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ओम प्रभात अग्रवाल का लेख : कोरोना के बाद की जिंदगी

लाॅकडाउन के अब धीरे-धीरे खुलने पर एक अहसास पनपने लगा है कि तालाबंदी के पहले की जीवन शैली का वापस लौटना असंभव है। लाॅकडाउन के दिनों में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि सभी क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन दिखने लगा।

ओम प्रभात अग्रवाल का लेख : कोरोना के बाद की जिंदगी
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ओम प्रभात अग्रवाल

लगभग तीन माह पूर्व समस्त देश कोरोना दानव की निर्बाध प्रगति पर ब्रेक लगाने के लिए ताले में बंद हो गया। सभी व्यापारिक, सामाजिक, आर्थिक गतिविधियां निश्चल हो गईं, सामान्य जीवन स्थिर हो गया। लाॅकडाउन के अब धीरे-धीरे खुलने पर एक अहसास पनपने लगा है कि तालाबंदी के पहले की जीवन शैली का वापस लौटना असंभव है। लाॅकडाउन के दिनों में परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि सभी क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन दिखने लगा। विशेषज्ञ इस बात का अनुमान लगा रहे हैं कि कोरोना काल के बाद का सामाजिक, आर्थिक परिवेश कैसा होगा।

सबसे पहले परिवार को लें। लंबे समय तक बाहरी दुनिया से केवल नगण्य से संपर्क के साथ समस्त परिवार घर में एक प्रकार से कैद होकर रह गया। बिना पहले वाली व्यस्तता के हर समय एक साथ रहने का परिणाम हुआ कि मन पर अवसाद ने डेरा जमा लिया और घरेलू हिंसा बहुत बढ़ गई। परिवारों में आई टूटन के कारण आशा की जा सकती है कि उत्तर कोरोना काल के पारिवारिक जीवन में पहले वाली मधुरता काफी समय बाद ही पुनः स्थापित हो सकेगी। यह देरी इसलिये भी अधिक होगी कि जैसी कि भविष्यवाणी है, उत्तर कोरोना काल में वर्ष 2020 में भीषण मंदी का समाना करना होगा।

सेवा क्षेत्र का हुलिया भी बिलकुल बदला दिखेगा। कंपनी निदेशकों का अनुभव रहा कि वर्क फ्राॅम होम सिद्धांत से उत्पादकता बढ़ती है। सेवा क्षेत्र में यह सिद्धांत बड़े स्तर पर लागू हो सकता है। टेली कम्यूनिकेशन भी बढ़ता जाएगा। टाटा कंसल्टेंसी की माने तो इसमें 25 प्रतिशत की वृद्धि संभावित है। सरकारी सेवाओं में टेक्नोलाॅजी का अधिक उपयोग होने लगेगा। वह भी भीड़ घटाएगा। शिक्षा क्षेत्र में आनलाइन व्याख्यानों, परीक्षाओं का ट्रेंड बढ़ता जाएगा। इससे छात्र वर्ग में असंतोष भी जाग सकता है क्योंकि लगभग 50 प्रतिशत छात्रों के पास ई-शिक्षा के साधन नहीं हैं। मई 2020 का एक सर्वेक्षण इस बात को सिद्ध भी करता है अधिकांश छात्र ई-शिक्षा से असंतोष व्यक्त भी कर चुके हैं। केरल में तो एक 14 वर्षीय छात्रा ने इसी कारण आत्महत्या भी कर ली थी। वैसे भी शिक्षा में अध्यापक द्वारा विद्यार्थियों के समक्ष उपस्थित होकर ज्ञान दान करने का कोई अधिक अच्छा विकल्प हो ही नहीं सकता। इस तथ्य को शिक्षाविद ऋषीकेश सत्पथी स्वीकार भी कर चुके हैं। कहीं कहीं असंतोष वाली बात को सरकारों ने माना भी है। कर्नाटक सरकार ने जून माह में लोअर केजी से पांचवीं कक्षा तक ई-शिक्षा प्रतिबंधित कर दी। फिर भी लाॅकडाउन के दिनों में चस्का पड़ा जाने के कारण ई-शिक्षा में उत्तरोत्तर प्रगति हो सकती है। कोचिंग केन्द्रों के स्थान पर ई-कोचिंग प्रारंभ हो सकती है। हरियाणा ने तो कक्षा 12 तक ई-शिक्षा का निर्णय ले भी लिया है। लाॅकडाउन के दिनों का अनुभव बताता है कि इससे विद्यार्थी और अध्यापक दोनों पर काम का दबाव अत्यधिक बढ़ जाएगा। टैबलेट या स्मार्ट मोबाइल पर घंटों आंख गड़ाकर बैठे रहने से ऊब का अनुभव होगा।

घरेलू व्यापार में ग्राहक बाजार जाने से परहेज करेगा तथा इसी कारण घरों में आॅनलाइन सामान मंगाने पर जोर हो जाएगा। सड़कों तथा बाजारों में भीड़ घटेगी। अधिकांश लेनदेन डिजिटल होने लगेगा यद्यपि कैश का महत्व बना रहेगा। व्यापार एवं घरेलू कामकाज में आर्टीफीशियल इंटेलिजेंस का महत्व बढ़ेगा। लोग इन कामों के लिए रोबोट की सहायता लेना प्रारंभ करेंगे। वस्तुतः यह ट्रेंड लाॅकडाउन के दिनों से ही अस्तित्व में आ भी चुका है।

लाॅकडाउन की अवधि में बड़ी संख्या में लोग समाचारपत्रों का ई-रूप ही अपने मोबाइलों, टैबलेटों आदि पर पढ़ने लगे थे। अतः उत्तर कोरोना काल में भी अनेक में यह आदत बनी रह सकती है और कोरोना काल के पहले की पाठक संख्या प्राप्त करने में समय लग सकता है। यह परिणाम पत्रिकाओं आदि को भी भुगतना पड़ सकता है।

कोरोना काल ने लोगों की जीवनशैली में एक सकारात्मक परितर्वन करते हुए उन्हें फिर से भारतीयता की और उन्मुख कर दिया। स्पर्श से बचने के लिए हाथ मिलाने के स्थान पर हाथ जोड़ना पुनः प्रचलित हुआ और उत्तर कोरोना काल में भी यह अवश्य ही चलता रहेगा। इसी प्रकार, बार बार हाथ धोना अथवा जहां तक हो जूते चप्पल आदि घर के बाहर उतार देना आदि भी ऐसी आदतें पुनर्विकसित हुई हैं जो चलती रहेंगी। एक समाचार था कि बिल्डर अब इसीलिए ऐसे घर बनाने जा रहे हैं जिनमें बाहर ही हाथ पैर धोने की व्यवस्था होगी। नई हाउसिंग सोसायटियों आदि में खुली छत पर व्यवस्था होगी कि होम थियेटर खुल सकें क्योंकि लोग अब मल्टीप्लेक्स आदि में जाने से बचते रहेंगे। कोरोना काल में एक और सकारात्मक बदलाव हुआ। प्रदूषण की मात्रा अत्यधिक घट जाने से वातावरण स्वच्छ हो गया। कोरोना काल के बाद के जीवन में भी जैसा कि लिखा जा चुका है, सड़कों पर कारों आदि की आवाजाही में कुछ कमी आ सकती है। अतः वातावरण उस समय भी इतना प्रदूषित नहीं रहेगा जितना कोरोना से पहले के काल में। कोरोना काल के बाद का जीवन निश्चय ही एक नए प्रकार की शैली का होगा।

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