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कांग्रेस के लिए अात्ममंथन का समय, छोटे राज्यों तक सिमट कर रह गई पार्टी

कांग्रेस ने 1996 से 2004 तक चुनावी संकट का सामना किया, जब वह सत्ता से बाहर थी।

कांग्रेस के लिए अात्ममंथन का समय, छोटे राज्यों तक सिमट कर रह गई पार्टी

सच में कांग्रेस इस वक्त जिस तरह की राजनीति कर रही है और देश में जिस तेजी से सिमट रही है, उसका अस्तित्व मिटने के कगार पर लग रहा है। दिशाहीन राजनीति यूं ही चलती रही तो पार्टी के खत्म होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। बड़ी बात यह है कि कांग्रेस पर अस्तित्व के संकट की बात खुद कांग्रेसी नेता जयराम रमेश कह रहे हैं।

कोच्चि में रमेश ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा प्रमुख अमित शाह की ओर से मिल रही चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस रणनीति नहीं बना पा रही है। दरअसल, कांग्रेस गंभीर संकट का सामना कर रही है। कांग्रेस ने 1996 से 2004 तक चुनावी संकट का सामना किया, जब वह सत्ता से बाहर थी।

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पार्टी ने 1977 में भी चुनावी संकट का सामना किया था जब वह आपातकाल के ठीक बाद चुनाव हार गई थी, लेकिन आज कांग्रेस अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है। सचमुच में कांग्रेस पर अस्तित्व का गंभीर संकट मंडरा रहा है। करीब 130 साल पुरानी पार्टी का ऐसा राजनीतिक हश्र होगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा।

कभी समूचे देश पर कांग्रेस पार्टी की सरकारें हुआ करती थीं, आज वह छह छोटे राज्यों तक सिमट गई हैं। इस वर्ष के अंत तक कम से कम दो और राज्य उसके हाथ से निकल सकते हैं। राज्यसभा में भी अब वह सबसे बड़ी पार्टी नहीं रह गई है। कांग्रेस की दुर्दशा पर पहले भी कई कांग्रेसी दिग्गज चिंता जता चुके हैं।

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सवाल है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? वास्तविकता यह है कि कांग्रेस अभी भी दकियानूस तरीके से ही सोचती है। कांग्रेस सोचती है कि मोदी सरकार समेत राज्यों की भाजपा सरकारें गलतियां करेंगी, जिससे जनता में असंतोष उभरेगा और इसका चुनावी फायदा उसे मिलेगा, जबकि भाजपा नए विचार, नई योजना के साथ काम कर रही है।

उसकी राजनीति नित नई ताजगी है, लेकिन विपक्ष में आने के बाद भी कांग्रेस के राजनीतिक ढर्रे में कोई बदलाव नहीं आया है। पार्टी अभी भी उसी सामंती तरीके से सोच रही है। पार्टी संसद में राहुल गांधी की सुरक्षा का मामला उठा रही है, जनता का नहीं। पार्टी एक परिवार के बोझ से आगे नहीं निकल पा रही है।

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सूचना क्रांति के इस युग में राजनीति का तरीका बदल रहा है, शायद इस बात को कांग्रेस नहीं समझ पा रही है। महात्मा गांधी ने आजादी के बाद ही कहा था कि अब कांग्रेस को भंग कर देना चाहिए, लेकिन जवाहर लाल नेहरू ने ऐसा नहीं किया और उन्होंने धीरे-धीरे कांग्रेस को अपने परिवार की पार्टी बना दी।

वर्तमान पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी कांग्रेस में अपेक्षित बदलाव न विचारों के स्तर पर ला पा रहे हैं और न ही एजेंडे के स्तर पर। एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस को देश निर्माण में जितनी भूमिका निभानी चाहिए थी, पार्टी ने नहीं निभाई है।

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चाहे शासन व्यवस्था हो, शिक्षा-स्वास्थ्य व्यवस्था हो, कानून व न्याय व्यवस्था हो, गरीबी उन्मूलन हो या संतुलित विकास हो, 60 साल से अधिक शासन करने के बावजूद किसी भी मोर्चे पर कांग्रेस ने बेहतर पहल नहीं की। कांग्रेस ने अपने शासनकाल में प्रशासन में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी कर दीं। कांग्रेस और भ्रष्टाचार पर्याय बन गए।

जयराम रमेश ने सही वक्त पर सवाल उठाया है। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष भी चाहिए, इसलिए कांग्रेस का अस्तित्व बचना चाहिए, लेकिन ऐसे नहीं बचेगा जैसे कांग्रेस कर रही है। बिहार में लालू परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, तब भी कांग्रेस ने लालू का साथ नहीं छोड़ा।

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करुणानिधि परिवार पर भ्रष्टाचार के अनेक आरोप हैं, पर कांग्रेस ने द्रमुक से गठबंधन किया। कांग्रेस को समझना होगा कि सांप्रदायिकता का डर दिखा कर भ्रष्टाचार की अनदेखी नहीं की जा सकती है।

जनता भ्रष्टाचार और परिवारवाद से ऊबी हुई है। यह कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का समय है। अस्तित्व बचाना है तो परिवारवाद के आगोश से निकल कर मजबूत नेतृत्व लाने के साथ भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस अपनाना होगा, नए नारे गढ़ने होंगे, नए एजेंडे तय करने होंगे और सतापक्ष से दो कदम आगे की राजनीति करनी होगी।

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