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ईरान-पश्चिम संबंध फायदेमंद, ईरान भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्र

ऐतिहासिक तौर पर ईरान युगों युगों से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्र रहा है ।

ईरान-पश्चिम संबंध फायदेमंद, ईरान भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्र
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ऐतिहासिक तौर पर ईरान युगों युगों से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्र रहा है । प्राचीनकाल में जबकि ईरान को फारस कहा जाता था, तभी से समान आर्य संस्कृति और संस्कारों से ओतप्रोत ईरान और भारत के मध्य निकटता विद्यमान रही है। ईरान के बादशाह को सदैव आर्यमहिर कहकर पुकारा जाता रहा था। ईरान के साथ भारत के केवल ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिश्ते ही नहीं रहे, वरन व्यापारिक तौर पर भी गहन संबंध रहे हैं। विगत वर्षों में ईरान अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम के कारणवश अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी राष्ट्रों द्वारा आयद किए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से जूझता और निबटता रहा है। 2006 से ईरान के बरखिलाफ आयद किए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंध इस कारणवश भी अभूतपूर्व रहे हैं, क्योंकि विश्व की महाशक्ति के साथ ही साथ ईरान के पड़ोसी राष्ट्रों ने भी इन प्रतिबंधों की बाकायदा हिमायत की है।
संभवतया अब ऐसा वक्त आ गया है, जब पश्चिमी राष्ट्रों और ईरान के मध्य परमाणु कार्यक्रम के सवाल को लेकर एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते की संभावना बलवती हो गई है। इस प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय समझौते के तहत ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित कर देगा और परमाणु बमों का निर्माण तो कदापि नहीं करेगा। ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण और निगरानी रखने के लिए भी अनुमति प्रदान कर देगा।
भारत सहित विश्व के मुखतलिफ राष्ट्र ईरान से कच्चा तेल खरीदने के लिए सदैव तत्पर रहे हैं, क्योंकि यह सऊदी अरब सहित अन्य तेल निर्यातक राष्ट्रों के मुकाबले कम कीमत पर बेचा जाता रहा है। जबसे पश्चिमी राष्ट्रों ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध आयद किए हैं, तब से ईरान के साथ चाइना के आर्थिक और सामरिक रिश्तों को बहुत अधिक प्रगाड़ता प्राप्त हो गई है। चाइना वस्तुत: ईरान के सस्ते तेल का विश्व में सबसे बड़ा ग्राहक बन उभरा है। पश्चिम द्वारा आयद आर्थिक प्रतिबंधों के दौर में चाइना वस्तुत: ईरान का प्रबल आर्थिक सहयोगी भी बन चुका है। पश्चिमी ताकतों के विरुद्ध सन्नद्ध रहे, चाइना को ईरान के प्रबल सहयोग से अपनी ऊर्जा व्यवस्था को बेहद पुख्ता बनाने का शानदार अवसर उपल्ब्ध हो गया। पश्चिमी ताकतों के कूटनीतिक दबाव के कारण भारत को भी ईरान से आयातित किए जाने वाले कच्चे तेल की मात्रा में तकरीबन पंद्रह फीसदी की कटौती करने के लिए विवश होना पड़ा है।
अमेरिका के अतिरिक्त प्राय: अन्य सभी पश्चिमी राष्ट्रों ने तो ईरान से समझौता करके आर्थिक प्रतिबंधों को समाप्त करने का सुनिश्चित तौर पर निश्चय कर लिया है। किंतु अब ईरान के साथ अमेरिका के समझौते का अंतिम निर्णय अमेरिकन पार्लियामेंट को ही करना है। अमेरिका यदि अब भी ईरान के विरुद्ध अपनी हठधर्मिता प्रदर्शित करता है तो फिर अमेरिका कूटनीतिक तौर पर पश्चिम में अलग थलग पड़ सकता है। ईरान के प्रति नरम कूटनीति रुख अपना रहे, पश्चिमी राष्ट्रों ने इस तथ्य को बाकायदा समझ-बूझ लिया है कि अरब राष्ट्रों में तेजी से उभरती हुई सुन्नी वहाबी कट्टरता के बरखिलाफ शिया हुकूमत वाला राष्ट्र ईरान उनका प्रबल सहयोगी बन सकता है। यह ईरान के लिए भी लाभकारी है।
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