Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

रोहित कौशिक का लेख : जहरीली हवा की गिरफ्त में जिंदगी

पिछले दिनों शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पाॅलिसी इंस्टीटयूट की ओर से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण की वजह से 40 फीसदी भारतीयों की उम्र नौ साल घट सकती है। मध्य, पूर्वी और उत्तर भारत के क्षेत्रों मे रहने वाले 48 करोड़ से ज्यादा लोग जिस तीव्रता के वायु प्रदूषण को झेल रहे हैं, वैसा प्रदूषण कोई अन्य देश नहीं झेल रहा है। 75 फीसदी से अधिक वायु प्रदूषण वाहनों से होता है। वायु प्रदूषण पर लगातार हो रहे अध्ययन हमें बार-बार चेतने का संदेश देते रहे हैं। अगर हम अब भी नहीं चेतते हैं तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

Delhi Pollution: दिल्ली में वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में दर्ज, 300 के पार AQI
X

दिल्ली में वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में दर्ज

रोहित कौशिक

हाल ही में शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पाॅलिसी इंस्टीटयूट (ईपीआईसी) की ओर से जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि वायु प्रदूषण की वजह से 40 फीसदी भारतीयों की उम्र नौ साल घट सकती है। वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक (एक्यूएलआई) रिपोर्ट के अनुसार भारत में समय के साथ भौगोलिक रूप से वायु गुणवत्ता काफी तेजी से खराब हुई है। मध्य, पूर्वी और उत्तर भारत के क्षेत्रों मे रहने वाले 48 करोड़ से ज्यादा लोग जिस तीव्रता के वायु प्रदूषण को झेल रहे हैं, वैसा प्रदूषण कोई अन्य देश नहीं झेल रहा है। हालांकि इस रिपोर्ट में भारत के राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की सराहना की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रदूषण कम किया जाता है तो औसत जीवन लगभग पांच वर्ष तक बढ़ सकता है। कुछ समय पहले संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण विशेषज्ञ डेविड बोयड ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि करीब छह अरब लोग नियमित रूप से घातक प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं, जिससे उनका जीवन और स्वास्थ्य जोखिम में घिरा है। इसके बावजूद इस महामारी पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है। डेविड बोयड के अनुसार हर घंटे 800 लोग मर रहे हैं, जिनमें से अनेक स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं झेलने के कई वर्षों बाद मर रहे हैं। कैंसर, सांस की बीमारियां और दिल के रोगों में प्रदूषित हवा के कारण लगातार वृद्धि हो रही है।

एक अनुमान के अनुसार घर के अन्दर और बाहर होने वाले वायु प्रदूषण के कारण हर साल करीब 70 लाख लोगों की मौत समय से पहले हो जाती है, जिनमें छह लाख बच्चे भी शामिल हैं। हमारे देश में निर्माण सम्बन्धी गतिविधियों, औद्योगिक प्रदूषण, पराली जलाने की प्रक्रिया, जीवाश्म इंधन तथा वाहनों के निकलने वाले धुएं के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। पिछले दिनों एक अध्ययन में बताया गया था कि वायु प्रदूषण टाइप-2 मधुमेह को भी बढ़ा रहा है। पीएम-2.5 टाइप-2 मधुमेह के मामलों और मृत्यु को बढ़ाता है। पीएम-2.5 को उच्च रक्तचाप के लिए भी जिम्मेदार माना गया है। हमारे देश में वायु प्रदूषण के कारण सांस की बीमारियों, हृदय की बीमारियों, हृदयाघात, फेफड़ों के कैंसर के फलस्वरूप समय से पूर्व मृत्यु की दर बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में लगातार वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण प्रदूषण और सांस से सम्बन्धित विभिन्न बीमारियां पनप रही हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ डेविड बोयड के अनुसार स्वच्छ हवा प्राप्त करना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इस तरह स्वच्छ हवा सुनिश्चित न कर पाना स्वस्थ पर्यावरण के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के लिए कुछ प्रयास किए जाने की जरूरत है। इनमें वायु गुणवत्ता एवं मानव स्वास्थ्य पर उसके प्रभावों की निगरानी, वायु प्रदूषण के स्राेतों का आकलन और जन स्वास्थ्य परामर्शों समेत अन्य सूचनाओं को सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराना शामिल हैं। यह कटु सत्य है कि वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला जहरीला धुआं है। वायु प्रदूषण पर इस तरह के अध्ययन न केवल वाहनों के माध्यम से होने वाले वायु प्रदूषण पर हमारी आंखें खोलते हंै बल्कि जरूरत से ज्यादा ऐशो-आराम की जिन्दगी जीने की लालसा पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हंै। गौरतलब है कि 75 फीसदी से अधिक वायु प्रदूषण वाहनों से होता है। वाहनों से निकलने वाले धुएं में कार्बनमोनोआॅक्साइड, नाइट्रोजन आॅक्साइड, हाडड्रोकार्बन तथा सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर जैसे खतरनाक तत्व एवं गैसें होती हैं जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। कार्बनमोनोआॅक्साइड जब सांस के जरिये शरीर के अन्दर पहुंचता है तो वहां हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर कार्बोक्सीहीमोग्लोबिन नामक तत्व बनाता है। इस तत्व के कारण शरीर में आक्सीजन का परिवहन सुचारू रूप से नहीं हो पाता है। नाइट्रोजनमोनोआक्साइड एवं नाइट्रोजनडाईआक्साइड भी कम खतरनाक नहीं हैं। नाइट्रोजनमानोआक्साइड कार्बनमोनोआक्साइड की तरह ही हीमोग्लोबिन के साथ मिलकर शरीर में आक्सीजन की मात्रा घटाता है। इसी तरह नाइट्रोजनडाइआक्साइड फेफड़ों के लिए बहुत ही खतरनाक है। इसकी अधिकता से दमा और ब्रोंकाइटिस जैसे रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। वातावरण में हाइड्रोकार्बन की अधिकता कैंसर जैसे रोगों के लिए जिम्मेदार है। वाहनों से निकलने वाला इथाईलीन जैसा हाडड्रोकार्बन थोड़ी मात्रा में भी पौधों के लिए हानिकारक है। सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर बहुत छोटे-छोटे कणों के रूप में विभिन्न स्वास्थ्यगत समस्याएं पैदा करते हैं। ऐसे तत्व हमारे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाकर सांस संबंधी रोग उत्पन्न करते हैं। दरअसल पुराने जमाने में लोग बैलगाड़ियों से सफर किया करते थे।

इस दौर में न तो बैलगाड़ियों का अस्तित्व रहा और न सफर के किस्से सुनाने वाले बुजुर्ग ही रहे। तेज भागती जिन्दगी में बैलगाड़ियों से सफर करना संभव भी नहीं है, इसलिए यह किस्सा बनकर रह गया है। वह धीमा सफर न केवल पर्यावरण के अनुकूल था, बल्कि हमें प्रकृति के साथ भी जोड़े रखता था। धीरे-धीरे सफर की रफ्तार बढ़ी तो हमारी समस्याओं की रफ्तार भी बढ़ने लगी। मध्यमवर्गीय परिवारों में स्कूटर खरीदने का स्वप्न पूरा होने पर खुशियां मनाई जाने लगीं। धीरे-धीरे इन परिवारों में मोटरसाइकिलों की संख्या में भी वृद्धि हुई। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण की आंधी ने मध्यमवर्गीय परिवारों को कार खरीदने का स्वप्न दिखाया। आज समृद्ध गांवों की स्थिति यह है कि हर तीसरे-चौथे घर में एक कार मौजूद है। निश्चित रूप से यह विकास सुखद है, लेकिन जब यह विकास विभिन्न रूपों में विनाश को दावत देता है तो यह विकास ही दुखद हो जाता है। इस मुद्दे पर शहरों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। अकेले दिल्ली में ही प्रतिदिन चालीस लाख वाहन सड़कों पर दौड़ते हैं। एक अनुमान के अनुसार यदि निजी वाहनों के बढ़ने की रफ्तार इसी तरह जारी रही तो दिल्ली में 2030 तक 1.5 करोड़ वाहन पंजीकृत हो जाएंगे।

दरअसल इस दौर में हमने वाहनों को सुविधा से ज्यादा समस्या बना लिया है। यही कारण है कि तेजी से बढ़ते वाहन हमारे लिए सिरदर्द बनते जा रहे हैं। भले ही हमारे घर में गाड़ी खड़ी करने की जगह न हो, लेकिन पड़ोसी के पास गाड़ी है तो हमें भी गाड़ी चाहिए। झूठी प्रतिष्ठा अंततः हमारे स्वास्थ्य को भी झुठला रही है। हालांकि सड़कों पर वाहनों का दबाव कम करने के लिए बार-बार कार-पूल की सलाह दी जाती है। यानी एक जगह से आने-जाने वाले दो या अधिक लोगों को एक ही गाड़ी का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन झूठी प्रतिष्ठा के लिए इस सलाह को भी दरकिनार कर दिया जाता है। वायु प्रदूषण पर लगातार हो रहे अध्ययन हमें बार-बार चेतने का संदेश देते रहे हैं। अगर हम अब भी नहीं चेतते हैं तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story