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महासिंह पूनिया का लेख : हरियाणा की अंतरराष्ट्रीय पहचान

हरियाणा ने सांस्कृतिक दृष्टि से अनेक सोपानों को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। फिर भी अनेक क्षेत्रों में और अधिक सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है। फिल्म पॉलिसी तो बन गई, किन्तु अभी तक फिल्म सिटी नहीं बना है। शिल्पग्राम के माध्यम से रोजगार एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान की अपार संभावनाएं हैं। आवश्यकता है कलाकारों को रोजगार से जोड़ने की ताकि सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर और अधिक पहचान मिल सके।

महासिंह पूनिया
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महासिंह पूनिया

महासिंह पूनिया

वैदिक ऋचाओं में जिसे हरियाणे, महाराज मनु ने ब्रह्मवर्त प्रदेश की संज्ञा दी, भगवान विष्णु के अवतारों के बदौलत जो भूमि हरि-यान क्षेत्र के नाम से विख्यात हुई, आदि देवता शिव की भूमि की बदौलत जिसे हरयाणा कहा गया, भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय की क्रीड़ा स्थली की बदौलत जो मयूरभूमि के नाम से प्रसिद्ध हुई, वैदिक काल तथा महाभारत काल के बीच जिस पावन पवित्र भूमि पर 88 हजार ऋषियों ने जन्म लेकर इसे ऋषि भूमि की संज्ञा दी, महाभारत से पूर्व जिसे समन्तपंचक प्रदेश कहा गया, कालिदास ने जिस भू को देवभूमि के नाम से पुकारा, महाभारत में जिसे कौरव प्रदेश कहा गया, मां सरस्वती की बदौलत जिसे सारस्वत प्रदेश की संज्ञा मिली, महाराजा कुरु ने जिस भूमि से खेती संस्कृति का संदेश दिया, महर्षि दधिचि एवं कर्ण के दान से जिस भूमि को दानवीर भूमि का तमगा मिला। पावनधाम कुरुक्षेत्र के कारण जिसे पुण्यभूमि कहा गया, महाभारत की बदौलत जो न्यायभूमि के नाम से विख्यात हुई, भगवद्गीता में जिस पावन पवित्र भूमि को धर्मक्षेत्र कहकर पुकारा गया, महाराज हर्षवर्धन द्वारा रचित नाटक रत्नावली एवं प्रियदर्शिका की बदौलत जो सांस्कृतिक भूमि थानेसर पूरे भारत में विख्यात हुई, जिस भूमि पर पानीपत की लड़ाईयों ने भारत के भाग्य का फैसला किया। इसी हरियाणा प्रदेश का जन्म 1 नवंबर सन्ा 1966 को हुआ।

सांस्कृतिक दृष्टि से हरियाणा की अलग पहचान है, लेकिन इस पहचान को स्थापित करने के लिए यहां के लोक कलाकारों, संस्कृति प्रेमियों तथा साहित्यकारों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान के लिए अनेक सार्थक कदम उठाए हैं। भाषा की दृष्टि से हरियाणा में देशवाली, बागड़ी, बांगरू, खादरी, कौरवी, खड़ी बोली, ब्रज भाषा, मेवाती, अहीरवाटी सभी बोलियां हरियाणवी भाषा का अमिट खजाना हैं। हालांकि हरियाणवी भाषा को हम संविधान की सूची में शामिल नहीं करवा पाए। आज हरियाणवी भाषा को बोलने वाले करोड़ों लोग हैं। पाकिस्तान में तो एक करोड़ लोग हरयाणवी बोलने वाले हैं। भारतीय फिल्मों दंगल, तनु वेड्स मनु रिटर्नस, लाल रंग, सुल्तान, हाईवे, सांड की आंख आदि में हरियाणवी भाषा का जो स्वरूप दिखाया गया है उससे हरियाणवी भाषा की लोकप्रियता को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप मिला है। हरियाणा में खेल संस्कृति की जो परम्परा है उसने वैश्विक स्तर पर हरियाणा को विशेष पहचान दिलवाई है। कुश्ती, कबड्डी, बॉक्सिंग, हॉकी आदि खेलों में हरियाणा के खिलाड़ियों ने पूरे विश्व में अपनी धाक जमाई है।

इसके साथ ही हरियाणा में नई पीढ़ी जिस तरीके से संगीत में नवीन प्रयोग कर रही है उससे भी हरियाणा को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल रही है। पर्यटन की दृष्टि से हरियाणा में अपार संभावनाएं हैं। हरियाणा का पर्यटन विभाग इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है। हरियाणा के अलग-अलग जिलों में 40 से अधिक पर्यटन केन्द्र स्थापित किए गए हैं।

हरियाणा की पुरातात्विक विरासत का इतिहास हजारों साल पुराना है। राखीगढ़ी एवं फरमाणा में पुरातात्विक दृष्टि से जो खुदाई हुई है उससे हरियाणा को अलग पहचान मिली है। यहां से मिले प्राचीन अवशेषों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि हरियाणा की पुरातात्विक विरासत में जो प्रमाण मिले हैं वे 8 हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन हैं। इसके अलावा बनावली, मित्थाथल, सुग, आदिबद्री, उकलाणा, खोकराकोट, हर्ष का टीला आदि स्थलों से जो पुरातात्विक विरासत के प्रमाण मिले हैं। हरियाणा ने इस विरासत को संरक्षित करने के लिए अनेक संग्रहालयों को भी जन्म दिया है। राखीगढ़ी में करोड़ों रुपये की लागत से जो संग्रहालय स्थापित किया जा रहा है उससे भी हरियाणा की अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ेगी।

हरियाणा के विषय में कहावत प्रसिद्ध है, देसां में देस हरियाणा, जित्थ दूध-दही का खाणा। हरियाणा का खान-पान विशेष रूप से प्रसिद्ध है। यहां का हलवा, लापसी, खीर, गुलगुले, पकौड़े, मीठी रोटी, गोज्जी, लस्सी, शीत, गास यहां की 50 से अधिक तरह की चटनियां विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। विदेश से आने वाले सभी पर्यटकों के लिए मुरथल का खाना तथा ढाबे विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

लोक परिधानों की दृष्टि से यहां के लोगों की अलग पहचान है। यहां पर 50 से अधिक तरह की पगड़ियां बांधी जाती हैं। धोती, कुर्ता, खंडका के साथ-साथ कुर्ती, दाम्मण, चूंदड़, खारा, घाघरा, घाघरी महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले आभूषण विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। हरियाणवी लोकगीतों में इन परिधानों एवं आभूषणों का बार-बार जिक्र आता है। इससे इनकी लोकप्रियता को और अधिक पंख लगे हैं।

प्रदेश में हरियाणा साहित्य अकादमी, हरियाणा ग्रंथ अकादमी, हरियाणा संस्कृत अकादमी, हरियाणा पंजाबी अकादमी, हरियाणा संस्कृति कला एवं इतिहास अकादमी के साथ-साथ कला परिषद की स्थापना भी की गई है जिसके माध्यम से हरियाणा की संस्कृति को लेकर अनेक राष्ट्रीय तथा अंतरर्राष्ट्रीय स्तर के आयोजन होते हैं। हालांकि अभी तक हरियाणवी भाषा अकादमी, हरियाणवी ललित कला अकादमी, हरियाणवी लोकनाट्य अकादमी की स्थापना होना बाकी है फिर भी दो दर्जन से अधिक विश्वविद्यालय हरियाणवी संस्कृति को लेकर अनेकों ऐसे आयोजन करते हैं जिनके माध्यम से हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत को एक नई पहचान मिली है।

हरियाणा का हस्तशिल्प अपनी अलग पहचान रखता है। यहां पर रेज्जा बनाने की परम्परा, जुलाहों एवं बुनकरों के माध्यम से कपड़े रंगने की परम्परा, छिपियों एवं रंगरेजों के माध्यम से विकसित होती रही है। यहां दरी बनाने की कला गांवों में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके साथ ही फुलझड़ी, मुढ़ढ़े, सांझी कला, चित्तण-मांडणे अनेक ऐसे कलात्मक पक्ष हैं जिनके माध्यम से यहां का हस्तशिल्प एवं कला विशेष पहचान रखती है। विरासत हेरिटेज की ओर से इस दिशा में अनेक सार्थक कदम उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हरियाणा के हस्तशिल्प को अलग पहचान मिली है।

हरियाणा ने सांस्कृतिक दृष्टि से अनेक सोपानों को पार करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई है। फिर भी अनेक क्षेत्रों में और अधिक सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है। हरियाणा की फिल्म पॉलिसी तो बन गई, किन्तु अभी तक हरियाणा में फिल्म सिटी नहीं बना है। इसके साथ ही हरियाणा में हस्तशिल्प कलाकारों को लेकर शिल्पग्राम के माध्यम से रोजगार एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान की अपार संभावनाएं हैं। आवश्यकता है यहां के संस्कृति कर्मियों एवं कलाकारों को रोजगार से जोड़ने की ताकि यहां की सांस्कृतिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर और अधिक पहचान मिल सके और प्रत्येक हरियाणावासी हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत पर गर्व महसूस कर सके।

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