोकप्रियता है कि कई राज्य एक साथ उनको चुनाव लड़ने के लिए अपने यहा बुला रहे हैं।

राहुल गांधी को राष्ट्रीय स्तर पर बड़े कद का नेता साबित करना कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति है। वैसे भी अमेठी के लोगों को सामान्य तौर पर समझाना शायद कठिन होता कि परिवार की परंपरागत सीट के साथ उन्हें दूसरी किसी सीट से लड़ने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई। अब वे कह सकते हैं कि कार्यकर्ताओं की मांग को देखते हुए उन्हें ऐसा करना पड़ा है।

कांग्रेस वायनाड के चुनाव के पीछे इसके सांस्कृतिक और भौगोलिक महत्व को उल्लिखित करती है। वास्तव में केरल का भाग होते हुए भी वायनाड सीट की सीमा एक ओर कर्नाटक के मैसूर और चामराजनगर तथा दूसरी ओर तमिलनाडु के नीलगिरि क्षेत्र से लगती है। पार्टी मानती है कि राहुल का यहां से चुनाव लड़ना एक तरह से पूरे दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व होगा।

कर्नाटक में कांग्रेस जद-सेक्यूलर की सरकार है जिसके साथ उसका चुनावी गठबंधन है तो तमिलनाडु में भी वह द्रमुक नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल है। कांग्रेस का तर्क मान लेते हैं। किंतु वायनाड ही क्यों का जवाब इतने से नहीं मिलता। कृषि प्रधान क्षेत्र होने के कारण कहा जा सकता है कि राहुल गांधी शायद किसानों को लेकर अपनी संवेदनशीलता दर्शाने के लिए यहां से लड़ रहे हैं।

लेकिन एक बड़ा कारण तो यही है कि कांग्रेस के लिए यह सुरक्षित सीट है। केरल की वायनाड सीट पर अभी कांग्रेस का कब्जा है। हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वायनाड सीट पर केवल 20,870 वोटों के अंतर से जीत हासिल हुई थी। कांग्रेस उम्मीदवार एमआई शानवास को माकपा के सत्यन मोकेरी से 1.81 प्रतिशत ज्यादा मत मिले थे।

भाजपा के पीआर रस्मिलनाथ को यहां से केवल 80,752 मत हासिल हुए। हालांकि केरल में भाजपा का जनाधार इस बीच काफी विस्तृत हुआ है। बावजूद वह अपने गठबंधन के साथ इस सीटे से बहुत बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद नहीं कर सकती। इसलिए हम इसकी चर्चा यहीं छोड़ते हैं तो सुरक्षित सीट एक प्रमुख कारण लगता है, लेकिन यह सुरक्षित है क्यों?

वस्तुतः मुख्य बात वहां के सामाजिक समीकरण की है। राहुल की उम्मीदवारी की घोषणा होते ही मीडिया में वहां की आबादी का उल्लेख होने लगा है। 2011 की जनगणना के अनुसार वायनाड जिले की कुल आबादी 8,17,420 है। जिले की 89.03 प्रतिशत आबादी साक्षर है। वायनाड में हिन्दुओं की संख्या 4 लाख 04 हजार ,460 , मुसलमानों की 2 लाख 34 हजार 85 एवं ईसाइयों की आबादी 1 लाख 74 हजार 453 है।

कहने का तात्पर्य यह कि यहां की मुस्लिम आबादी राहुल के लिए इसे सुरक्षित सीट बना देती है। इस सच को समझने के बाद आप कांग्रेस की रणनीति को लेकर सही निष्कर्ष निकाल सकते हैं। केरल में लोकतांत्रिक मोर्चा एवं वाममोर्चा दोनों के बीच मुस्लिम मतों को लेकर प्रतिस्पर्धा रही है। वहां भाजपा के मजबूत न होने के कारण संघ के कार्यकर्ताओं के बड़े वर्ग का मत भी इन दोनों मोर्चा के उस घटक की ओर जाता था जो मुस्िलम उम्मीदवारों को हरा सकते थे।

पिछले सालों में भाजपा यहां मजबूत हुई है। हिन्दुओं के बड़े तबके का आकर्षण भाजपा है। सबरीमाला पर भाजपा के आक्रामक होने के बाद कांग्रेस पर भी इसी रास्ते आने का दबाव बढ़ा। इसे खत्म करने के लिए राहुल गांधी की निष्ठावान हिन्दू की छवि निर्माण करने की सुनियोजित कोशिशें हुईं हैं। प्रियंका बाड्रा को भी उसी रास्ते पर चलाया जा रहा है।

किंतु कांग्रेस के हिन्दुत्व की सीमा है। वह चुनावों में मुस्लिम मत खिसक जाने का जोखिम भी नहीं उठाना चाहती। केरल के हिन्दू मतों मंे भाजपा की पैठ बढ़ने के बाद चुनाव आते-आते उसे अपना आवरण बदलना पड़ रहा है। आंध्र एवं तेलांगना में भी उसकी यही दशा है। तो राहुल मुस्लिम बहुल क्षेत्र से खड़ा होकर यह संदेश देने की भी कोशिश कर रहे हैं कि कांग्रेस ने उनका साथ छोड़ा नहीं है।

इस तरह राहुल का वायनाड से लड़ना कांग्रेस के हिन्दुत्व एवं सेक्यूलरवाद के बीच झूलने का परिचायक है। भाजपा ने इस पहलू को मुद्दा बना भी दिया है। वायनाड राहुल जीत तो सकते हैं, वहां मुसलमान वाममोर्चा की जगह उनको प्राथकिता देंगे। किंतु ऐसा न हो कि दूसरे राज्यों में इसके विपरीत संदेश चले जाएं। भाजपा ने इसे जिस तरह मुद्दा बनाया है उसमें इसकी संभावना बढ़ रही है।

दो नावों की सवारी हमेशा खतरनाक होती है। वाममोर्चा के नेताओं ने राहुल एवं कांग्रेस के इस रवैये पर जितना तीखा हमला बोला है उसके मायने भी है। इसका कुछ न कुछ असर तो देश भर के मतदाताओं पर होगा। और जो होगा वह कांग्रेस के अनुकूल तो नहीं ही हो सकता। राहुल गांधी और कांग्रेस के रणनीतिकारों को न भूलना चाहिए कि सोनिया गांधी को भी 1999 में अमेठी के अलावा कर्नाटक में कांग्रेस के लिए तब तक सबसे सुरक्षित सीट बेल्लारी से लड़ाया गया था। वे वहां से जीतीं और कर्नाटक में उसे 18 सीटें भी मिलीं लेकिन अन्य राज्यों में उसका प्रदर्शन खराब रहा तथा कांग्रेस ने तब तक की सबसे कम 114 सीटें जीतने का रिकॉर्ड बना लिया।

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