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आलोक पुराणिक का लेख : छलांगें लगाता विदेशी मुद्रा कोष

कारोबारी को दुनिया को आशावादिता के नजरिये से देखना होता है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों को भारत में आशा दिख रही है। इसलिए भारत में निवेश आ रहा है, भारतीय प्रतिभूतियों में निवेश आ रहा है। यही वजह है कि अर्थव्यवस्था पर भले ही संकट का अंधेरा छाया हुआ दिखता हो, पर शेयर बाजार पूरी चमक के साथ जगमगा रहा है। कारोबार और शेयर बाजार उम्मीद पर कायम है।

आलोक पुराणिक का लेख : छलांगें लगाता विदेशी मुद्रा कोष
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आलोक पुराणिक

शुक्रवार को रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए आंकड़ों के हिसाब से चार सितंबर 2020 को भारतीय विदेशी मुद्रा कोष 542.01 अरब डालर के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गया है। 542 अरब डालर से ऊपर का स्तर ऐसा स्तर है, जो भारत में कभी नहीं देखा गया। संकटग्रस्त अर्थव्यवस्थाओं का एक लक्षण यह है कि वहां विदेशी मुद्रा कोष में लगातार कमी देखी जाती है। 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे ही संकट में थी। विदेशी मुद्रा कोष अपर्याप्त थे। अपर्याप्तता इतनी अधिक थी कि सोने को गिरवी रखना पड़ा था। अब एक तरफ तो आंकड़े बता रहे हैं कि अर्थव्यवस्था में सिकुड़ाव होने जा रहा है। 2020-21 में अर्थव्यवस्था दस प्रतिशत तक कुल सिकुड़ाव दर्ज करेगी, ऐसी आशंकाएं तमाम एजेंसियों और विशेषज्ञों की हैं। दूसरी तरफ विदेशी मुद्रा कोष फैलता जा रहा है। यह उल्टी गंगा क्यों बह रही है। इसका आशय क्या हैं। यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है।

सबसे पहली बात तो यह है कि भारत में कोरोना से जनित जो आर्थिक संकट है, वह सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट नहीं है। वह मूलत एक ग्लोबल संकट है। ग्लोबल संकट का एक हिस्सा भारत में भी है, तो कोरोना की तबाही भारत में भी दिख रही है। इसके अलावा अप्रैल-जून 2020 की अवधि में भारत में बहुत सख्त लाॅकडाउन रखा गया था। इसके कारण तमाम आर्थिक गतिविधियां ध्वस्त हो गई थीं। जीएसटी संग्रह भी बहुत घट गया था। यानी कोरोना की वजह से हुए लाॅकडाउन ने अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचाई। पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को समझ में आया कि लाॅकडाउन को अगर ज्यादा लंबे समय तक चलाया गया, बहुत सख्ती से तो फिर अर्थव्यवस्था बिलकुल बैठ जाएगी और इसलिए लाॅकडाउन में राहत दी गई है। कमोबेश अब हर आर्थिक गतिविधि वापसी की राह पर है। गति पकड़ने में समय लग सकता है पर स्थितियां पहले के मुकाबले बेहतर हो रही हैं।

केंद्र सरकार द्वारा 11 सितंबर 2020 को जारी किए आंकड़ों को देखें तो तस्वीर कुछ साफ होती है। अप्रैल 2020 में औद्योगिक उत्पादन में एक वर्ष पहले की स्थिति के मुकाबले 57.6 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई थी। मई 2020 में यह गिरावट 33.9 प्रतिशत की रही यानी गिरावट तो थी, पर अप्रैल के मुकाबले कम थी। जून 2020 में औद्योगिक उत्पादन में 15.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जुलाई 2020 में औद्योगिक उत्पादन में गिरावट 10.4 प्रतिशत दर्ज की गयी। यानी गिरावट के स्तर में गिरावट हो रही है। इसे मोटे तौर पर सुधार माना जा सकता है। देश धीमे-धीमे अनलाकडाउन की तरफ बढ़ रहा है। एक भयंकर दुर्घटना का शिकार मरीज पूरा फिट नहीं हुआ है, पर हालत में सुधार दर्ज हो रहा है। कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था की तस्वीर यह बताती है कि स्थिति बेहतरीन हालत में आने में भले ही वक्त लगे, पर हालात सुधार की तरफ हैं, यह बात साफ है। ठीक यही बात भारत में आने वाले विदेशी निवेशकों को समझ में आ गई है।

देश की बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने लाॅकडाउन की अवधि में विदेशों से बहुत निवेश हासिल किए हैं। रिलायंस का शेयर एक महीने ही करीब 1500 रुपये से 2300 रुपये तक पहुंच गया। कई महत्वपूर्ण विदेशी कंपनियों ने रिलायंस में निवेश किया है। जाहिर उन्होंने यही सोचकर निवेश किया है कि भारत में अपार संभावनाएं हैं। रिलायंस में जो निवेश बाहर से आया, उसकी एक झलक भारतीय विदेशी मुद्रा कोष में भी दिख रही है। कुल मिलाकर स्थितियां ये हैं कि चिंताओं के पार और परे जाकर विदेशी निवेशकों को समझ में आ रहा है कि भारत महत्वपूर्ण बाजार हैै। खासकर चीन के रवैये से दुनिया को समझ में आ रहा है कि चीन अविश्वसनीय देश है, जहां की राजनीति को लेकर कुछ भी पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता। चीन न सिर्फ अविश्वसनीय है, बल्कि दुनिया भर के अविश्वसनीय और नकारात्मक छवि वाले देशों का परम दोस्त भी है, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया जैसे देश चीन के दोस्त देश हैं। इसलिए तमाम निवेशकों को विश्लेषण के बाद फिर एक बाद रेखांकित करना पड़ता है कि भारत लोकतांत्रिक देश है, जहां कानून का राज है, बड़ा बाजार है और एक विकसित होता हुआ उपभोक्ता बाजार है। यह ठीक है कि कोरोना ने भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रय क्षमता पर गहरी चोट की है। पर यह भी अपनी जगह सत्य है कि देर सवेर तो हालात सुधरने ही हैं। हालात खराब जितने हो सकते थे, वो हो चुके हैं। अब तो जैसे भी हो, हालात पहले के मुकाबले बेहतर ही होंगे। कारोबारी दुनिया को अपने हिसाब से समझता है।

कारोबारी को दुनिया को आशावादिता के नजरिये से देखना होता है। इसलिए दुनिया भर के निवेशकों को भारत में आशा दिख रही है। इसलिए भारत में निवेश आ रहा है, भारतीय प्रतिभूतियों में निवेश आ रहा है। यही वजह है कि अर्थव्यवस्था पर भले ही संकट का अंधेरा छाया हुआ दिखता हो, पर शेयर बाजार पूरी चमक के साथ जगमगा रहा है। कारोबार और शेयर बाजार उम्मीद पर कायम है। यह उम्मीद विदेशी निवेशकों को बहुत साफ दिखाई दे रही है। इसलिए भारत में विदेशी मुद्रा कोष रिकार्ड ऊंचाइयों पर पहुंचा हुआ दिखता है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को एक खास मजबूती मिलती है। विदेशी निवेशक भारत पर भरोसा दिखा रहे हैं, यह बात भारतीय उद्यमियों को भी आश्वस्त करनी चाहिए और उन्हें भी निवेश की ओर कदम बढ़ाने चाहिए। संकट पर रुदन से कुछ हासिल नहीं होगा। संकट के पार कैसे जाना है, इस पर गंभीर विमर्श जरुरी है। निवेश की सख्त जरुरत है। अगर घरेलू उद्यमी निवेश नहीं करेंगे तो बाहरी निवेश का स्वागत करना ही होगा। निवेश से रोजगार पैदा होता है, रोजगार से समृद्धि पैदा होती है। भारतीय अर्थव्यवस्था को कोरोना ने झटका दिया है, पर अर्थव्यवस्था ध्वस्त नहीं हुई है। इस बात को कुछ स्मार्ट भारतीय कंपनियां और कुछ स्मार्ट विदेशी निवेशक बखूबी समझ रहे हैं।

विदेशी निवेशकों को यह भी समझ में आ रहा है कि कोरोना जनित आर्थिक मंदी से वापसी जिन अर्थव्यवस्थाओं में तेज होगी, भारतीय अर्थव्यवस्था उनमें शामिल है। मंदी आई है पर हमेशा यहां बनी नहीं रहेगी, क्योंकि यहां बड़ा बाजार है। भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था नहीं है कि माल अगर दुनिया में न बिका, तो माल का बिकना मुश्किल हो जाएगा। भारत का अपना बाजार खासा बड़ा बाजार है कारों से लेकर मोबाइल तक का। इसी वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर उन अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले पहले आएगी, जिनका आधार निर्यात पर टिका हुआ है। निवेशकों को उम्मीद है कि जैसे ही भारतीयों की क्रय शक्ति में सुधार होगा मंदी के बादल छअ जाएंगे। इसके लिए उन्हें लंबा इंतजार भी नहीं करना होगा।

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