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जेएनयू को सियासी गढ़ बनने से बचाना जरूरी

छात्रों के हटने के बाद से वीसी दफ्तर से बाहर आ गए हैं।

जेएनयू को सियासी गढ़ बनने से बचाना जरूरी
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नई दिल्ली. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) देश के गौरवशाली शिक्षण संस्थान में शुमार है। यहां से तालीम लेना आज भी गौरव की बात मानी जाती है। किसी का जेएनयू से पास आउट होना ही उसके योग्य होने की गारंटी मानी जाती है। जेएनयू से निकली प्रतिभाओं ने देश के तमाम क्षेत्रों में मुकाम हासिल कर राष्ट्र का मान बढ़ाया है, लेकिन इधर कुछ महीनों से यह विश्वविद्यालय नकारात्मक वजहों से सुर्खियों में है। यह देश के र्शेष्ठ यूनिवर्सिटियों में शुमार जेएनयू की प्रतिष्ठा के ठीक उलट है। जेएनयू के छात्रों के एक गुट द्वारा अपने विवि के वीसी और अन्य अधिकारियों को प्रशासनिक भवन में 21 घंटे तक 'जबरन कैद' रखना घोर चिंता की बात है। लेफ्ट थाउट लाइन की स्टूडेंट यूनियन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) ने हॉस्टल से लापता छात्र नजीब अहमद को लेकर प्रशासनिक भवन के सामने धरना-प्रदर्शन किया और वीसी को करीब करीब 'बंधक' बना लिया।
छात्रों का यह कृत्य कहीं से भी जायज नहीं है। छात्र नजीब का गायब होना विवि प्रशासन समेत सभी के लिए चिंता की बात है। उनको ढूंढ़ना पुलिस का काम है। छात्रों को वीसी को कैद करने के बजाय नजीब को ढूंढ़ने में पुलिस की मदद करनी चाहिए। लेकिन जिस तरह से छात्रों के गुट ने विवि प्रशासन के खिलाफ अनुशासनहीनता की है, उससे साफ लगता है कि वे यह सब राजनीति के मकसद से कर रहे हैं। यह पहली बार नहीं है जब जेएनयू में लेफ्ट विंग से संबंद्ध छात्रों के गुटों ने हंगामा किया हो। पहले भी वे जेएनयू को राजनीति के अखाड़े बनाते रहे हैं। इस साल नौ फरवरी को हुए कन्हैया प्रकरण को कौन भूल सकता है। उस दिन जेएनयू में वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्रों ने संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु व जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट को-फाउंडर मकबूल भट की याद में एक कार्यक्रम का आयोजन किया था।
इसमें कश्मीर के छात्र भी शामिल थे। इस कार्यक्रम को जेएनयू स्टूडेंड यूनियन के अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने संबोधित किया था। द कंट्री ऑफ अ विदाउट पोस्ट ऑफिस नामक इस कार्यक्रम का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें कुछ छात्र 'अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जि़ंदा हैं', 'कश्मीर की आजादी हम लेकर रहेंगे', 'भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशाअल्लाह, इंशाअल्लाह', 'भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी' जैसे देश विरोधी नारे लगाते देखे गए। इसके बाद पूरा देश सन्न रह गया था कि जेएनयू में देशविरोधी नारे कैसे लग रहे हैं? अफजल गुरु की फांसी के वक्त भी जेएनयू में विरोध प्रदर्शन देखने को मिले थे।
अभी दशहरा पर छात्रों के एक गुट ने जेएनयू में रावण दहन के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के पुतले का दहन किया था। किसी सरकारी संस्थान में अपने ही देश के प्रधानमंत्री का पुतला दहन करना घोर निंदनीय कृत्य है। यह राष्ट्र विरोधी है। लोकतंत्र में हर किसी को अपना विचार अभिव्यक्त करने, असहमति प्रकट करने और विरोध जताने का हक है, लेकिन विरोध का मतलब राष्ट्रविरोधी कृत्य कतई नहीं है। वामपंथी विचारधारा भी देश विरोधी कृत्य की इजाजत नहीं देती है। फिर ये कौन छात्र हैं, इनके मकसद क्या हैं? केंद्रीय गृहराज्यमंत्री किरण रिजिजु ठीक ही कहते हैं कि जेएनयू में कुछ छात्र पढ़ाई नहीं, बल्कि निहित स्वार्थ की राजनीति कर रहे हैं। ऐसे छात्रों को समझना चाहिए कि उनकी इस तरह की राष्ट्र विरोधी हरकतों से जेएनयू की साख धूमिल हो रही है। जेएनयू प्रशासन और सरकार को भी ऐसे छात्रों के प्रति कठोर रवैया अपनाना चाहिए, ताकि विवि की प्रतिष्ठा बची रहे।
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